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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 6
    ऋषिः - भृगुः देवता - अजः पञ्चौदनः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - अज सूक्त
    78

    उत्क्रा॒मातः॒ परि॑ चे॒दत॑प्तस्त॒प्ताच्च॒रोरधि॒ नाकं॑ तृ॒तीय॑म्। अ॒ग्नेर॒ग्निरधि॒ सं ब॑भूविथ॒ ज्योति॑ष्मन्तम॒भि लो॒कं ज॑यै॒तम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उत् । क्रा॒म॒ । अत॑: । परि॑ । च॒ । इत् । अत॑प्त: । त॒प्तात् । च॒रो: । अधि॑ । नाक॑म् । तृ॒तीय॑म् । अ॒ग्ने: । अ॒ग्नि: । अधि॑ । सम् । ब॒भू॒वि॒थ॒ । ज्योति॑ष्मन्तम् । अ॒भि । लो॒कम् । ज॒य॒ । ए॒तम् ॥५.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत्क्रामातः परि चेदतप्तस्तप्ताच्चरोरधि नाकं तृतीयम्। अग्नेरग्निरधि सं बभूविथ ज्योतिष्मन्तमभि लोकं जयैतम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत् । क्राम । अत: । परि । च । इत् । अतप्त: । तप्तात् । चरो: । अधि । नाकम् । तृतीयम् । अग्ने: । अग्नि: । अधि । सम् । बभूविथ । ज्योतिष्मन्तम् । अभि । लोकम् । जय । एतम् ॥५.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 5; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मनुष्य !] (च) और (इत्) भी (अतप्तः) असन्तप्त [विना थका हुआ] तू (परि) सब ओर से (तप्तात्) तपाये हुए (अतः) इस (चरोः) चरु [बटलोही] से (तृतीयम्) तीसरे [जीव और प्रकृति से भिन्न] (नाकम् अधि) सुखस्वरूप जगदीश्वर की ओर (उत् क्राम) ऊपर चढ़। (अग्निः) ज्ञानवान् (अग्नेः) ज्ञानवान् परमेश्वर से (अधि) अधिकारपूर्वक (सम् बभूविथ) पराक्रमी हुआ है, (एतम्) इस (ज्योतिष्मन्तम्) प्रकाशयुक्त (लोकम् अभि) लोक की ओर (जय) जय कर ॥६॥

    भावार्थ

    समर्थ विद्वान् मनुष्य परिपक्व बुद्धि से परिपक्व अन्न के समान उपकारी होता हुआ परमात्मा में ध्यान लगाकर विज्ञानमय प्रकाश को प्राप्त होता है ॥६॥

    टिप्पणी

    ६−(उत् क्राम) उद्गच्छ (अतः) एतस्मात् (परि) सर्वतः (च) (इत्) एव (अतप्तः) तप-क्त। असन्तप्तः। अपरिश्रान्तः (तप्तात्) (चरोः) पात्रात् (अधि) अधिलक्ष्य (नाकम्) सुखस्वरूपं परमात्मानम् (तृतीयम्) जीवप्रकृतिभ्यां भिन्नम् (अग्नेः) ज्ञानवन्तः परमेश्वरात् (अग्निः) ज्ञानवान् जीवात्मा (अधि) अधिकृत्य (संबभूविथ) समर्थो बभूविथ (ज्योतिष्मन्तम्) प्रकाशवन्तम् (अभि) अभिलक्ष्य (लोकम्) (जय) प्राप्नुहि (एतम्) ॥

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    विषय

    तप्त चरु व ज्योतिर्मय लोक

    पदार्थ

    १. हे जीव! (चेत) = यदि तू (अत:) = ज्ञानाग्नि में परिपाकरूप इस कार्य से (परि अतम:) = सब प्रकार से सन्तस [दुःखी] नहीं हो गया, अर्थात् आचार्यकुल में निवास की तपस्या से तू व्याकुल व निर्विण्ण नहीं हो गया तो (तप्तात् चरो:) = खूब दीप्त ज्ञान के भोजन से [चर गती, गति:-ज्ञानम्] (तृतीयं नाकम्) = प्रकृति और जीव से ऊपर तृतीय आनन्दमय ब्रह्मलोक में (अधि उत्क्राम) = प्रकृष्ट गतिवाला हो। २. हे साधक! तू (अग्नि: अधि) = अग्निरूप आचार्य से (अग्रिः संबभूविथ) = अग्नि ही बन गया है। आचार्य ज्ञानाग्नि से दीप्त था, तू भी ज्ञानाग्नि से दीस बना है, अत: अब (एतम्) = इस (ज्योतिष्यन्तम्) = प्रकाशमय (लोकम् अभिजय) = लोक को जीतनेवाला बन।

    भावार्थ

    आचार्यकुल मे तपस्यापूर्वक निवास करता हुआ ब्रह्मचारी यदि अपने को ज्ञानाग्नि में खूब परिपक्व करता है तो इस संसार में प्राकृतिक भोगों व पारस्परिक कलहों का शिकार न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है और अपने गृहस्थ को भी ज्योतिर्मय बना पाता है।

