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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 71 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 71/ मन्त्र 4
    ऋषिः - सुदीतिपुरुमीळहौ तयोर्वान्यतरः देवता - अग्निः छन्दः - विराड्गायत्री स्वरः - षड्जः

    न तम॑ग्ने॒ अरा॑तयो॒ मर्तं॑ युवन्त रा॒यः । यं त्राय॑से दा॒श्वांस॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न । तम् । अ॒ग्ने॒ । अरा॑तयः । मर्त॑म् । यु॒व॒न्त॒ । रा॒यः । यम् । त्राय॑से । दा॒श्वांस॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    न तमग्ने अरातयो मर्तं युवन्त रायः । यं त्रायसे दाश्वांसम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    न । तम् । अग्ने । अरातयः । मर्तम् । युवन्त । रायः । यम् । त्रायसे । दाश्वांसम् ॥ ८.७१.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 71; मन्त्र » 4
    अष्टक » 6; अध्याय » 5; वर्ग » 11; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    No adversities, no enemies, can deprive that generous man of his wealth, honour and excellence whom you protect and promote.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वराची कृपा ज्याच्यावर होते त्याला कोणती शक्ती कल्याणमार्गापासून पृथक करू शकते? ॥४॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    तन्महत्त्वं दर्शयति ।

    पदार्थः

    हे अग्ने ! अरातयः=शत्रवः । तं+मर्तं=मर्त्यम् । रायः=कल्याणधनात् । न+युवन्त=न पृथक् कर्तुं शक्नुवन्ति । यं+दाश्वांसं=दातारम् । त्वं त्रायसे ॥४ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    उसका महत्त्व दिखलाते हैं ।

    पदार्थ

    हे अग्ने ! तू (यं+दाश्वांसम्) जिस दाता और उदार पुरुष का (त्रायसे) साहाय्य और रक्षा करता है, (तम्+मर्तम्) उस मर्त्य को (अरातयः) शत्रु और दुष्ट (रायः) कल्याणसम्पत्ति से (न+युवन्त) कोई भी पृथक् नहीं कर सकता ॥४ ॥

    भावार्थ

    परमात्मा की कृपा जिस पर होती है, उसको कौन शक्ति कल्याण-मार्ग से पृथक् कर सकती है ॥४ ॥

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    विषय

    उस के आवश्यक गुणों का वर्णन।

    भावार्थ

    हे ( अग्ने ) तेजस्विन् ! विद्वन् ! प्रभो ! तू ( यं दाश्वांसं ) जिस दानशील की ( त्रायसे ) रक्षा करता है ( तं मर्तं ) उस मनुष्य को ( अरातयः ) समस्त शत्रु भी ( रायः ) धन से ( नः युवन्त ) पृथक् नहीं कर सकते।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सुदीतिपुरुमीळ्हौ तयोर्वान्यतर ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ४, ७ विराड् गायत्री। २, ६, ८, ९ निचृद् गायत्री। ३, ५ गायत्री। १०, १०, १३ निचृद् बृहती। १४ विराड् बृहती। १२ पादनिचृद् बृहती। ११, १५ बृहती॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥

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    विषय

    अरातयः रायो न युवन्त

    पदार्थ

    [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (तं मर्तम्) = उस मनुष्य को (अरातयः) = शत्रु (रायः) = धन से (न युवन्त) = पृथक् नहीं कर पाते, (यं) = जिस (दाश्वांसम्) = दानशील को आप (त्रायसे) = रक्षित करते हैं। [२] हम दाश्वान् बने। दानशील पुरुष सदा प्रभु का प्रिय होता है, क्योंकि यह धन के प्रति आसक्तिवाला नहीं होता। हम प्रभु के प्रिय होंगे तो कोई भी हमें धनों से पृथक् न कर पाएगा।

    भावार्थ

    भावार्थ- दानशील व्यक्ति प्रभु से रक्षण को प्राप्त करता है। इसे कोई भी ऐश्वर्य से पृथक् करनेवाला नहीं होता ।

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