ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 71/ मन्त्र 6
ऋषिः - सुदीतिपुरुमीळहौ तयोर्वान्यतरः
देवता - अग्निः
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
त्वं र॒यिं पु॑रु॒वीर॒मग्ने॑ दा॒शुषे॒ मर्ता॑य । प्र णो॑ नय॒ वस्यो॒ अच्छ॑ ॥
स्वर सहित पद पाठत्वम् । र॒यिम् । पु॒रु॒ऽवीर॑म् । अग्ने॑ । दा॒शुषे॑ । मर्ता॑य । प्र । नः॒ । न॒य॒ । वस्यः॑ । अच्छ॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
त्वं रयिं पुरुवीरमग्ने दाशुषे मर्ताय । प्र णो नय वस्यो अच्छ ॥
स्वर रहित पद पाठत्वम् । रयिम् । पुरुऽवीरम् । अग्ने । दाशुषे । मर्ताय । प्र । नः । नय । वस्यः । अच्छ ॥ ८.७१.६
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 71; मन्त्र » 6
अष्टक » 6; अध्याय » 5; वर्ग » 12; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 5; वर्ग » 12; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Agni, lead us to wealth, brave happy progeny and the perfect joy of life for men of charity and unbounded generosity.
मराठी (1)
भावार्थ
वस्य: = जो आनंद सर्वत्र व्यापक आहे ते मुक्तिरूप सुख आहे त्याकडेच लोकांनी जावे. तो या जगातही विद्यमान आहे; परंतु त्याला केवळ विद्वानच अनुभवू शकतो. ॥६॥
संस्कृत (1)
विषयः
परमानन्दप्राप्तये प्रार्थनेयम् ।
पदार्थः
हे अग्ने ! त्वम् । दाशुषे=परमोदाराय । मर्ताय । पुरुवीरम्=बहुवीरोपेतं रयिं सम्पत्तिम् । ददासि । हे ईश ! नोऽस्मान् । वस्यः=वसीयः । परमानन्दम् । अच्छ=अभि । प्र+नय ॥६ ॥
हिन्दी (3)
विषय
परमानन्द की प्राप्ति के लिये यह प्रार्थना है ।
पदार्थ
(अग्ने) हे सर्वाधार परमदेव ! (त्वम्) तू (दाशुषे+मर्ताय) परमोदार मनुष्य को (पुरुवीरम्+रयिम्) बहुत वीरों से संयुक्त सम्पत्तियाँ देता है । हे ईश ! (नः) हमको (वस्यः) परमानन्द की (अच्छ) ओर (प्र+नय) ले चल ॥६ ॥
भावार्थ
वस्यः=जो आनन्द सर्वत्र व्यापक है, वह मुक्तिरूप सुख है । उसी की ओर लोगों को जाना चाहिये । वह इस लोक में भी विद्यमान है, परन्तु उसको केवल विद्वान् ही अनुभव कर सकता है ॥६ ॥
विषय
उस के आवश्यक गुणों का वर्णन।
भावार्थ
हे (अग्ने ) अग्रणीनायक ! ( त्वं ) तू ( पुरु-वीरं ) बहुत पुत्रों वा वीरों सहित ( रयिं ) ऐश्वर्य को ( दाशुषे मर्त्ताय ) दानशील मनुष्य के हितार्थ प्रदान करता है। वह तू ( नः वस्यः अच्छ नय ) हमें भी उत्तम धन प्रदान कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
सुदीतिपुरुमीळ्हौ तयोर्वान्यतर ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ४, ७ विराड् गायत्री। २, ६, ८, ९ निचृद् गायत्री। ३, ५ गायत्री। १०, १०, १३ निचृद् बृहती। १४ विराड् बृहती। १२ पादनिचृद् बृहती। ११, १५ बृहती॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥
विषय
वस्यः अच्छ
पदार्थ
[१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (त्वं) = आप (दाशुषे मर्ताम्) = दाश्वान् दानशील मनुष्य के लिए (पुरुवीरं) = पालक व पूरक वीरता से युक्त (रयिं) = धन को अथवा वीर सन्तानोंवाले धन को प्राप्त कराते हैं। [२] हे प्रभो! आप (नः) = हमें भी (वस्यः) = उत्कृष्ट धन की (अच्छ) = ओर प्रयाण प्रकर्षेण ले चलिये।
भावार्थ
भावार्थ- हम दाश्वान् [दानशील] बनें। प्रभु हमें वीर सन्तानोंवाले धन को प्राप्त कराएँगे। प्रभु सदा हमें प्रशस्त धन की ओर ले चलें।
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