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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 25
    ऋषिः - भृगुः देवता - अजः पञ्चौदनः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - अज सूक्त
    97

    पञ्च॑ रु॒क्मा पञ्च॒ नवा॑नि॒ वस्त्रा॒ पञ्चा॑स्मै धे॒नवः॑ काम॒दुघा॑ भवन्ति। यो॒जं पञ्चौ॑दनं॒ दक्षि॑णाज्योतिषं॒ ददा॑ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पञ्च॑ । रु॒क्मा । पञ्च॑ । नवा॑नि । वस्रा॑ । पञ्च॑ । अ॒स्मै॒ । धे॒नव॑: । का॒म॒ऽदुघा॑: । भ॒व॒न्ति॒ । य: । अ॒जम् । पञ्च॑ऽओदनम् । दक्षि॑णाऽज्योतिषम् । ददा॑ति ॥५.२५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पञ्च रुक्मा पञ्च नवानि वस्त्रा पञ्चास्मै धेनवः कामदुघा भवन्ति। योजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पञ्च । रुक्मा । पञ्च । नवानि । वस्रा । पञ्च । अस्मै । धेनव: । कामऽदुघा: । भवन्ति । य: । अजम् । पञ्चऽओदनम् । दक्षिणाऽज्योतिषम् । ददाति ॥५.२५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 5; मन्त्र » 25
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    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

    पदार्थ

    (पञ्च) विस्तृत (रुक्मा) रोचक वस्तुएँ [सुवर्ण आदि], (पञ्च) विस्तृत (नवानि) नवीन (वस्त्रा) वस्त्र, और (पञ्च) विस्तृत (धेनवः) तृप्त करनेवाली वेद वाचाएँ [विद्याएँ] (अस्मै) उस [पुरुष] के लिये (कामदुघाः) कामनाएँ पूरी करनेवाली (भवन्ति) होती हैं। (यः) जो पुरुष (पञ्चौदनम्) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] के सींचनेवाले, (दक्षिणाज्योतिषम्) दानक्रिया की ज्योति रखनेवाले (अजम्) अजन्मे वा गतिशील परमात्मा को [अपने आत्मा में] (ददाति) समर्पित करता है ॥२५॥

    भावार्थ

    आत्मत्यागी मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से सब प्रकार के सुख प्राप्त करता है ॥२५॥

    टिप्पणी

    २५−(पञ्च) सप्यशूभ्यां तुट् च। उ० १।१५७। पचि विस्तारे-कनिन्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। जसः सुः। विस्तृतानि (रुक्मा) युजिरुचितिजां कुश्च। उ० १।१४६। रुच दीप्तावभिप्रीतौ च-मक् कुत्वं च। रोचकानि वस्तूनि सुवर्णादीनि (पञ्च) (नवानि) नूतनानि (वस्त्रा) वासांसि (पञ्च) विस्तृताः (अस्मै) पुरुषाय (धेनवः) अ० ७।७३।२। तर्पयित्र्यो वेदवाचः (कामदुघाः) अ० ४।३४।८। कामानां पूरयित्र्यः (भवन्ति) सन्ति। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    दीसि-ही-दीप्ति तथा स्वर्ग-प्राप्ति

    पदार्थ

    १. (य:) = जो (पञ्चौदनम्) = पाँचों भूतों से बने संसार को प्रलयकाल में अपना ओदन बना लेता है उस (दक्षिणायोतिषम्) = दान की ज्योतिवाले-सर्वत्र दानों व प्रकाशवाले (अजम्) = अजन्मा प्रभु के प्रति (ददाति) = अपने को दे डालता है, (अस्मै) = अपने को प्रभु के लिए अर्पण करनेवाले इस पुरुष के लिए (पञ्च रुक्मा) = पाँचों कर्मेन्द्रियों यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त हुई-हुई देदीप्यमान [रुच दीप्ती] भवन्ति-हो जाती हैं। (पञ्च वस्त्रा) = 'अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय व आनन्दमय कोशरूप पाँचों वस्त्र (नवानि) = नये व स्तुत्य हो जाते हैं। (पञ्च धेनवः) = ज्ञानदुग्ध का दोहन करनेवाली पाँचों ज्ञानेन्द्रियों (कामदुघा) = कमनीय ज्ञानदुग्ध को देनेवाली व सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाली हो जाती हैं। २. (पञ्च रुक्मा) = देदीप्यमान पाँचों इन्द्रियाँ (अस्मै) = इसके लिए (ज्योतिः भवन्ति) = प्रकाश-ही-प्रकाश हो जाती हैं। (वासांसि) = पाँचों कोशरूप वस्त्र (तन्वे) = इसके शरीर के लिए व शक्ति-विस्तार के लिए (वर्म भवन्ति) = कवच बन जाते हैं। इन कवचों से आवृत्त हुआ-हुआ यह किन्हीं भी वासनारूप शत्रुओं से आक्रान्त नहीं होता। इसप्रकार यह स्वर्ग लोकम् (अश्नुते) = स्वर्गलोक को प्राप्त करता है-आनन्दमय जीवनवाला व मोक्ष को प्राप्त करनेवाला बनता है|

    भावार्थ

    प्रभु के प्रति समर्पण करने से पाँचों कर्मेन्द्रियाँ दीप्त होती हैं, पाँचों कोश स्तुत्य बनते हैं, पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ कमनीय व ज्ञानदुग्ध का दोहन करनेवाली होती हैं। यह समर्पक स्वर्ग व आनन्दमय लोक को प्रास करता है।