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    भाषार्थ

    (अतः परि) इस परिस्थिति से (उत्क्राम) तू उन्नति की ओर पग बढ़ा (चेत्) यदि (अतप्तः) तुने तपश्चर्या नहीं की; (तप्तात्) अर्थात् तपश्चर्या द्वारा तप्त हुए (चरोः अधि) चरु से (तृतीये नाकम्) सुखमय तीसरे लोक की ओर पग बढ़ा। क्योंकि (अग्नेः अधि) तपश्चर्या की अग्नि से (अग्निः) अग्निसदृश पाप मल को जला देने वाला (सं बभूविथ) तू हुआ है। तु (एतम्) इस (ज्योतिष्मन्तं लोकम् अभि जय) ज्योतिः सम्पन्नलोक पर विजय प्राप्त कर।

    टिप्पणी

    [चरुः१= चलने फिरने वाला शरीर। इसे (मन्त्र ५) में कुम्भी कहा है (नाकं तृतीयम्, देखो मन्त्र १०)। [१. अपरिपक्व हविः, ओदन, यव आदि।]

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    विषय

    अज के दृष्टान्त से पञ्चौदन आत्मा का वर्णन।

    भावार्थ

    हे मुमुक्षो ! इस प्रकार ज्ञानवान् होकर (अतः परि च इत्) इस लोक से (उत् क्राम) उत्तम लोक को प्राप्त हो। यदि तूने (अतप्तः) पर्याप्त तप न कर लिया हो तो (तप्तात् चरोः) जिस प्रकार तपी हांडी से जल तप्त होकर ऊपर वाष्पमय होकर उठता है उसी प्रकार तू भी (तप्तात् चरोः) तपस्या के आचरण से (तृतीयं) उस परम, सब दुःखों के पार (नाकम्) सुखमय मुक्तिधाम को प्राप्त हो। तू (अग्नेः अधि) ज्ञानवान् प्रकाशस्वरूप परम गुरु ब्रह्म से ज्ञान प्राप्त करके स्वयं (अग्निः) ज्ञानवान् प्रकाशस्वरूप (सं बभूविथ) हो जा। और (एतम्) उस (ज्योतिष्मन्तम्) ज्योतिर्मय लोक को (अभि जय) साक्षात् प्राप्त कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृगुर्ऋषिः। अजः पञ्चोदनो देवता। १, २, ५, ९, १२, १३, १५, १९, २५, त्रिष्टुभः, ३ चतुष्पात् पुरोऽति शक्वरी जगती, ४, १० नगत्यौ, १४, १७,२७, ३०, अनुष्टुभः ३० ककुम्मती, २३ पुर उष्णिक्, १६ त्रिपाद अनुष्टुप्, १८,३७ त्रिपाद विराड् गायत्री, २४ पञ्चपदाऽनुपटुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बर्हता विराड् जगती २०-२२,२६ पञ्चपदाउष्णिग् गर्भोपरिष्टाद्बर्हता भुरिजः, ३१ सप्तपदा अष्टिः, ३३-३५ दशपदाः प्रकृतयः, ३६ दशपदा प्रकृतिः, ३८ एकावसाना द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप, अष्टात्रिंशदर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Soul, the Pilgrim

    Meaning

    O spirit immortal, rise, seasoned, unafflicted and perfect at peace, from the fire of discipline, and from the crucible of fire reach up to the third haven of freedom and bliss. There is fire upon fire, light beyond light, so win this highest heaven of light above all the rest.

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    Translation

    Completely unannoyed, may you stride up from here, from the heated cauldron to the third sorrowless world. From fire you have sprung forth as fire; may you win wholly this world of brilliance.

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    Translation

    O man ! proced onward without being vexed with worries and torments of wordld and house-hold life and enter into the third Ashrama known as Vanaprastha from the pleasure and plenty of house-hold life which is affected with the heat of pain and torment. You are arisen out like the fire from the worldly fire and hence you win the world of splendor and enlightenment (Vanasprastha).

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    Translation

    O aspirant after salvation, thus acquiring knowledge, rise to a position higher than the present. If thou hast not practiced sufficient austerity, then just as boiling water rises from the hot cauldron in the shape of steam, so shouldst thou by practising penance, rise to God, higher than Matter and Soul. Become wise, acquiring wisdom from God, the great Teacher, conquer and win this lucid world of splendor.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(उत् क्राम) उद्गच्छ (अतः) एतस्मात् (परि) सर्वतः (च) (इत्) एव (अतप्तः) तप-क्त। असन्तप्तः। अपरिश्रान्तः (तप्तात्) (चरोः) पात्रात् (अधि) अधिलक्ष्य (नाकम्) सुखस्वरूपं परमात्मानम् (तृतीयम्) जीवप्रकृतिभ्यां भिन्नम् (अग्नेः) ज्ञानवन्तः परमेश्वरात् (अग्निः) ज्ञानवान् जीवात्मा (अधि) अधिकृत्य (संबभूविथ) समर्थो बभूविथ (ज्योतिष्मन्तम्) प्रकाशवन्तम् (अभि) अभिलक्ष्य (लोकम्) (जय) प्राप्नुहि (एतम्) ॥

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