ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 44/ मन्त्र 17
ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
ए॒ना म॑न्दा॒नो ज॒हि शू॑र॒ शत्रू॑ञ्जा॒मिमजा॑मिं मघवन्न॒मित्रा॑न्। अ॒भि॒षे॒णाँ अ॒भ्या॒३॒॑देदि॑शाना॒न्परा॑च इन्द्र॒ प्र मृ॑णा ज॒ही च॑ ॥१७॥
स्वर सहित पद पाठए॒ना । म॒न्दा॒नः । ज॒हि । शू॒र॒ । शत्रू॑न् । जा॒मिम् । अजा॑मिम् । म॒घ॒ऽव॒न् । अ॒मित्रा॑न् । अ॒भि॒ऽसे॒नान् । अ॒भि । आ॒ऽदेदि॑शानान् । परा॑चः । इ॒न्द्र॒ । प्र । मृ॒ण॒ । ज॒हि । च॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
एना मन्दानो जहि शूर शत्रूञ्जामिमजामिं मघवन्नमित्रान्। अभिषेणाँ अभ्या३देदिशानान्पराच इन्द्र प्र मृणा जही च ॥१७॥
स्वर रहित पद पाठएना। मन्दानः। जहि। शूर। शत्रून्। जामिम्। अजामिम्। मघऽवन्। अमित्रान्। अभिऽसेनान्। अभि। आऽदेदिशानान्। पराचः। इन्द्र। प्र। मृण। जहि। च ॥१७॥
ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 44; मन्त्र » 17
अष्टक » 4; अध्याय » 7; वर्ग » 19; मन्त्र » 2
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अष्टक » 4; अध्याय » 7; वर्ग » 19; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे शूर मघवन्निन्द्र ! त्वमेना मन्दानः सन् जामिमजामिं शत्रूनमित्रान् जहि। अभिषेणानादेदिशानान् पराचोऽभि प्रमृणा। अविद्यादिदोषाँश्च जही ॥१७॥
पदार्थः
(एना) एनेन (मन्दानः) प्रकाशितः (जहि) (शूर) दुष्टानां हिंसक (शत्रून्) धर्मविरोधिनः (जामिम्) जामात्रादिकम् (अजामिम्) अन्यामसम्बन्धाम् (मघवन्) बहुधनयुक्त (अमित्रान्) मित्रभावरहितान् (अभिषेणान्) आभिमुख्या सेना येषां तान् (अभि) (आदेदिशानान्) भृशमाज्ञाकर्त्तॄन् (पराचः) पराङ्मुखान् (इन्द्र) दुष्टविदारक (प्र) (मृणा) बाधस्व। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (जही) अत्रापि पूर्ववद्दीर्घः (च) ॥१७॥
भावार्थः
हे राजन्त्सेनापते ! त्वं ब्रह्मचर्येण सोमपानादिना च स्वयमानन्दितः सन् वीरानानन्द्य सर्वाञ्छत्रून्विजयस्व ॥१७॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (शूर) दुष्टों को मारनेवाले (मघवन्) बहुत धनों से युक्त (इन्द्र) दुष्टों के विदारक ! आप (एना) इससे (मन्दानः) प्रशंसित हुए (जामिम्) जवाँई आदि को (अजामिम्) दूसरी सम्बन्ध रहित को (शत्रून्) धर्म्म के विरोधियों (अमित्रान्) मित्रभावरहित वैरियों का (जहि) त्याग करो (अभिषेणान्) सन्मुख सेना जिनकी उन (आदेदिशानान्) अत्यन्त आज्ञा करनेवाले (पराचः) पश्चिम की ओर अर्थात् पीछे मुख किये हुओं की (अभि, प्र, मृणा) बाधा करो (च) और अविद्या आदि दोषों का (जही) त्याग करो ॥१७॥
भावार्थ
हे राजन् सेना के स्वामिन् ! आप ब्रह्मचर्य और सोमलता के रस के पान आदि से स्वयं आनन्दित हुए वीरों को आनन्द देकर सम्पूर्ण शत्रुओं को जीतो ॥१७॥
विषय
शत्रु दमन का उपदेश ।
भावार्थ
हे ( शूर ) शूरवीर ! तू ( मन्दानः ) अति हर्षयुक्त, उत्साहवान् होकर ( एना ) पूर्व कहे राष्ट्रपालक बल से ( शत्रून् जहि ) प्रजा के नाशक दुष्ट पुरुषों को दण्डित कर । हे ( मघवन् ) ऐश्वर्यवन् ! तू ( जामिम् ) अपने सम्बन्धी और (अजामिम्) सम्बन्ध रहित (अमित्रान् ) स्नेह न करने वालों को तथा (अभि-सेनान् ) सेनारहित सामने आने वाले और ( आ-देदिशानान् ) सन्मुख सेनाओं वा प्रजाओं पर आदेश चलाने वाले शत्रुओं को भी ( परा जहि ) दण्डित कर, दूर हटा । और हे ( इन्द्र ) शत्रुहन्तः ! उनको ( प्र मृण च) अच्छी प्रकार नाश कर और ( प्र जहि च ) खूब दण्ड दे, मार ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः – १, ३, ४ निचृदनुष्टुप् । २, ५ स्वराडुष्णिक् । ६ आसुरी पंक्ति: । ७ भुरिक् पंक्तिः । ८ निचृत्पंक्तिः । ९, १२, १६ पंक्तिः । १०, ११, १३, २२ विराट् त्रिष्टुप् । १४, १५, १७, १८, २०, २४ निचृत्त्रिष्टुप् । १९, २१, २३ त्रिष्टुप् ।। चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम् ।।
