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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 14
    ऋषिः - भृगुः देवता - अजः पञ्चौदनः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अज सूक्त
    62

    अ॑मो॒तं वासो॑ दद्या॒द्धिर॑ण्य॒मपि॒ दक्षि॑णाम्। तथा॑ लो॒कान्त्समा॑प्नोति॒ ये दि॒व्या ये च॒ पार्थि॑वाः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒मा॒ऽउ॒तम् । वास॑: । द॒द्या॒त्‌ । हिर॑ण्यम् । अपि॑ । दक्षि॑णाम् । तथा॑ । लो॒कान् । सम् । आ॒प्नो॒ति॒ । ये । दि॒व्या: । ये । च॒ । पार्थि॑वा: ॥५.१४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अमोतं वासो दद्याद्धिरण्यमपि दक्षिणाम्। तथा लोकान्त्समाप्नोति ये दिव्या ये च पार्थिवाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अमाऽउतम् । वास: । दद्यात्‌ । हिरण्यम् । अपि । दक्षिणाम् । तथा । लोकान् । सम् । आप्नोति । ये । दिव्या: । ये । च । पार्थिवा: ॥५.१४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 5; मन्त्र » 14
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

    पदार्थ

    वह (अमोतम्) ज्ञान के साथ बुना हुआ (वासः) वस्त्र और (हिरण्यम्) सुवर्ण (अपि) भी (दक्षिणाम्) दक्षिणा (दद्यात्) देवे। (तथा) उससे वह [उन] (लोकान्) लोकों को (सम्) पूरा-पूरा (आप्नोति) पाता है (ये) जो (दिव्याः) अन्तरिक्ष के (च) और (ये) जो (पार्थिवाः) पृथिवी के हैं ॥१४॥

    भावार्थ

    मनुष्य सुपात्रों का यथावत् उत्तम पदार्थों से सत्कार करके संसार में प्रतिष्ठा बढ़ावें ॥१४॥

    टिप्पणी

    १४−(अमोतम्) पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण। पा० ३।™™३।११८। अम गतौ+घ प्रत्ययः, टाप्-वेञ् तन्तुसन्ताने-क्त, सम्प्रसारणं च। ज्ञानेन स्यूतम् (वासः) वस्त्रम् (दद्यात्) (हिरण्यम्) सुवर्णम् (अपि) (दक्षिणाम्) दानम् (तथा) तेन प्रकारेण (लोकान्) प्रतिष्ठास्थानानि (सम्) सम्यक् (आप्नोति) प्राप्नोति (ये) लोकाः (दिव्याः) दिवि अन्तरिक्षे भवाः (ये) (च) (पार्थिवाः) पृथिव्यां भवाः ॥

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    विषय

    'अमोतं वास:+हिरण्यम्'-दक्षिणा [प्रभुदक्षिणा]

    पदार्थ

    १. जीव को कर्मानुसार यह शरीर प्राप्त होता है। यह शरीर एक वस्त्र है जोकि हमारे कर्मों से बुना गया है [वासांसि जीर्णानि यथा विहाय]। इस (अमा उतम्) = हमारी गतियों [अम गतौ] से बुने गये (वास:)=- शरीररूप वस्त्र को तथा (हिरण्यम् अपि) = [हिरण्यं वै वीर्यम, हिरण्यं वै ज्योतिः] अपनी शक्ति व ज्योति को भी (दक्षिणां दद्यात्) = दक्षिणारूप से प्रभु को दे दे। वस्तुतः प्रभु ही तो हमारे जीवन-यज्ञ को चला रहे हैं, अत: इस 'शरीर, शक्ति व ज्योति' को प्रभु के प्रति दक्षिणारूप में देना ही चाहिए। इन्हें प्रभु का ही समझना न कि अपना। २. (तथा) = वैसा करने पर, अर्थात् 'शक्ति व ज्योति' सहित शरीर को प्रभु के प्रति अर्पण करने पर यह उपासक (लोकान) = उन सब लोकों को (समाप्नोति) = प्राप्त करता है, ये (दिव्या:) = जो दिव्य लोक हैं (च) = और ये (पार्थिवाः) = जो पार्थिव लोक हैं। दिव्य लोक मस्तिष्क है और पार्थिक लोक यह शरीर है। प्रभु के प्रति अपना समर्पण कर देनेवाले व्यक्ति का शरीर शक्ति से पूर्ण होता है तथा इसका मस्तिष्क ज्योति से देदीप्यमान होता है।

