अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 13
अ॒जो ह्यग्नेरज॑निष्ट॒ शोका॒द्विप्रो॒ विप्र॑स्य॒ सह॑सो विप॒श्चित्। इ॒ष्टं पू॒र्तम॒भिपू॑र्तं॒ वष॑ट्कृतं॒ तद्दे॒वा ऋ॑तु॒शः क॑ल्पयन्तु ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒ज: । हि । अ॒ग्ने: । अज॑निष्ट । शोका॑त् । विप्र॑: । विप्र॑स्य । सह॑स: । वि॒प॒:ऽचित् । इ॒ष्टम् । पू॒र्तम् । अ॒भिऽपू॑र्तम् । वष॑ट्ऽकृतम् । तत् । दे॒वा: । ऋ॒तु॒ऽश: । क॒ल्प॒य॒न्तु॒ ॥५.१३॥
स्वर रहित मन्त्र
अजो ह्यग्नेरजनिष्ट शोकाद्विप्रो विप्रस्य सहसो विपश्चित्। इष्टं पूर्तमभिपूर्तं वषट्कृतं तद्देवा ऋतुशः कल्पयन्तु ॥
स्वर रहित पद पाठअज: । हि । अग्ने: । अजनिष्ट । शोकात् । विप्र: । विप्रस्य । सहस: । विप:ऽचित् । इष्टम् । पूर्तम् । अभिऽपूर्तम् । वषट्ऽकृतम् । तत् । देवा: । ऋतुऽश: । कल्पयन्तु ॥५.१३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थ
(अजः) अजन्मा वा गतिशील जीवात्मा (शोकाद्) दीप्यमान (अग्नेः) सर्वव्यापक परमेश्वर से (हि) ही (अजनिष्ट) प्रकट हुआ है, [वह] (विप्रः) बुद्धिमान् [जीव] (विप्रस्य) बुद्धिमान् [परमेश्वर] के (सहसः) बल का (विपश्चित्) भले प्रकार विचारनेवाला है। (तत्) इसलिये (देवाः) विद्वान् लोग (अभिपूर्तम्) सम्पूर्ण (वषट्कृतम्) भक्ति से सिद्ध किये हुए (इष्टम्) यज्ञ, वेदाध्ययन आदि और (पूर्तम्) अन्नदानादि पुण्यकर्म को (ऋतुशः) प्रत्येक ऋतु में (कल्पयन्तु) समर्थ करें ॥१३॥
भावार्थ
मनुष्य परमेश्वर की महिमा को जानकर अपने सब उत्तम कर्मों को सब काल में सिद्ध करें ॥१३॥ इस मन्त्र का प्रथम पाद आ चुका है-अ० ४।१४।१ ॥
टिप्पणी
१३−(अजः) म० १। जीवात्मा (हि) निश्चयेन (अग्नेः) सर्वव्यापकात् परमेश्वरात् (अजनिष्ट) प्रादुरभूत् (शोकात्) अ० ४।१४।१। दीप्यमानात् (विप्रः) अ० ३।३।२। मेधावी जीवात्मा (विप्रस्य) मेधाविनः परमेश्वरस्य (सहसः) बलस्य (विपश्चित्) अ० ६।५२।३। विविधं प्रकर्षेण चेतिता ज्ञाता (इष्टम्) अ० २।१२।४। यज्ञवेदाध्ययनादि कर्म (पूर्तम्) अन्नदानादि पुण्यकर्म (अभिपूर्तम्) सम्पूर्णम् (वषट्कृतम्) अ० १।११।१। वह प्रापणे-डषटि+करोतेः क्त। भक्त्या निष्पादितम् (तत्) तस्मात् (देवाः) विद्वांसः (ऋतुशः) संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम्। पा० ५।४।४३। ऋतु-शस्। ऋतुवृतौ। काले काले (कल्पयन्तु) समर्थयन्तु ॥
विषय
अज, विप्र, विपश्चित्
पदार्थ
१. (अग्ने:) = प्रकाशमय अग्रणी प्रभु की (शोकात्) = दीप्ति से यह उपासक भी (हि) = निश्चय से (अजः अजनष्टि) = गति के द्वारा बुराई को परे फेंकनेवाला बनता है। प्रभु की दीसि इसके जीवन को पवित्र बना डालती है। यह (विप्रस्य) = [वि+प्रा] विशेषरूप से पूरण करनेवाले प्रभु के (सहस:) = बल से (विप्रः) = अपना पूरण करनेवाला (विपश्चित) = ज्ञानी बनता है। २. यह 'अज, विप्र, विपश्चित्' गति-[कर्म]-शील, अपना