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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 64 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 64/ मन्त्र 10
    ऋषिः - कश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    इन्दु॑: पविष्ट॒ चेत॑नः प्रि॒यः क॑वी॒नां म॒ती । सृ॒जदश्वं॑ र॒थीरि॑व ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इन्दुः॑ । प॒वि॒ष्ट॒ । चेत॑नः । प्रि॒यः । क॒वी॒नाम् । म॒ती । सृ॒जत् । अश्व॑म् । र॒थीःऽइ॑व ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्दु: पविष्ट चेतनः प्रियः कवीनां मती । सृजदश्वं रथीरिव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इन्दुः । पविष्ट । चेतनः । प्रियः । कवीनाम् । मती । सृजत् । अश्वम् । रथीःऽइव ॥ ९.६४.१०

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 64; मन्त्र » 10
    अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 37; मन्त्र » 5
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (इन्दुः) परमात्मा स्वयं प्रकाशशीलोऽस्ति। (पविष्ट) सर्वपवित्रकर्ता चास्ति। (चेतनः) अथ च चिद्रूपोऽस्ति (कवीनां प्रियः) विद्वज्जनानां प्रियः (मती) बुद्धिस्वरूपोऽस्ति (अश्वम्) सर्वोत्कृष्टविद्युदादिशक्तीः (सृजत्) अरचयत्। अथ च स परमात्मा (रथीरिव) महारथ इव तेजस्वी तिष्ठति ॥१०॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (इन्दुः) परमात्मा स्वतःप्रकाश है। (पविष्ट) सबको पवित्र करनेवाला है (चेतनः) चिद्रूप है (कवीनां प्रियः) विद्वानों का प्रिय है। (मती) बुद्धिरूप है (अश्वम्) सर्वोपरि विद्युदादि शक्तियों को (सृजत्) रचा है और वह परमात्मा (रथीरिव) महारथी के समान तेजस्वी होकर विराजमान है ॥१०॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में परमात्मा को चेतनस्वरूप वर्णन करने के लिये चेतन शब्द स्पष्ट आया है। जो लोग यह कहा करते हैं कि वेद में परमात्मा को ज्ञानस्वरूप कहनेवाले शब्द नहीं आते, उनको इस मन्त्र से शिक्षा लेनी चाहिये ॥१०॥

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    विषय

    इन्दुः- चेतन:- प्रियः

    पदार्थ

    [१] (इन्दुः) = हमें शक्तिशाली बनानेवाला सोम (पविष्ट) = हमें प्राप्त हो । (चेतन:) = यह हमारे में चेतना को पैदा करनेवाला है। (प्रियः) = प्रीति को, मनःप्रसाद को उत्पन्न करनेवाला है । [२] यह (कवीनां मती) = ज्ञानियों की स्तुति के द्वारा (अश्वम्) = इन्द्रियाश्वों को (सृजत्) = शरीर रथ में युक्त करता है [Put on ] । उसी प्रकार (इव) = जैसे कि (रथी:) = एक रथी घोड़े को रथ में जोतता है । सोमरक्षण से मनुष्य सतत क्रियाशील बनता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम शरीर में शक्ति को [इन्दु] मस्तिष्क में चेतना को [चेतनः] तथा हृदय में प्रसन्नता को [प्रियः] प्राप्त कराता है।

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    विषय

    आत्मावत् शासक जन का कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    (इन्दुः) ऐश्वर्यवान् तेजस्वी, (चेतनः) ज्ञानवान्, देह में स्थित चेतन आत्मा के समान, (कवीनां प्रियः) विद्वान् जनों का प्रिय, उन्हें सुखी सन्तुष्ट करने वाला (पविष्ट) सब देश भर को पवित्र करता है और (रथीः अश्वम् इव) अश्व को रथी के समान (मती) मननपूर्वक बुद्धि से (अश्वम् सृजत्) अपने विषय के भोक्ता इन्द्रिय गण या अधीन जन को सञ्चालित करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:– १, ३, ४, ७, १२, १३, १५, १७, १९, २२, २४, २६ गायत्री। २, ५, ६, ८–११, १४, १६, २०, २३, २५, २९ निचृद् गायत्री। १८, २१, २७, २८ विराड् गायत्री। ३० यवमध्या गायत्री ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Soma, lord of bliss, is self-refulgent and holy, purest and most purifying, omniscient, dearest love of the poets and celebrants, and wisest of the wise. Creating the dynamic world of matter, energy and mind, he abides like the master of the universal chariot.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात परमेश्वराला चेतन स्वरूप वर्णन करण्यासाठी चेतन शब्द स्पष्ट आलेला आहे. ज्या लोकांचे हे म्हणणे आहे की वेदात परमेश्वराला ज्ञानस्वरूप म्हणणारे शब्द नाहीत त्यांनी या मंत्रातून शिकवण घेतली पाहिजे. ॥१०॥

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