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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 28
    ऋषिः - भृगुः देवता - अजः पञ्चौदनः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अज सूक्त
    60

    स॑मा॒नलो॑को भवति पुन॒र्भुवाप॑रः॒ पतिः॑। यो॒जं पञ्चौ॑दनं॒ दक्षि॑णाज्योतिषं॒ ददा॑ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒मा॒नऽलो॑क: । भ॒व॒ति॒ । पु॒न॒:ऽभुवा॑ । अप॑र: । पति॑: । य: । अ॒जम् । पञ्च॑ऽओदनम् । दक्षि॑णाऽज्योतिषम् । ददा॑ति ॥५.२८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः। योजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    समानऽलोक: । भवति । पुन:ऽभुवा । अपर: । पति: । य: । अजम् । पञ्चऽओदनम् । दक्षिणाऽज्योतिषम् । ददाति ॥५.२८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 5; मन्त्र » 28
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

    पदार्थ

    (अपरः) दूसरा (पतिः) पति (पुनर्भुवा) दूसरी वा विवाहित [वा नियोजित] स्त्री के साथ (समानलोकः) एक स्थानवाला (भवति) होता है। (यः) जो पुरुष (पञ्चौदनम्) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] के सींचनेवाले, (दक्षिणाज्योतिषम्) दानक्रिया की ज्योति रखनेवाले (अजम्) अजन्मे वा गतिशील परमात्मा को [अपने आत्मा में] (ददाति) समर्पित करता है ॥२८॥

    भावार्थ

    जैसे आत्मत्यागी परमेश्वर भक्त अपत्नीक पुरुष और धर्मात्मा विधवा स्त्री यथावत् विधि के साथ विपत्ति से छूटकर कर्तव्य पालन करते हैं, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी पुरुष अविद्या से छूट कर परमात्मा से मिलकर आनन्द पाता है ॥२८॥

    टिप्पणी

    २८−(समानलोकः) एकस्थानः (भवति) (पुनर्भुवा) पुनः+भू सत्तायाम्-क्विप्। पुनर्भूर्दिधिषू रूढा द्विस्तस्या दिधिषुः पतिः। स तु द्विजोऽग्रेदिधिषूः सैव यस्य कुटुम्बिनी। इत्यमरः १६।२३। द्विरूढया नियोजितया वा स्त्रिया सह (अपरः) द्वितीयः। देवरः (पतिः) अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    समानलोकता

    पदार्थ

    १. प्रभु को अपना प्रथम पति समझनेवाली युवति जब एक लौकिक पति का वरण करती है तब यह 'पुनर्भूः' कहलाती है। प्रभु से भिन्न (य:) = जो (अपरः पतिः) = दूसरा लौकिक पति है, वह (पुनर्भुवा) = उस पुनर्भू युवति के साथ (समानलोकः भवति) = समान लोक में रहनेवाला होता है। होता यह तभी है यदि वह (पञ्चौदनम्) = पाँचों भूतों को अपना ओदन बना लेनेवाले (दक्षिणाग्योतिषम्) = दान की ज्योतिवाले (अजम्) = अजन्मा प्रभु को (ददाति) = अपने को दे डालता है, प्रभु के प्रति अपना समर्पण कर देता है।

    भावार्थ

    प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाला युवक अपने जीवन-साथी [पनी] के साथ समान लोक में निवास करनेवाला होता है।

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    भाषार्थ

    (पुनर्भुवा) “पुनः पत्नी” होने वाली के साथ (अपरः पति) यह दूसरा पति (समानलोकः) एक ही गृहस्थ लोक में वास करने वाला (भवति) हो जाता है, (यः) जोकि (पञ्चौदनम्) निज पंचेन्द्रिय भोगों को, (अजम्) और निज आत्मा को, (दक्षिणाज्योतिषम्) विवाहनिमित्त दक्षिणा के समय एक नई ज्योति रूप में (ददाति) पत्नी के प्रति देता है।

    टिप्पणी

    [पञ्चौदन और अज का प्रदान, पत्नी के प्रति, पति कर रहा है, पत्नी नहीं। प्रायः पतियों द्वारा पत्नियों पर बलात्कार की सम्भावना होती है। इसलिये विवाह विधि की समाप्ति पर, पति जो पत्नी के प्रति पञ्चभोगों और निज आत्मा को न्यौछावर कर देने का आश्वासन देता है वह मानो पत्नी के लिये एक ज्योति का प्रदान है, जीवन मार्ग में जोकि पत्नी को नवमार्ग प्रदर्शन कराएगी]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Soul, the Pilgrim

    Meaning

    The other, second, husband becomes one in life, in the home and in the family with the remarried wife and attains equality of good fortune if he submits his immortal soul of five-fold existence clad in light and generosity to the Lord divine.

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    Translation

    Of equal place with the remarried wife becomes the second husband, whoso offers a pancaudana aja brightened with sacrificial gift.

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    Translation

    A widower, who re-marrying him becomes husband if surrenders his eternal spirit living in body of five elements and having the light of knowledge, to his wife lives with her unseparated.

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    Translation

    He, who dedicates himself to theUnborn God, the Absorber of five elements, Illumined with charity, being the second husband of the re-married woman, attains to the Beautiful God, as does his wife.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २८−(समानलोकः) एकस्थानः (भवति) (पुनर्भुवा) पुनः+भू सत्तायाम्-क्विप्। पुनर्भूर्दिधिषू रूढा द्विस्तस्या दिधिषुः पतिः। स तु द्विजोऽग्रेदिधिषूः सैव यस्य कुटुम्बिनी। इत्यमरः १६।२३। द्विरूढया नियोजितया वा स्त्रिया सह (अपरः) द्वितीयः। देवरः (पतिः) अन्यत् पूर्ववत् ॥

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