अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 26
ऋषिः - भृगुः
देवता - अजः पञ्चौदनः
छन्दः - पञ्चपदानुष्टुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बार्हताभुरिक्त्रिष्टुप्
सूक्तम् - अज सूक्त
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पञ्च॑ रु॒क्मा ज्योति॑रस्मै भवन्ति॒ वर्म॒ वासां॑सि त॒न्वे भवन्ति। स्व॒र्गं लो॒कम॑श्नुते॒ यो॒जं पञ्चौ॑दनं॒ दक्षि॑णाज्योतिषं॒ ददा॑ति ॥
स्वर सहित पद पाठपञ्च॑ । रु॒क्मा । ज्योति॑: । अ॒स्मै॒ । भ॒व॒न्ति॒ । वर्म॑ । वासां॑सि । त॒न्वे᳡ । भ॒व॒न्ति॒ । स्व॒:ऽगम् । लो॒कम् । अ॒श्नु॒ते॒ । य: । अ॒जम् । पञ्च॑ओदनम् । दक्षि॑णाऽज्योतिषम् । ददा॑ति ॥५.२६॥
स्वर रहित मन्त्र
पञ्च रुक्मा ज्योतिरस्मै भवन्ति वर्म वासांसि तन्वे भवन्ति। स्वर्गं लोकमश्नुते योजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति ॥
स्वर रहित पद पाठपञ्च । रुक्मा । ज्योति: । अस्मै । भवन्ति । वर्म । वासांसि । तन्वे । भवन्ति । स्व:ऽगम् । लोकम् । अश्नुते । य: । अजम् । पञ्चओदनम् । दक्षिणाऽज्योतिषम् । ददाति ॥५.२६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थ
(पञ्च) विस्तृत (रुक्मा) रोचक वा चमकीले वस्तु [सुवर्ण आदि] (अस्मै) उस [पुरुष] के लिये (ज्योतिः) ज्योति (भवन्ति) होते हैं, (वासांसि) वस्त्र [उसके] (तन्वे) शरीर के लिये (वर्म) कवच (भवन्ति) होते हैं। वह (स्वर्गम्) स्वर्ग [सुख देनेवाला] (लोकम्) लोक (अश्नुते) पाता है, (यः) जो पुरुष (पञ्चौदनम्) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] के सींचनेवाले, (दक्षिणाज्योतिषम्) दानक्रिया की ज्योति रखनेवाले (अजम्) अजन्मे वा गतिशील परमात्मा को [अपने आत्मा में] (ददाति) समर्पित करता है ॥२६॥
भावार्थ
जो मनुष्य परमात्मा में विश्वास रखता है, वह ब्रह्मचर्य से विद्या प्राप्त करके स्वस्थ, दृढ़ और धनी होकर आनन्दित रहता है ॥२६॥
टिप्पणी
२६−(पञ्च) म० २५। विस्तृतानि (रुक्मा) रोचकानि वस्तूनि (ज्योतिः) प्रकाशः (अस्मै) मनुष्याय (भवन्ति) (वर्म) कवचम् (वासांसि) वस्त्राणि (तन्वे) शरीराय (स्वर्गम्) स्वः सुखं गच्छति प्राप्नोति यत्र (लोकम्) दर्शनीयं स्थानम् (अश्नुते) प्राप्नोति। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
दीसि-ही-दीप्ति तथा स्वर्ग-प्राप्ति
पदार्थ
१. (य:) = जो (पञ्चौदनम्) = पाँचों भूतों से बने संसार को प्रलयकाल में अपना ओदन बना लेता है उस (दक्षिणायोतिषम्) = दान की ज्योतिवाले-सर्वत्र दानों व प्रकाशवाले (अजम्) = अजन्मा प्रभु के प्रति (ददाति) = अपने को दे डालता है, (अस्मै) = अपने को प्रभु के लिए अर्पण करनेवाले इस पुरुष के लिए (पञ्च रुक्मा) = पाँचों कर्मेन्द्रियों यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त हुई-हुई देदीप्यमान [रुच दीप्ती] भवन्ति-हो जाती हैं। (पञ्च वस्त्रा) = 'अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय व आनन्दमय कोशरूप पाँचों वस्त्र (नवानि) = नये व स्तुत्य हो जाते हैं। (पञ्च धेनवः) = ज्ञानदुग्ध का दोहन करनेवाली पाँचों ज्ञानेन्द्रियों (कामदुघा) = कमनीय ज्ञानदुग्ध को देनेवाली व सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाली हो जाती हैं। २. (पञ्च रुक्मा) = देदीप्यमान पाँचों इन्द्रियाँ (अस्मै) = इसके लिए (ज्योतिः भवन्ति) = प्रकाश-ही-प्रकाश हो जाती हैं। (वासांसि) = पाँचों कोशरूप वस्त्र (तन्वे) = इसके शरीर के लिए व शक्ति-विस्तार के लिए (वर्म भवन्ति) = कवच बन जाते हैं। इन कवचों से आवृत्त हुआ-हुआ यह किन्हीं भी वासनारूप शत्रुओं से आक्रान्त नहीं होता। इसप्रकार यह स्वर्ग लोकम् (अश्नुते) = स्वर्गलोक को प्राप्त करता है-आनन्दमय जीवनवाला व मोक्ष को प्राप्त करनेवाला बनता है|
भावार्थ
प्रभू के प्रति समर्पण करने से पाँचों कर्मेन्द्रियाँ दीप्त होती हैं, पाँचों कोश स्तुत्य बनते हैं, पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ कमनीय व ज्ञानदुग्ध का दोहन करनेवाली होती हैं। यह समर्पक स्वर्ग व आनन्दमय लोक को प्रास करता है।
भाषार्थ