पूरण करनेवाला [उपासना], ज्ञानी [ज्ञान] देव बनता है। ये (देवा:) = देव (वषट् कृतम्) = जिसमें स्वार्थ की आहुति दे दी जाती है, (तत् इष्टम्) = उस यज्ञ को तथा (अभिपूर्तम्) = मनुष्यों व पशु-पक्षियों-दोनों के पूरण करनेवाले (पूर्तम्) = वापी, कूप तड़ागादि के निर्माणरूप कार्य को (ऋतुश:) = प्रत्येक ऋतु में-ऋतु की आवश्यकता के अनुसार (कल्पयन्तु) = सिद्ध करें। इष्ट व पूर्त के द्वारा ये संसार को सुखमय बनाने के लिए यनशील हों।
भावार्थ
प्रभु की दीप्ति जीवों को 'अज'-गति द्वारा बुराई को परे फेंकनेवाला बनाती है। 'सर्वतः पूर्ण प्रभु की शक्ति से यह जीव पूर्ण व ज्ञानी [विप्र-विपश्चित्] बनता है। इन देवपुरुषों को चाहिए कि ऋतु के अनुसार 'इष्ट और पूर्त' को सिद्ध करते हुए संसार का पूरण करें इसे सुखमय बनाएँ।
भाषार्थ
(अग्नेः) अग्नि स्वरूप परमेश्वर के (शोकात्) प्रकाश से मुमुक्षु, (अजः) पुनर्जन्म से रहित (अजनिष्ट) हुआ है, वह (विप्रस्य) मेधावी परमेश्वर की (सहसः) शक्ति से (विप्रः) मेधावी तथा (विपश्चित्) ज्ञानी हुआ है। अतः (देवाः) देव अर्थात् इस के सम्बन्धी मातृदेव, पितृदेव आचार्यदेव [इस प्रसन्नता में] (इष्टम्) यथेष्ट (पूर्त्तम्) सामाजिक दान, (अभिपूर्तम्) बहुदान तथा (वषट्कृतम्) यज्ञाहुतियां (ऋतुशः) समयानुसार (कल्पयन्तु) करें।
टिप्पणी
[अग्निः=परमेश्वर “तदेवाग्निस्तदादित्यस्तदु वायुस्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ताऽआपः स प्रजापतिः।।(यजु० ३२।१)। मन्त्रोक्त वर्णन “वकरा” अर्थ में सम्भव नहीं]
विषय
अज के दृष्टान्त से पञ्चौदन आत्मा का वर्णन।
भावार्थ
(अजः) अज, आत्मा (विप्रः) मेधावी, पूर्णकाम (सहसः) उस बलशाली परमात्मा से (विपश्चित्) समस्त ज्ञान और कर्मों का संग्रह करने हारा होकर (अग्नेः) उस प्रकाशस्वरूप (विग्रस्य) परम मेधावी परमात्मा के (शोकात्) प्रकाश से (अजनिष्ट) प्रकाशित होता है। इसलिये इस पद को प्राप्त होने के लिये हे (देवाः) विद्वान् पुरुषो ! आप लोग अपनी आत्मा की उन्नति के लिये (इष्टम्) यज्ञ याग (पूर्तम्) प्रजा के पालनार्थ परोपकार के कार्यों (अभिपूर्तम्) आत्मा के पालनार्थ सत्य भाषणादि कार्य और (वषट्-कृतम्) स्वाहाकार आदि यज्ञों को (ऋतुशः) ठीक ठीक ऋतुओं के अनुसार (कल्पयन्तु) किया करो। इससे प्रजा में सुख शान्ति होकर ध्यान, तप आदि करने का उत्तम अवसर प्राप्त होगा।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृगुर्ऋषिः। अजः पञ्चोदनो देवता। १, २, ५, ९, १२, १३, १५, १९, २५, त्रिष्टुभः, ३ चतुष्पात् पुरोऽति शक्वरी जगती, ४, १० नगत्यौ, १४, १७,२७, ३०, अनुष्टुभः ३० ककुम्मती, २३ पुर उष्णिक्, १६ त्रिपाद अनुष्टुप्, १८,३७ त्रिपाद विराड् गायत्री, २४ पञ्चपदाऽनुपटुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बर्हता विराड् जगती २०-२२,२६ पञ्चपदाउष्णिग् गर्भोपरिष्टाद्बर्हता भुरिजः, ३१ सप्तपदा अष्टिः, ३३-३५ दशपदाः प्रकृतयः, ३६ दशपदा प्रकृतिः, ३८ एकावसाना द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप, अष्टात्रिंशदर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
