ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 64/ मन्त्र 19
मिमा॑ति॒ वह्नि॒रेत॑शः प॒दं यु॑जा॒न ऋक्व॑भिः । प्र यत्स॑मु॒द्र आहि॑तः ॥
स्वर सहित पद पाठमिमा॑ति । वह्निः॑ । एत॑शः । प॒दम् । यु॒जा॒नः । ऋक्व॑ऽभिः । प्र । यत् । स॒मु॒द्रे । आऽहि॑तः ॥
स्वर रहित मन्त्र
मिमाति वह्निरेतशः पदं युजान ऋक्वभिः । प्र यत्समुद्र आहितः ॥
स्वर रहित पद पाठमिमाति । वह्निः । एतशः । पदम् । युजानः । ऋक्वऽभिः । प्र । यत् । समुद्रे । आऽहितः ॥ ९.६४.१९
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 64; मन्त्र » 19
अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 39; मन्त्र » 4
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अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 39; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
हे परमात्मन् ! (ऋक्वभिः) ऋत्विग्भिः (यत्) यदा (वह्निः) हवनीयाग्निः (एतशः) यो हि दिव्यशक्तिसम्पन्नोऽस्ति (मिमाति) प्रज्वलितः क्रियते तदा (युजानः) यज्ञप्रयुक्तः परमात्मा यो हि (समुद्रे) भक्त्या नम्रीभूतेऽन्तःकरणे (प्राहितः) स्थिरो भवति स परमात्मा (पदम्) स्वपदं दधाति ॥१९॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे परमात्मन् ! (ऋक्वभिः) ऋत्विक् लोगों से (यत्) जब (बुद्धिः) हवन की अग्नि (एतशः) जो दिव्यशक्तिसम्पन्न है (मिमाति) प्रज्वलित की जाती है, तब (युजानः) यज्ञ में युक्त होनेवाला परमात्मा, जो (समुद्रे) भक्तिभाव से नम्रीभूत अन्तःकरणों में (प्राहितः) स्थिर रहता है, वह (पदम्) अपने पद को धारण करता है ॥१९॥
भावार्थ
जब यज्ञ करते हैं, तब उनके नम्रीभूत अन्तःकरणों में परमात्मा निवास करता है। यज्ञ शब्द के अर्थ यहाँ उपासनात्मक यज्ञ के हैं। यों तो जपयज्ञ, योगयज्ञ, कर्मयज्ञ इत्यादि अनेक प्रकार के यज्ञों में यज्ञ शब्द आता है, जिनके करनेवाले ऋत्विक् कहलाते हैं, परन्तु यहाँ ऋत्विक् शब्द का अर्थ उपासक है। जो ऋतु में अर्थात् प्रकृति के प्रत्येक भाव में उपासना करते हैं, उनको यहाँ ऋत्विक् कहा गया है ॥१९॥
विषय
पदं युजान ऋक्वभिः
पदार्थ
[१] यह (वह्निः) = सब कार्यों का साधक सोम [वह To carry ] (एतश:) = दीप्त होता हुआ, ज्ञानदीप्ति को बढ़ाता हुआ (मिमाति) = हमारे जीवन का निर्माण करता है । यह हमारे पदम् = जीवन मार्ग को (ऋक्वभिः) = विज्ञानों के साथ (युजान:) = जोड़ता है, विज्ञान के अनुसार मार्ग पर चलते हुए हम भटकने से बच जाते हैं। [२] न भटकनेवाला यह व्यक्ति आगे और आगे बढ़ता चलता है, (यत्) = जब कि अन्ततः यह (समुद्रे) = उस आनन्दमय प्रभु में (प्र आहितः) = प्रकर्षेण आहित होता है ।
भावार्थ
भावार्थ- सुरक्षित सोम हमारे जीवन का निर्माण करता है। यह हमारे मार्ग को विज्ञान से युक्त करता है और अन्ततः हमें प्रभु को प्राप्त कराता है।
विषय
ज्ञान वाणियों द्वारा परम-पद प्राप्ति।
भावार्थ
हे विद्वन् ! तू (एतशः) शुद्ध ज्योतिर्मय (वह्निः) कार्य-भार को वहन करने वाला, (ऋक्वभिः) उत्तम स्तुतिकर्ता एवं अर्चना और वेदमन्त्रों के प्रज्ञाता विद्वान् पुरुषों द्वारा (यत् समुद्रे प्र आहितः) जब समुद्रवत् अगाध, प्रभु के अधीन अच्छी प्रकार स्थापित किया जाता है तब तू (पदं युजानः) परम पद को समाहित, एकाग्र-चित्त से ध्यान करता हुआ उसको (मिमाति) भली प्रकार जान लेता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:– १, ३, ४, ७, १२, १३, १५, १७, १९, २२, २४, २६ गायत्री। २, ५, ६, ८–११, १४, १६, २०, २३, २५, २९ निचृद् गायत्री। १८, २१, २७, २८ विराड् गायत्री। ३० यवमध्या गायत्री ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
When the mind, agile communicative medium of experience and awareness, joins the object of meditation by virtue of all yajnic senses collected and concentrated in the ocean-like depth of infinity, the yogi reaches divine consciousness, voluable, in a state of undisturbed stability.
मराठी (1)
भावार्थ
याज्ञिक लोक जेव्हा यज्ञ करतात तेव्हा त्यांच्या नम्र अंत:करणात परमात्मा निवास करतो. यज्ञ शब्दाचा अर्थ येथे उपासनात्मक यज्ञ आहे. जपयज्ञ, योगयज्ञ, कर्मयज्ञ इत्यादी अनेक प्रकारच्या यज्ञात यज्ञ शब्द येतो. यज्ञ करणाऱ्यांना ऋत्विक म्हटले जाते; परंतु येथे ऋत्विक शब्दाचा अर्थ उपासक आहे. जे ऋतू ऋतूमध्ये अर्थात प्रकृतीच्या प्रत्येक (परिवर्तन चक्र) भावात उपासना करतात, त्यांना येथे ऋत्विक म्हटले आहे. ॥१९॥
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