विषय
'जामि व अजामि' रूप सब शत्रुओं का विनाश
पदार्थ
[१] हे शूर शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले पुरुष ! (एना) = इस सोम के रक्षण से (मन्दान:) = आनन्दित होता हुआ (शत्रून् जहि) = शत्रुओं को विनष्ट कर हे (मघवन्) = यज्ञशील पुरुष ! (जामिम्) = जन्म से ही उत्पन्न अथवा (अजामिम्) = पीछे उत्पन्न हो जानेवाले (अमित्रान्) = वासनारूप शत्रुओं को तू विनष्ट 'तू' कर व कृत्रिम दोषों को तू इस सोम के द्वारा दूर कर। [२] (अभिषेणान्) = सेना के द्वारा हमारे पर आक्रमण करनेवाले व (अभि आदेदिशानान्) = हमारी ओर शस्त्रों को छोड़ते हुए इन शत्रुओं को, हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (परा प्रमृणा च) = पराङ्मुख करके बाधित कर, (च) = और (जहि) = नष्ट कर । कामदेव पञ्चबाण हैं। ये अपने शस्त्रों का हमारे पर प्रहार करते हैं। नाना प्रकार की वासनाएँ इसकी सेना हैं। इन सब शत्रुओं को हम पराङ्मुख करें और विनष्ट करें।
भावार्थ
भावार्थ- सोमरक्षण द्वारा हम जन्मजात [सहज] व पीछे उत्पन्न [कृत्रिम] सब वासनारूप शत्रुओं को विदीर्ण करनेवाले हों, इन शत्रुओं के बाणों व सैन्यों को हम अपने से दूर करें ।
मराठी (1)
भावार्थ
हे राजा ! सेनेच्या स्वामी ! तू ब्रह्मचर्य व सोमलतेचे रसपान इत्यादींनी स्वतः आनंदित हो व वीरांना आनंदित करून सर्व शत्रूंना जिंक ॥ १७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
This way Indra, O valiant hero, happy at heart and joyous, commanding wealth, power and excellence of the world, give up all enemies whether among the related or unrelated people, all unfriendly and menacing forces, all oppositions up front, and all those who order you about like bullies, ward them off, throw them out far away, destroy them all. Keep the soul untainted and free.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The same subject of duties of men-is continued.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O opulent Indra ! destroyer of the enemies, being admired, kill those, who are opposed to Dharma (righteousness) and wicked enemies whether they are your kith and kin or strangers. Slay those, who stand Infront of you with their armies and order their warriors to attack you. Destroy ignorance and other evils.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O king or commander-in-chief of the army ! being delighted with the observance of Brahmacharya and the drinking of Soma etc. gladden the heroes and conquer all your foes.
Foot Notes
(शत्रून्) धर्मविरोधिनः । = Those who are opposed to Dharma or righteousness. (जामिम्) जामानादिकम् । = Kith and kin like the son-in-law and others. (मुणा) बाधस्य । अत्र इयधोतेस्विक इति दीर्घ: । मृण-हिंसायाम् (तुदा.) । = Destroy.
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