    भावार्थ

    हम कर्मानुसार प्राप्त इस शरीर को, शरीर की शक्ति व ज्योति को हमारे जीवन यज्ञ का संचालन करनेवाले प्रभु के प्रति दक्षिणारूप में दे दें। ऐसा करने पर मस्तिष्क व शरीर दोनों ही उत्तम बनते हैं।

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    भाषार्थ

    [मुमुक्षु] (अमोतम् वासः) घर में बुना वस्त्र, (अपि) तथा (हिरण्यम्) सोना (दक्षिणाम्) यज्ञ कराने वाले को दक्षिणा में (दद्यात्) दे। (तथा) इस प्रकार मुमुक्षु, (लोकान्) उन लोकों को (समाप्नोति) प्राप्त करता है, (ये दिव्याः) जो दिव्य हैं (ये च) और जो (पार्थिवाः) पार्थिव है (देखो मन्त्र २५, २६)

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    विषय

    अज के दृष्टान्त से पञ्चौदन आत्मा का वर्णन।

    भावार्थ

    ब्रह्मज्ञानी अपने उपदेश करनेवाले गुरुको (अमा-उत्तम्) अपने घर में बुना हुआ (वासः) वस्त्र (दधातु) देवे, और (हिरण्यम् अपि) सुवर्ण भी (दक्षिणाम्) दक्षिणा के रूप में दे। अर्थात् ब्रह्मज्ञानी अपने आप से प्राप्त किया आच्छादन यह शरीर और हिरण्य रूप आत्मा दोनों को गुरु-दक्षिणा रूप में परमात्मा के अर्पण कर दे। (तथा) उस प्रकार से (ये दिव्याः ये च पार्थिवाः) जो दिव्य और इस पृथिवी के लोक हैं उन (लोकान्) समस्त लोकों को (सम् आप्नोति) प्राप्त हो जाता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृगुर्ऋषिः। अजः पञ्चोदनो देवता। १, २, ५, ९, १२, १३, १५, १९, २५, त्रिष्टुभः, ३ चतुष्पात् पुरोऽति शक्वरी जगती, ४, १० नगत्यौ, १४, १७,२७, ३०, अनुष्टुभः ३० ककुम्मती, २३ पुर उष्णिक्, १६ त्रिपाद अनुष्टुप्, १८,३७ त्रिपाद विराड् गायत्री, २४ पञ्चपदाऽनुपटुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बर्हता विराड् जगती २०-२२,२६ पञ्चपदाउष्णिग् गर्भोपरिष्टाद्बर्हता भुरिजः, ३१ सप्तपदा अष्टिः, ३३-३५ दशपदाः प्रकृतयः, ३६ दशपदा प्रकृतिः, ३८ एकावसाना द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप, अष्टात्रिंशदर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Soul, the Pilgrim

    Meaning

    The aspirant to the state of fulfilment should surrender the warp and woof of his action and also whatever is the golden beauty of his achievement in the world as a gift of gratitude to the Lord Giver, and when he does so, then does he really achieve the states of highest being whether it is here on earth or in the heaven of light and bliss divine.

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    Translation

    One should offer a home-woven garment and also gold as priestly fee. Thus one wins completely, the worlds celestial, as well as the terrestrial.

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    Translation

    The man performing yajnas should give home-woven raiment and also gold as guerdon to priests. Thus he attains completely all the celestial and terrestrial worlds.

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    Translation

    Let a learned pupil give home-woven raiment, and gold as guerdon to his preceptor. So he obtains completely all celestial and terrestrial positions of dignity.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १४−(अमोतम्) पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण। पा० ३।™™३।११८। अम गतौ+घ प्रत्ययः, टाप्-वेञ् तन्तुसन्ताने-क्त, सम्प्रसारणं च। ज्ञानेन स्यूतम् (वासः) वस्त्रम् (दद्यात्) (हिरण्यम्) सुवर्णम् (अपि) (दक्षिणाम्) दानम् (तथा) तेन प्रकारेण (लोकान्) प्रतिष्ठास्थानानि (सम्) सम्यक् (आप्नोति) प्राप्नोति (ये) लोकाः (दिव्याः) दिवि अन्तरिक्षे भवाः (ये) (च) (पार्थिवाः) पृथिव्यां भवाः ॥

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