अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 21
ऋषिः - भृगुः
देवता - अजः पञ्चौदनः
छन्दः - पञ्चपदानुष्टुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बार्हताभुरिक्त्रिष्टुप्
सूक्तम् - अज सूक्त
91
स॒त्यं च॒र्तं च॒ चक्षु॑षी॒ विश्वं॑ स॒त्यं श्र॒द्धा प्रा॒णो वि॒राट्शिरः॑। ए॒ष वा अप॑रिमितो य॒ज्ञो यद॒जः पञ्चौ॑दनः ॥
स्वर सहित पद पाठस॒त्यम् । च॒ । ऋ॒तम् । च॒ । चक्षु॑षी॒ इति॑ । विश्व॑म् । स॒त्यम् । श्र॒ध्दा । प्रा॒ण: । वि॒ऽराट् । शिर॑: । ए॒ष: । वै । अप॑रिऽमित: । य॒ज्ञ: । यत् । अ॒ज: । पञ्च॑ऽओदन: ॥५.२१॥
स्वर रहित मन्त्र
सत्यं चर्तं च चक्षुषी विश्वं सत्यं श्रद्धा प्राणो विराट्शिरः। एष वा अपरिमितो यज्ञो यदजः पञ्चौदनः ॥
स्वर रहित पद पाठसत्यम् । च । ऋतम् । च । चक्षुषी इति । विश्वम् । सत्यम् । श्रध्दा । प्राण: । विऽराट् । शिर: । एष: । वै । अपरिऽमित: । यज्ञ: । यत् । अज: । पञ्चऽओदन: ॥५.२१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थ
(सत्यम्) सत्य [यथार्थस्वरूप वा अस्तित्व] (च च) और (ऋतम्) ऋत [वेद आदि यथार्थ शास्त्र] (चक्षुषी) [उसकी] दोनों आँखें, (विश्वम्) सब (सत्यम्) सत्य और (श्रद्धा) श्रद्धा (प्राणः) उसका प्राण, और (विराट्) विविध प्रकाशमान प्रकृति (शिरः) [उसका] शिर [हुआ]। (यत्) क्योंकि (एषः वै) यही (अपरिमितः) परिमाणरहित, (यज्ञः) पूजनीय (अजः) अजन्मा वा गतिशील परमात्मा (पञ्चौदनः) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] का सींचनेवाला है ॥२१॥
भावार्थ
सत्यस्वरूप, अनन्त, सब सृष्टि का स्वामी परमेश्वर सबका उपास्य देव है ॥२१॥
टिप्पणी
२१−(सत्यम्) अस सत्तायाम्-शतृ। सते हितम्-यत्। यथार्थस्वरूपम्। अस्तित्वम् (च) (ऋतम्) अञ्चिघृसिभ्यः क्तः। उ० ३।८९। ऋ गतौ-क्त। वेदादियथार्थशास्त्रम् (च) (चक्षुषी) नेत्रे (विश्वम्) सर्वम् (सत्यम्) (श्रद्धा) अ० ६।१३३।४। वेदेषु विश्वासः (प्राणः) (विराट्) विविधप्रकाशमाना प्रकृतिः (शिरः) (एषः) (वै) एव (अपरिमितः) परिमाणरहितः (यज्ञः) पूजनीयः (यत्) यस्मात् (अजः) परमेश्वरः (पञ्चौदनः) अ० ४।१४।७। पञ्चसु पृथिव्यादिभूतेषु ओदनः सेचनं यस्य सः ॥
विषय
सत्य व ऋतरूप आँखें
पदार्थ
१. (सत्यं च ऋतं च) = जीवात्म-सम्बन्धी नियम तथा प्रकृति-सम्बन्धी नियम (चक्षुषी) = उस विराट् पुरुष की आँखें हैं, (विश्वं सत्यम्) = सब सत्यज्ञान तथा (श्रद्धा) = श्रद्धा-उस विराट् शरीर में (प्राण:) = प्राण हैं। (विराट्) = विशिष्ट रूप से दीप्त सूर्यादि पिण्ड (शिर:) = उसके शिर-स्थानीय हैं। २. प्रभु के विराट् शरीर की यह कल्पना हुई है, परन्तु वस्तुतः (एष:) = यह प्रभु (वा) = निश्चय से (अपरिमित:) = किसी भी प्रकार से सीमित नहीं है। वे प्रभु (यज्ञ:) = पूजनीय-संगतिकरण योग्य व दानीय [अर्पणीय] है। (यत्) = जो ये (अजः) = अजन्मा प्रभु हैं, वे (पञ्चौदन:) = प्रलय के समय पाँचों भूतों से बने इस संसार को ओदन के रूप में ले-लेते हैं। ('यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदने। मृत्युर्यस्योपसेचनम्')।
भावार्थ
सत्य और ऋत उस विराट् पुरुष की आँखें हैं। सत्यज्ञान और श्रद्धा प्राण हैं, देदीप्यमान सूर्यादि पिण्ड सिर हैं। वस्तुत: वे प्रभु अपरिमित हैं, पूजनीय हैं, अजन्मा हैं और प्रलयकाल के समय पञ्चभूतों से बने इस संसार को खा-सा जाते हैं।
