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अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 5 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 11/ सूक्त 5/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - ब्रह्मचारी छन्दः - पुरोऽतिजागतविराड्गर्भा त्रिष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्मचर्य सूक्त
    271

    ब्रह्मचा॒रीष्णंश्च॑रति॒ रोद॑सी उ॒भे तस्मि॑न्दे॒वाः संम॑नसो भवन्ति। स दा॑धार पृथि॒वीं दिवं॑ च॒ स आ॑चा॒र्यं तप॑सा पिपर्ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ब्र॒ह्म॒ऽचा॒री । इ॒ष्णन् । च॒र॒ति॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । तस्मि॑न् । दे॒वा: । सम्ऽम॑नस: । भ॒व॒न्ति॒ । स: । दा॒धा॒र॒ । पृ॒थि॒वीम् । दिव॑म् । च॒ । स: । आ॒ऽचा॒र्य᳡म् । तप॑सा । पि॒प॒र्ति॒ ॥७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ब्रह्मचारीष्णंश्चरति रोदसी उभे तस्मिन्देवाः संमनसो भवन्ति। स दाधार पृथिवीं दिवं च स आचार्यं तपसा पिपर्ति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ब्रह्मऽचारी । इष्णन् । चरति । रोदसी इति । उभे इति । तस्मिन् । देवा: । सम्ऽमनस: । भवन्ति । स: । दाधार । पृथिवीम् । दिवम् । च । स: । आऽचार्यम् । तपसा । पिपर्ति ॥७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (ब्रह्मचारी) ब्रह्मचारी [वेदपाठी और वीर्यनिग्राहक पुरुष] (उभे) दोनों (रोदसी) सूर्य और पृथिवी को (इष्णन्) लगातार खोजता हुआ (चरति) विचरता है, (तस्मिन्) उस [ब्रह्मचारी] में (देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (संमनसः) एक मन (भवन्ति) होते हैं। (सः) उस ने (पृथिवीम्) पृथिवी (च) और (दिवम्) सूर्यलोक को (दाधार) धारण किया है [उपयोगी बनाया है], (सः) वह (आचार्यम्) आचार्य [साङ्गोपाङ्ग वेदों के पढ़ानेवाले पुरुष] को (तपसा) अपने तप से (पिपर्ति) परिपूर्ण करता है ॥१॥

    भावार्थ - ब्रह्मचारी वेदाध्ययन और इन्द्रियदमनरूप तपोबल से सब सूर्य, पृथिवी आदि स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों का ज्ञान पाकर और सबसे उपकार लेकर विद्वानों को प्रसन्न करता हुआ वेदविद्या के प्रचार से आचार्य का इष्ट सिद्ध करता है ॥१॥


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    Meaning -
    This sukta covers the basic discipline of the first phase of life which is Brahmacharya. This is the period of preparation for life with dedication to Brahma, comprehensive knowledge of nature, human society and Divinity, and austere, not indulgent, discipline of living for the development of body, mind and spirit. The Sukta is relevant to both boys and girls as is clear from mantra 18. But the word ‘Brahmachari’, like the word ‘Atman’, is masculine gender grammatically, the pronoun used for “Brahmachari’ is ‘he’which does not rule out the Brahmacharini, ‘she’. Brhmacharya and education is necessary and indispensable for both men and women. However, Vedic tradition requires that schools for boys and girls should be separate. Keen to learn, the Brahmachari ranges freely over both earth and heaven. In him, the devas, i.e., organs of the body, senses, mind and the spirit, with their elemental deities, become united, consonant and cooperative (not disunited, dissonant and conflictive, their purpose being holistic). He holds the secular and sacred knowledge of earth and heaven in trust, and with austere discipline and dedication gives his teacher the joy of fulfilment. (For harmony of the individual human personality and the devas, mind and senses, refer to Atharva-veda 10, 2, 31 and Aitareyopanishad, 1, 2, 1-5.)


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