(पञ्च रुक्मा) पांच सुवर्णाभूषण (अस्मै) इसके लिये (ज्योतिः भवन्ति) शोभारूप होते हैं, (वासांसि) वस्त्र (तन्वे) शरीर के लिये (वर्म) कवचरूप (भवन्ति) होते हैं, तथा वह (स्वर्गम् लोकम्) स्वर्गलोक को (अश्नुते) प्राप्त करता है (यः) जोकि (पञ्चौदनम्) पांच इन्द्रिय भोगों के पति (अजम्) अजन्मा परमेश्वर को, (दक्षिणा ज्योतिषम्) अर्थात् ज्योतिः स्वरूप परमेश्वर को, दक्षिणा के फलस्वरूप में (ददाति) देता है, प्रत्यक्ष दर्शन करा देता है। पञ्चौदनम् = पञ्च ओदनाः ओदनानि वा यस्य, तम्।
टिप्पणी
[पञ्च रुक्मा ज्योतिः=दक्षिणा प्राप्त करने के समारोह में भेंट किये गये पांच सुवर्णाभूषण, पांच सुवर्णमालाएं, अध्यात्मगुरु को सुशोभित करती हैं, उस समय उसके मुख की आभा चमकती है। वर्म=वृञ् आवरणे, शरीर का आवरण करने वाले ढकने वाले, कवच के सदृश वस्त्र समारोह में शोभा और ख्याति प्राप्त कर मानो गुरु स्वर्गीय सुख का अनुभव करता है।]
विषय
अज के दृष्टान्त से पञ्चौदन आत्मा का वर्णन।
भावार्थ
(यः दक्षिणाज्योतिषं पञ्चौदनं अजं ददाति) जो दक्षिणा ज्योतिष, पञ्चौदन अज आत्मा का प्रदान करता है वह (स्वर्गं लोकं अश्नुते) स्वर्गलोक, परम मोक्षधाम का आनन्द प्राप्त करता है, (अस्मै) उसके (पञ्च रुक्मा) पांचों रोचमान इन्द्रियां (ज्योतिः) प्रकाशमय हो जाते हैं और (पञ्च वासांसि) पांचों आच्छादक कोश उस के (वर्म) कवच (भवन्ति) हो जाते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृगुर्ऋषिः। अजः पञ्चोदनो देवता। १, २, ५, ९, १२, १३, १५, १९, २५, त्रिष्टुभः, ३ चतुष्पात् पुरोऽति शक्वरी जगती, ४, १० नगत्यौ, १४, १७,२७, ३०, अनुष्टुभः ३० ककुम्मती, २३ पुर उष्णिक्, १६ त्रिपाद अनुष्टुप्, १८,३७ त्रिपाद विराड् गायत्री, २४ पञ्चपदाऽनुपटुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बर्हता विराड् जगती २०-२२,२६ पञ्चपदाउष्णिग् गर्भोपरिष्टाद्बर्हता भुरिजः, ३१ सप्तपदा अष्टिः, ३३-३५ दशपदाः प्रकृतयः, ३६ दशपदा प्रकृतिः, ३८ एकावसाना द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप, अष्टात्रिंशदर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
The Soul, the Pilgrim
Meaning
All five golden glories of life become his leading lights and five sheaths of the soul become his five-fold armour for body and soul, and he attains the paradisal bliss of life who surrenders the immortal soul of five¬ fold existence clothed in light and generosity to the eternal Lord for his divine yajna.
Translation
Five gold coins become illuminating light for him; the garments become an armour for the body; he wins the world of eternal bliss, whoso offers a pancaudana aja brightened with sacrificial gifts.
Translation
He who surrenders to God the eternal soul living in the body and possessing the light of knowledge attain salvation in life and five cognitive organs become a light to enlighten him and the garment-like bodies become armor to defend him.
Translation
He, who dedicates himself to the Unborn God, the Absorber of five elements. Illumined with charity, achieves blissful salvation. Robes become armor to defend his body; various attractive, glittering substances like gold serve him as a beacon-light.
Footnote
Beacon-light: As light from the light-house shows the right path to the ships travel¬ ling in the ocean at night, so for the devotees of God, wealth is meant not for luxury, but for the service of suffering humanity, the poor, the sick, the ignorant, and the blind.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२६−(पञ्च) म० २५। विस्तृतानि (रुक्मा) रोचकानि वस्तूनि (ज्योतिः) प्रकाशः (अस्मै) मनुष्याय (भवन्ति) (वर्म) कवचम् (वासांसि) वस्त्राणि (तन्वे) शरीराय (स्वर्गम्) स्वः सुखं गच्छति प्राप्नोति यत्र (लोकम्) दर्शनीयं स्थानम् (अश्नुते) प्राप्नोति। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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