ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 71 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 71/ मन्त्र 1
    ऋषि: - सुदीतिपुरुमीळहौ तयोर्वान्यतरः देवता - अग्निः छन्दः - विराड्गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    (सखायः) हे मित्रो ! (क्रतुम्) शुभकर्म की (इच्छत) इच्छा करो, अन्यथा (शरस्य) वृत्रहन्ता उस परमात्मा की (कथा+राधाम) कैसे आराधना कर सकेंगे, कैसे (उपस्तुतिम्) उसकी प्रिय स्तुति करेंगे। अतः शुभ कर्म करो। जो ईश (भोजः) सब प्रकार से सुख पहुँचानेवाला है। (सूरिः) सर्वज्ञ और (यः) जो (अह्रयः) अविनश्वर है ॥१३॥

    भावार्थ -

    इसका आशय विस्पष्ट है प्रत्येक मनुष्य को शुभ कर्म करना चाहिये। यज्ञादि करने से केवल आत्मा का ही उपकार नहीं होता, किन्तु देशवासियों को भी इससे बहुत लाभ पहुँचता है और दुराचारों से बचता है, शरीर में रोग नहीं होता। मरणपर्य्यन्त सुख से जीवन बीतता है ॥१३॥

    पदार्थ -

    हे सखायः=सुहृदः ! यूयं क्रतुं कर्म। अन्यथा शरस्य=दुष्टविनाशकस्य इन्द्रस्य। शॄ हिंसायाम्। कथा=कथम्। राधाम=आराधयाम। कथञ्च। तस्योपस्तुतिम्। करवाम। य इन्द्रः। भोजः=भोजयिता सुखयिता। सूरिः=सर्वज्ञः। यः+अह्रयः=अविनश्वरः ॥१३॥

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