भाषार्थ
(सत्यं च ऋतं च) सत्य और नियम (चक्षुषी) दो आखें हैं; (विश्वं सत्यम्) सम्पूर्णरूप में सत्य और (श्रद्धा) अर्थात् उस सत्य का धारण करना है (प्राणः) प्राण, अर्थात् श्वास-और-प्रश्वास (विराट्) है (शिरः) सिर। (एषः) यह है (वै) निश्चय से (अपरिमितः यज्ञः) परिमाण रहित अर्थात् सर्वव्यापक यज्ञ (यद्) जोकि (पच्चौदनः अजः) पांचों भोगों का स्वामी “अज” है, जन्मरहित परमेश्वर है।
टिप्पणी
[मन्त्र २०, २१ में “अज” परमेश्वर को और ब्रह्माण्ड में उसके शरीरी-और-शरीरभाव को द्योतित किया है। जैसे अस्मदादि पिण्डों में आत्माओं और शरीरों का सम्बन्ध है, नियामक और नियंम्य भाव है, ऐसा ही सम्बन्ध है परमेश्वर और ब्रह्माण्ड का। अस्मदादि शारीरिक जीवनों में आत्मा और शरीर का सम्बन्ध भोग और अपवर्ग द्वारा प्रेरित है, और परमेश्वर और ब्रह्माण्ड का सम्बन्ध भोग करवाने और आत्माओं को मोक्ष दिलाने के लिये हैं, कर्मवासनाजन्य नहीं। यह भी जानना आवश्यक है कि जहां मन्त्रों में परमेश्वर के सम्बन्ध में शारीरिक अङ्गों का वर्णन हो, वहां उरस्, पृष्ठ आदि (मन्त्र २०) तथा चक्षुः शिरः आदि (मन्त्र ११) द्वारा ब्रह्माण्ड के अवयव ही समझने चाहियें, जो कि काल्पनिक ही होते हैं। परमेश्वर की दो आंखें हैं, सत्य और ऋत। इन द्वारा वह जगत् का निरीक्षण तथा शासन करता है। “विश्वं सत्यम्” को “बृहत्-सत्यम्” भी कहा है (अथर्व० १२।१।१)। वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रिय तथा सार्वभौम जीवनों में सदा सत्य व्यवहार ही “विश्वं सत्यम्” है। श्रद्धा है जीवन में श्रत् (सत्यम्, निघं० ३।१०) का + धा (धारण और पोषण करना)। ये दो हैं परमेश्वर के प्राणरूप, श्वास-प्रश्वासरूप, प्राणापानरूप। विराट् है विशेषेण दीप्यमाना द्यौः (वि + राजृ दीप्तौ), इसे शिरः कहा है अर्थात् परमेश्वर का शिर। “शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत” (यजु० ३१।१३), तथा “दिवं यश्चक्रे मूर्धानम्” (अथर्व० १०।७।३२) में द्यौः, दिव को सिर तथा मूर्धा कहा है। तथा “ते दिवमेव विराजं पञ्चमीं चितिमपश्यन्” (श० ब्रा० ८।५।१।२) में दिव् को विराट् कहा है। त्रिलोकी में सर्वोच्च होने से द्यौः त्रिलोकी का शिर है, जैसे कि मनुष्य का शिरः शरीर में सर्वोच्च है। इसी प्रकार विराट् को शिरः कहना उपयुक्त ही है। तथा विराट् निज दीप्ति से दीप्यमान है, शिरः भी निज ज्ञानदीप्ति से दीप्यमान होता है। अपरिमितः यज्ञः=परमेश्वर (यजु० ३१।६,७,९)। पिण्ड और ब्रह्माण्ड में प्रतिरूपता— उरः= पृथिवी कुक्षी= समुद्रौ पृष्ठम्= द्यौः चक्षुषी= ऋतं च सत्यं च मध्यम् = अन्तरिक्षम् प्राणः = विश्वं सत्यम्, श्रद्धा पार्श्वे = दिशः शिर= विराट् “विशेष” मध्यम् = उदरम्। कुक्षी का अर्थ गर्भाशय भी है (उणा० ३। १५५, म० दयानन्द) इस दृष्टि से कुक्षी “दो वृक्क” अर्थात् दो Kidneys प्रतीत होते हैं, जिन में मूत्र-पैदा होता है जिन्हें कि समुद्रौ कहा है।
विषय
अज के दृष्टान्त से पञ्चौदन आत्मा का वर्णन।
भावार्थ
