ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 64/ मन्त्र 15
पु॒ना॒नो दे॒ववी॑तय॒ इन्द्र॑स्य याहि निष्कृ॒तम् । द्यु॒ता॒नो वा॒जिभि॑र्य॒तः ॥
स्वर सहित पद पाठपु॒ना॒नः । दे॒वऽवी॑तये॑ । इन्द्र॑स्य । या॒हि॒ । निः॒ऽकृ॒तम् । द्यु॒ता॒नः । वा॒जिऽभिः॑ । य॒तः ॥
स्वर रहित मन्त्र
पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम् । द्युतानो वाजिभिर्यतः ॥
स्वर रहित पद पाठपुनानः । देवऽवीतये । इन्द्रस्य । याहि । निःऽकृतम् । द्युतानः । वाजिऽभिः । यतः ॥ ९.६४.१५
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 64; मन्त्र » 15
अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 38; मन्त्र » 5
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अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 38; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
हे परमात्मन् ! भवान् (इन्द्रस्य) कर्मयोगिनः (देववीतये) ब्रह्मप्राप्तये (याहि) प्राप्तो भवतु (यतः) यस्मात् कारणात् त्वं (निष्कृतं द्युतानः) स्वाभाविकदीप्तिमानसि। तथा (वाजिभिः) उपासकैरुपास्यमानोऽसि। अथ च (पुनानः) सर्वान् पवित्रयसि। अतस्त्वमेव कर्मयोगिनो लक्ष्यतां प्राप्नुहि ॥१५॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे परमात्मन् ! आप (इन्द्रस्य) कर्मयोगी को (देववीतये) ब्रह्मप्राप्ति के लिये (याहि) प्राप्त हों। (यतः) क्योंकि आप (निष्कृतं द्युतानः) स्वाभाविक दीप्तिमान् हैं तथा (वाजिभिः) उपासक लोगों से उपासना किये जाते हैं और (पुनानः) सबको पवित्र करते हैं, इसलिये कर्मयोगी का लक्ष्य आप ही बनें ॥१५॥
भावार्थ
कर्मयोगी यहाँ उपलक्षणमात्र है। तात्पर्य यह है कि कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी अथवा अन्य कोई उपासक हो, इन सबको एकमात्र ईश्वर की ही उपासना करनी चाहिये, किसी अन्य की नहीं ॥१५॥
विषय
पुनानः- द्युमान:
पदार्थ
[१] (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ तू, हे सोम ! देववीतये - दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिये हो । दिव्य गुणों को प्राप्त कराता हुआ तू (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (निष्कृतम्) = पवित्र किये हुए हृदय को (याहि) = प्राप्त हो । वस्तुतः सोमरक्षण से ही हृदय की पवित्रता सिद्ध होती है और हमारे जीवनों में दिव्य गुणों का विकास होता है । जितेन्द्रियता सोमरक्षण का प्रमुख साधन है । [२] हे सोम ! तू (द्युतान:) = ज्ञान का विस्तार करनेवाला है, और (वाजिभिः) = [ वज् गतौ ] गतिशील पुरुषों से (यतः) = संयत किया जाता है। सदा गति में रहनेवाले क्रियाशील पुरुष ही वासनाओं से बच पाते हैं और सोम का रक्षण करनेवाले होते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ-रक्षित हुआ हुआ सोम हमारे जीवन को पवित्र व प्रकाशमय बनाता है।
विषय
विवेक से राजत्व पद और प्रभु पद की प्राप्ति।
भावार्थ
हे विद्वन् ! तू (पुनानः) सत्यासत्य का विवेक करता हुआ और (द्युतानः) तेजस्वी होता हुआ, (वाजिभिः यतः) बलवान् पुरुषों से सुप्रबद्ध होकर (देव-वीतये) मनुष्यों की रक्षा के लिये (इन्द्रस्य निष्कृतम् याहि) ऐश्वर्यवान्, शत्रुहन्ता राजा के परम पद को प्राप्त हो। (२) अध्यात्म में मनुष्य अपने को पवित्र करता हुआ, तेजस्वी होकर, विद्वान् ज्ञानी पुरुषों द्वारा शिक्षित संयमी होकर, प्रभु की प्राप्ति के लिये गुरु या परमेश्वर की शरण जाय।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:– १, ३, ४, ७, १२, १३, १५, १७, १९, २२, २४, २६ गायत्री। २, ५, ६, ८–११, १४, १६, २०, २३, २५, २९ निचृद् गायत्री। १८, २१, २७, २८ विराड् गायत्री। ३० यवमध्या गायत्री ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Purified, bright and clear Soma, songs of adoration for service of divinity, go upto the presence of Indra, lord omnipotent. Shining powerful, sent up, inspired by enthusiastic celebrants, rise up to divinity.
मराठी (1)
भावार्थ
कर्मयोगी येथे उपलक्षण आहे. तात्पर्य हे आहे की कर्मयोगी व ज्ञानयोगी किंवा दुसरा कोणी उपासक असेल त्या सर्वांनी एकमात्र त्या परमेश्वराची उपासना केली पाहिजे दुसऱ्या कुणाची नाही. ॥१५॥
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