The Soul, the Pilgrim
Meaning
Aja, the unborn immortal soul, is come into the world of existence by virtue of the light and love of Agni, self-refulgent Supreme Brahma. It is wise and vibrant by virtue of the omnipresent vibrance and omnipotence of Agni. May the Devas, divinities of nature and enlightened nobilities of humanity, help it to grow according to the time and season of its growth and to rise to self-fulfilment in whatever it desires, completes and offers through self-surrender towards whatever it wants to achieve.
Translation
The (pancaudana) aja is born, indeed, from the glow of the adorable Lord, this inspired wise one from the overpowering might of the wide lord, May the enlightened ones prepare all that - the sacrificial offerings, philanthropic donations, and bestowals offered with vasat according to proper seasons.
Translation
This eternal soul which is endowed with knowledge and observes of the world is manifest in the body from the glamouring heat of all knowledge, almighty Divinity. So let the learned men arrange and perform full-fledged yajnas. act of devotion and act of benevolence at proper seasons.
Translation
The unborn soul springs from the glow of God. The wise soul understands the strength of the Wise God. Hence the learned should arrange at proper seasons, the study of the Vedas, and performance of noble deeds of charity, with full devotion.
Footnote
Springs: Assumes bodily form.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१३−(अजः) म० १। जीवात्मा (हि) निश्चयेन (अग्नेः) सर्वव्यापकात् परमेश्वरात् (अजनिष्ट) प्रादुरभूत् (शोकात्) अ० ४।१४।१। दीप्यमानात् (विप्रः) अ० ३।३।२। मेधावी जीवात्मा (विप्रस्य) मेधाविनः परमेश्वरस्य (सहसः) बलस्य (विपश्चित्) अ० ६।५२।३। विविधं प्रकर्षेण चेतिता ज्ञाता (इष्टम्) अ० २।१२।४। यज्ञवेदाध्ययनादि कर्म (पूर्तम्) अन्नदानादि पुण्यकर्म (अभिपूर्तम्) सम्पूर्णम् (वषट्कृतम्) अ० १।११।१। वह प्रापणे-डषटि+करोतेः क्त। भक्त्या निष्पादितम् (तत्) तस्मात् (देवाः) विद्वांसः (ऋतुशः) संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम्। पा० ५।४।४३। ऋतु-शस्। ऋतुवृतौ। काले काले (कल्पयन्तु) समर्थयन्तु ॥
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