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    भाषार्थ

    (अस्मै) इस अध्यात्मगुरु के लिये (पञ्च रुक्मा) पांच सुवर्णाभूषण, (पञ्च नवानि वस्त्रा) पांच नवीन वस्त्र, (पञ्च कामदुघाः धेनवः) पांच यथेच्छ दूध देने वाली दुधारू गौएं (भवन्ति) देय होती हैं (यः) जो अध्यात्मगुरु (पञ्चौदनम्) पांच भोगों के स्वामी, (अजम्) अकाय, तथा (दक्षिणाज्योतिषम्) ज्योतिः स्वरूप परमेश्वर को दक्षिणा के फलस्वरूप में प्रदान करता है।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में "पञ्च” शब्द का प्रयोग हुआ है। इसलिये क्योंकि अध्यात्म गुरु ने पञ्च-इन्द्रिय भोगों पर शिष्य की विजय कराई है। प्रत्येक इन्द्रिय भोग पर विजय प्राप्त कराने के लिये, गुरु एक-एक सुवर्णाभूषण, वस्त्र, तथा उत्तम धेनु की प्राप्ति का अधिकारी होता है। इन्द्रिय भोगों पर विजय प्राप्त कराकर शिष्य के जीवन को सफल बनाना कोई साधारण कार्य नहीं। तो भी परिणाम रूप में कथित दक्षिणा, है भी मामूली। शिष्य पांच सुवर्णमालाएं तो कृतज्ञता रूप में गुरु की गर्दन पर पहनाता है, मुर्झा जाने वाली पुष्पमालाएं नहीं, तथा गुरु के परिधान के लिये पांच नवीन वस्त्र, तथा दुग्धसेवी गुरु के लिये पांच गौएं देता है, जिस द्वारा गुरु के परिवार का पालन-पोषण हो सके। पांच सुवर्ण-मालाएं भी तात्कालिक समारोह में गुरु के सम्मान के लिये ही हैं, गुरु ने स्वयं तो उन्हें पहिने नहीं रखना। ये भी गुरु के परिवार के लिये उपयोगी हो सकती हैं]

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    विषय

    अज के दृष्टान्त से पञ्चौदन आत्मा का वर्णन।

    भावार्थ

    (यः अजं पञ्चोदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति) जो पुरुष ज्योतिःस्वरूप पञ्चौदन अज को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देता है (अस्मै) उस पुरुष को (पञ्च रुक्मा) पांचों रुचिकर, सुवर्ण रूप पांचों प्रकार के भोग्य पदार्थ, (पञ्च नवानि वस्त्रा) पांचों नये वस्त्र अर्थात् पांचों कोश और (अस्मै) उस के लिये (पञ्च धेनवः) पांचों ज्ञानेन्द्रिय रूप धेनुएं (काम-दुधाः) यथेष्ट फल देने वाली कामधेनु के समान (भवन्ति) हो जाती हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृगुर्ऋषिः। अजः पञ्चोदनो देवता। १, २, ५, ९, १२, १३, १५, १९, २५, त्रिष्टुभः, ३ चतुष्पात् पुरोऽति शक्वरी जगती, ४, १० नगत्यौ, १४, १७,२७, ३०, अनुष्टुभः ३० ककुम्मती, २३ पुर उष्णिक्, १६ त्रिपाद अनुष्टुप्, १८,३७ त्रिपाद विराड् गायत्री, २४ पञ्चपदाऽनुपटुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बर्हता विराड् जगती २०-२२,२६ पञ्चपदाउष्णिग् गर्भोपरिष्टाद्बर्हता भुरिजः, ३१ सप्तपदा अष्टिः, ३३-३५ दशपदाः प्रकृतयः, ३६ दशपदा प्रकृतिः, ३८ एकावसाना द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप, अष्टात्रिंशदर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Soul, the Pilgrim

    Meaning

    Five golden glories of pranic energy, five renewed koshas, vestments of the soul, and five senses, all efficient givers of perception for discriminative judgement, become his holy cows and serve him like universal benefactors when he offers the immortal soul of five-fold existence clothed in light and generosity to the eternal Lord for his divine yajna.

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    Translation

    Five gold coins, five new garments, and five milch-cows yielding milk whenever one desires, are for him, whoso offers a pancaudana aja brightened with sacrificial gifts.

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    Translation

    For him who surrenders to God the eternal soul living in the body and possessing the light of knowledge five shining objects of perception, five good sheaths and five cognitive organs become the fulfiller of all desires.

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    Translation

    He, who dedicates himself to the Unborn God, the Absorber of five elements, illumined with charity, gets various precious articles like gold, many new garments, and many Vedic verses, which fulfill all his wishes.

    Footnote

    Pt. Jaidev Vidyalankar has translated पंचवस्त्राःfive sheaths (Koshas), पंचधेनवः as five organs of cognition.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २५−(पञ्च) सप्यशूभ्यां तुट् च। उ० १।१५७। पचि विस्तारे-कनिन्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। जसः सुः। विस्तृतानि (रुक्मा) युजिरुचितिजां कुश्च। उ० १।१४६। रुच दीप्तावभिप्रीतौ च-मक् कुत्वं च। रोचकानि वस्तूनि सुवर्णादीनि (पञ्च) (नवानि) नूतनानि (वस्त्रा) वासांसि (पञ्च) विस्तृताः (अस्मै) पुरुषाय (धेनवः) अ० ७।७३।२। तर्पयित्र्यो वेदवाचः (कामदुघाः) अ० ४।३४।८। कामानां पूरयित्र्यः (भवन्ति) सन्ति। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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