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ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 44 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 44/ मन्त्र 11
    ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्र: छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    मा जस्व॑ने वृषभ नो ररीथा॒ मा ते॑ रे॒वतः॑ स॒ख्ये रि॑षाम। पू॒र्वीष्ट॑ इन्द्र नि॒ष्षिधो॒ जने॑षु ज॒ह्यसु॑ष्वी॒न्प्र वृ॒हापृ॑णतः ॥११॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मा । जस्व॑ने । वृ॒ष॒भ॒ । नः॒ । र॒री॒थाः॒ । मा । ते॒ । रे॒वतः॑ । स॒ख्ये । रि॒षा॒म॒ । पू॒र्वीः । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । निः॒ऽसिधः॑ । जने॑षु । ज॒हि । असु॑स्वीन् । प्र । वृ॒ह॒ । अपृ॑णतः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मा जस्वने वृषभ नो ररीथा मा ते रेवतः सख्ये रिषाम। पूर्वीष्ट इन्द्र निष्षिधो जनेषु जह्यसुष्वीन्प्र वृहापृणतः ॥११॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मा। जस्वने। वृषभ। नः। ररीथाः। मा। ते। रेवतः। सख्ये। रिषाम। पूर्वीः। ते। इन्द्र। निःऽसिधः। जनेषु। जहि। असुस्वीन्। प्र। वृह। अपृणतः ॥११॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 44; मन्त्र » 11
    अष्टक » 4; अध्याय » 7; वर्ग » 18; मन्त्र » 1
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    मनुष्यैः किमकृत्वा किमनुष्ठेयमित्याह ॥

    अन्वयः

    हे वृषभेन्द्र ! त्वं जस्वने नोऽस्मान्मा ररीथा वयं ते रेवतः सख्ये मा रिषाम यास्ते जनेषु पूर्वीर्निःषिधस्सन्ति ता ररीथा असुष्वीन् जह्यपृणतोऽस्मान् प्र वृह ॥११॥

    पदार्थः

    (मा) निषेधे (जस्वने) अन्यायेन परस्वप्रापकाय दुष्टाय राज्ञे। जसतीति गतिकर्मा। (निघं०२.१४) (वृषभ) बलिष्ठ (नः) अस्मान् (ररीथाः) दद्याः (मा) (ते) तव (इन्द्र) दुःखविदारक राजन् (निःषिधः) निःश्रेयसकर्यः क्रियाः (जनेषु) (जहि) (असुष्वीन्) अभिषवस्याकर्तॄन् (प्र) (वृह) पृथक्कुरु (अपृणतः) दुःखदातुर्दुर्जनात् ॥११॥

    भावार्थः

    हे राजन् ! येऽस्मान् पीडयेयुस्तदधीनान्मा कुर्य्याः श्रेयसि क्रियाः प्रापयेस्तथा वयमप्येतत्सर्वं त्वदर्थमनुतिष्ठेम, एवं सखायो भूत्वाऽभीष्टान् कामान्त्सर्वे वयं प्राप्नुयाम ॥११॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्यों को क्या नहीं करके क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (वृषभ) बलयुक्त (इन्द्र) दुःखों के नाश करनेवाले राजन् ! आप (जस्वने) अन्याय से दूसरे के धन को अन्यत्र प्राप्त करानेवाले दुष्ट राजा के लिये (नः) हम लोगों को (मा) मत (ररीथाः) दीजिये और हम लोग (ते) आप (रेवतः) बहुत धनवाले के (सख्ये) मित्रपने के लिये (मा) नहीं (रिषाम) क्रुद्ध होवें और जो (ते) आपके (जनेषु) मनुष्यों में (पूर्वीः) प्राचीन (निःषिधः) सुखकारक क्रियायें हैं, उनको दीजिये (असुष्वीन्) उत्पत्ति के नहीं करनेवालों का (जहि) त्याग करिये और (अपृणतः) दुःख के देनेवाले दुर्जन से हम लोगों के (प्र, वृह) पृथक् करिये ॥११॥

    भावार्थ

    हे राजन् ! जो हम लोगों को पीड़ा देवें उनके आधीन मत करिये और कल्याण में क्रियाओं को प्राप्त कराइये, वैसे हम लोग भी इस सब को आपके लिये करें। इस प्रकार मित्र होकर अभीष्ट मनोरथों को सब हम लोग प्राप्त होवें ॥११॥