(सत्यं च ऋतं च चक्षुषी) सत्य, व्यक्त जगत् और ऋत, अव्यक्त ये दोनों उसकी चक्षुएं हैं। (विश्वं सत्यम्) यह विश्व सत्य अर्थात् उसका प्रकट देह है, (श्रद्धा प्राणः) श्रद्धा, सत्य का धारण-बल प्राण है। (विराट् शिरः) विराट् शिरोभाग है। (यत्) और जो (यत्) यह (पञ्चोदनः) पांच ओदनों वाला, पांच भूतों का पति, पांचों को प्रलयकाल में अपने भीतर भात के समान खा जाने वाला महान् (अजः) अजन्मा परमात्मा है (एष एव) वह ही (अपरिमितः) परिमाणरहित, अनन्त (यज्ञः) यज्ञ अर्थात् महान् आत्मा है। पूर्व मन्त्र और इस मन्त्र से विराट् की स्थिति और यज्ञमय प्रजापति तीनों का वर्णन समान पदों से कर दिया गया है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृगुर्ऋषिः। अजः पञ्चोदनो देवता। १, २, ५, ९, १२, १३, १५, १९, २५, त्रिष्टुभः, ३ चतुष्पात् पुरोऽति शक्वरी जगती, ४, १० नगत्यौ, १४, १७,२७, ३०, अनुष्टुभः ३० ककुम्मती, २३ पुर उष्णिक्, १६ त्रिपाद अनुष्टुप्, १८,३७ त्रिपाद विराड् गायत्री, २४ पञ्चपदाऽनुपटुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बर्हता विराड् जगती २०-२२,२६ पञ्चपदाउष्णिग् गर्भोपरिष्टाद्बर्हता भुरिजः, ३१ सप्तपदा अष्टिः, ३३-३५ दशपदाः प्रकृतयः, ३६ दशपदा प्रकृतिः, ३८ एकावसाना द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप, अष्टात्रिंशदर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
The Soul, the Pilgrim
Meaning
Satyam, constant reality of existence, and Rtam, Law and Scripture of the dynamics of existence, these two were his eyes, the whole truth of existence and faith in that truth, his life breath, the boundless Prakrti, his head. In other words, this boundless yajna of existential evolution of divine creativity is what the adorable Aja is. It is the Lord Eternal who governs the world of five elements he manifests, projects, withdraws, consumes, projects, eternally.
Translation
His two eyes the truth (satya) and the right (rta); his existence (satyam) all the world; his vital breath the faith (prana); and his head became Viraj; this pancaudana aja is, indeed, a limitless sacrifice.
Translation
His eyes were truth and eternal order, the whole together was the truth, faith was his breath and the all-containing nebulous mass His head. This eternal soul living in the body of five elements with all its aspects is the boundless yajna of the creation.
Translation
Laws of Nature and the Vedas are His eyes. Complete truth and faith are His breaths. Highly lustrous Matter is His head. Eternal God. the Absorber of five elements at the time of Dissolution, is indeed, the unlimited sacrifice.
Footnote
Sacrifice: The giver of the fruit of our actions.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२१−(सत्यम्) अस सत्तायाम्-शतृ। सते हितम्-यत्। यथार्थस्वरूपम्। अस्तित्वम् (च) (ऋतम्) अञ्चिघृसिभ्यः क्तः। उ० ३।८९। ऋ गतौ-क्त। वेदादियथार्थशास्त्रम् (च) (चक्षुषी) नेत्रे (विश्वम्) सर्वम् (सत्यम्) (श्रद्धा) अ० ६।१३३।४। वेदेषु विश्वासः (प्राणः) (विराट्) विविधप्रकाशमाना प्रकृतिः (शिरः) (एषः) (वै) एव (अपरिमितः) परिमाणरहितः (यज्ञः) पूजनीयः (यत्) यस्मात् (अजः) परमेश्वरः (पञ्चौदनः) अ० ४।१४।७। पञ्चसु पृथिव्यादिभूतेषु ओदनः सेचनं यस्य सः ॥
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