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    विषय

    प्रजा की न्यायोचित मांगें ।

    भावार्थ

    (हे वृषभ) बलवान् पुरुष ! तू (नः) हमें (जस्वने) नाश कर देने वाले दुष्ट पुरुष के हाथ ( मा ररीथाः ) मत पड़ने दे । ( ते रेवतः ) ते तुझ ऐश्वर्यवान् पुरुष के ( सख्ये ) मित्रभाव में रहते हुए हम लोग ( मा रिषाम) कभी पीड़ित न हों, और न एक दूसरे का विनाश करें । ( जनेषु ) मनुष्यों में है ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! तू ( पूर्वी: ) पूर्व से चली आई, सनातन ( निःषिधः) बुरे मार्ग से निषेध करने वाली मर्यादाओं को ( ररीथाः ) हमें बार २ बतला । ( असुष्वीन्) जो ऐश्वर्य की वृद्धि और सवन, यज्ञ, उपासना, कर आदि दान, और स्नान तथा तेरा अभिषेक न करने वाले जन हैं उनको ( जहि) दण्डित कर । ( अपृणतः) अपने सन्तानों को पालन पोषण न करने वाले तथा अपने वचन व्रत का पालन न करने वालों को ( प्र वृह ) उखाड़ डाल ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः – १, ३, ४ निचृदनुष्टुप् । २, ५ स्वराडुष्णिक् । ६ आसुरी पंक्ति: । ७ भुरिक् पंक्तिः । ८ निचृत्पंक्तिः । ९, १२, १६ पंक्तिः । १०, ११, १३, २२ विराट् त्रिष्टुप् । १४, १५, १७, १८, २०, २४ निचृत्त्रिष्टुप् । १९, २१, २३ त्रिष्टुप् ।। चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम् ।।

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    विषय

    'असुषि व अपृणन्' का विनाश

    पदार्थ

    [१] हे (वृषभ) = शक्तिशालिन् प्रभो ! (नः) = हमें (जस्वने) = उपक्षय करनेवाले काम-क्रोध आदि शत्रुओं के लिये (मा ररीथाः) = मत दे डालिये। आप से शक्ति को प्राप्त करते हुए हम काम-क्रोध आदि शत्रुओं को जीत पाएँ । (रेवतः) = सब ऐश्वर्योंवाले (ते) = आपकी (सख्ये) = मित्रता में (मा रिषाम) = हम हिंसित न हों। आपको मित्र पाकर हम काम-क्रोध आदि से कभी आक्रान्त न हों। [२] हे (इन्द्र) = शत्रुविद्रावक, सर्वशक्ति- सम्पन्न प्रभो ! (ते) = आपकी (जनेषु) = मनुष्यों में (पूर्वी:) = बहुत (निष्षिधः) = बुराइयों के रोकने की शक्तियाँ हैं आप उपासकों के समीप रोगों व काम-क्रोध आदि शत्रुओं को नहीं आने देते। आप (असुष्वीन्) = अयज्ञशील पुरुषों को (जहि) = नष्ट करिये । (अपृणतः) = अदानशील पुरुषों को प्रवृह उन्मूलित करिये ।

    भावार्थ

    भावार्थ - हम काम आदि से आक्रान्त न हों। प्रभु की मित्रता में रहते हुए हम शत्रुओं से विनष्ट ही तो उन्मूलन न किये जा सकें। प्रभु शत्रुओं को हमारे से दूर रखें। अयज्ञशील व अदानशील का होता है।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे राजा ! जे आम्हाला त्रास देतात त्यांच्या अधीन करू नकोस. कल्याणाचे काम कर. तसे आम्ही सर्वांनीही तुझ्यासाठी काम केले पाहिजे. या प्रकारे मित्र बनून सर्वांचे इच्छित कार्य पूर्ण व्हावे. ॥ ११ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra, mighty generous destroyer of suffering, deliver us not to the unjust and the hungry grabber. Let us never suffer in the friendship of the generous lord nor fall off from loyalty. Let us take advantage of the age old facilities of success among the people. Eliminate the uncreative and keep us away from ungrateful negationists.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What should men do and not do-is told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O mightiest king! destroyer of all miseries, do not give us up to a wicked king, who is taking other's property in justly, may we never suffer in your friendship, who are endowed with abundant wealth. Give us those good acts which lead us to our true welfare. Destroy the wicked ignoble persons. Keep us away from a wicked man, who gives us trouble.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    O king! do not keep us under those persons, who give us trouble. Convey to us those acts which lead to our welfare. Let us also do such good acts for you. Thus being friendly to one another, let us achieve desired objects.

    Foot Notes

    (जस्वने) अन्यायेन परस्वप्रापकाय दुष्टाय राज्ञै । जसु-हिंसायाम् (चुरा० ) पराचापहरणं हिसैव:। = For a wicked king who takes other's property. (अपुणत: ) दुःखदातुर्दुंजनात् । पृणा-प्रीणाने (तुदा.) अप्रीणनं दुःख प्रदानम्: । = From a wicked person who gives trouble.

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