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ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 44 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 44/ मन्त्र 19
    ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्र: छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    आ त्वा॒ हर॑यो॒ वृष॑णो युजा॒ना वृष॑रथासो॒ वृष॑रश्म॒योऽत्याः॑। अ॒स्म॒त्राञ्चो॒ वृष॑णो वज्र॒वाहो॒ वृष्णे॒ मदा॑य सु॒युजो॑ वहन्तु ॥१९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । त्वा॒ । हर॑यः । वृष॑णः । यु॒जा॒नाः । वृष॑ऽरथासः । वृष॑ऽरश्मयः । अत्याः॑ । अ॒स्म॒त्राञ्चः॑ । वृष॑णः । व॒ज्र॒ऽवाहः॑ । वृष्णे॑ । मदा॑य । सु॒ऽयुजः॑ । व॒ह॒न्तु॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ त्वा हरयो वृषणो युजाना वृषरथासो वृषरश्मयोऽत्याः। अस्मत्राञ्चो वृषणो वज्रवाहो वृष्णे मदाय सुयुजो वहन्तु ॥१९॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ। त्वा। हरयः। वृषणः। युजानाः। वृषऽरथासः। वृषऽरश्मयः। अत्याः। अस्मत्राञ्चः। वृषणः। वज्रऽवाहः। वृष्णे। मदाय। सुऽयुजः। वहन्तु ॥१९॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 44; मन्त्र » 19
    अष्टक » 4; अध्याय » 7; वर्ग » 19; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुना राजामात्याः कीदृशा भवेयुरित्याह ॥

    अन्वयः

    हे इन्द्र राजन् ! यथा वृषणो युजाना वृषरथासो वृषरश्मयोऽत्या अस्मत्राञ्चो वृषणो वज्रवाहः सुयुजो हरयो वृष्णे मदाय त्वा वहन्तु तथैतांस्त्वं प्रीत्याऽऽवह ॥१९॥

    पदार्थः

    (आ) (त्वा) त्वाम् (हरयः) सुशिक्षिता अश्वा इव मनुष्याः (वृषणः) बलिष्ठाः (युजानाः) समाहितात्मानः (वृषरथासः) वृषा बलयुक्ता रथाः सेनाङ्गानि येषां ते (वृषरश्मयः) रश्मय इव विजयसुखवर्षकास्तेजस्विनः (अत्याः) सकलशुभगुणकर्मव्यापिनः (अस्मत्राञ्च) ये शत्रुभ्योऽस्माँस्त्रायन्ते तानञ्चन्ति प्राप्नुवन्ति ते (वज्रवाहः) शस्त्रास्त्रविद्यावोढारः (वृष्णे) बलकराय (मदाय) आनन्दाय (सुयुजः) ये सुष्ठु युञ्जते योजयन्ति वा (वहन्तु) प्राप्नुवन्तु प्रापयन्तु वा ॥१९॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। राज्ञा सुपरीक्ष्योत्तमगुणकर्मस्वभावा जना राज्यकर्माधिकारेषु नियोजनीयाः स्वयमपि शभगुणकर्मस्वभावः स्यात् ॥१९॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर राजा और मन्त्रीजन कैसे होवें, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त राजन् ! जैसे (वृषणः) बलयुक्त (युजानाः) जिनके सावधान आत्मा और (वृषरथासः) बलयुक्त सेना के अङ्ग जिनके वे (वृषरश्मयः) किरणों के सदृश विजय सुख के वर्षानेवाले तेजस्वी (अत्याः) सम्पूर्ण श्रेष्ठगुण और कर्म्मों में व्यापी (अस्मत्राञ्च) शत्रुओं से हम लोगों की रक्षा करनेवालों को प्राप्त होने और (वृषणः) शत्रुशक्ति के रोकनेवाले (वज्रवाहः) शस्त्र और अस्त्रों की विद्या को धारण करने तथा (सुयुजः) उत्तम प्रकार युक्त होने वा युक्त करानेवाले (हरयः) उत्तम प्रकार शिक्षित घोड़ों के सदृश मनुष्य (वृष्णे) बलकारक (मदाय) आनन्द के लिये (त्वा) आपको (वहन्तु) प्राप्त हों वा प्राप्त करावें, वैसे इनको आप प्रीति से (आ) प्राप्त हूजिये ॥१९॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि उत्तम प्रकार परीक्षा करके उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाववाले मनुष्यों को राज्य कर्म्म के अधिकारों में नियुक्त करे तथा आप भी श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभाववाला होवे ॥१९॥

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    विषय

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    भावार्थ

    हे ऐश्वर्यवन् ! राजन् ! (वृषणः) बलवान् उत्तम प्रबन्धकर्ता ( हरयः ) मनुष्य ( वृषरश्मयः ) बलवान् शस्त्रास्त्रवर्षण कुशलरथ आदि सैन्यों के स्वामी, महारथी, (वृष-रश्मयः ) प्रबन्ध करने में समर्थ रश्मियों अर्थात् बागडोरों वाले उत्तम प्रबन्धक, नियम, मर्यादाओं से सम्पन्न, ( अत्याः ) सब से उत्तम पुरुष अश्वों के समान दृढ़ (युजानः ) तेरा सहयोग देने वाले ( अस्मत्राञ्चः ) हम लोगों में पूजनीय और (वज्रवाहः) खङ्ग को नित्य धारण करने वाले, (वृषण: ) बलवान्, पुरुष भी (वृष्णे) बलकारक ( मदाय ) तृप्ति और हर्ष के लिये ( सुयुजः ) उत्तम मनोयोग देते हुए ( त्वां वहन्तु ) तुझको अपने ऊपर धारण करें ।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः – १, ३, ४ निचृदनुष्टुप् । २, ५ स्वराडुष्णिक् । ६ आसुरी पंक्ति: । ७ भुरिक् पंक्तिः । ८ निचृत्पंक्तिः । ९, १२, १६ पंक्तिः । १०, ११, १३, २२ विराट् त्रिष्टुप् । १४, १५, १७, १८, २०, २४ निचृत्त्रिष्टुप् । १९, २१, २३ त्रिष्टुप् ।। चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम् ।।

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    विषय

    कैसे इन्द्रियाश्व सोमपान करें?

    पदार्थ

    [१] (त्वा) = तुझे (हरयः) = ये इन्द्रियाश्व (वृष्णे) = शक्ति का सेचन करनेवाले, (मदाय) = उल्लास के जनक सोम के पान के लिये (आ वहन्तु) = समन्तात् कार्यों में प्राप्त करायें। निरन्तर क्रियाओं में व्याप्त इन्द्रियाँ इस सोम के रक्षण के योग्य बनायें। यह सुरक्षित सोम हमारे में शक्ति का सेचन करे [वृषा] = और हमें हर्ष देनेवाला हो [मद] । हमारे इन्द्रियाश्व (वृषणः) = शक्ति का अपने में सेचन करनेवाले हों। (युजाना:) = शरीर रथ में जुते हुए, अर्थात् सदा स्वकार्य व्याप्त हों। (वृषरथासः) = शक्तिशाली शरीर रूप रथवाले, (वृषरश्मयोः) = शक्तिशाली मनरूप लगामवाले व (अत्याः) = निरन्तर गतिशील हों। [२] ये इन्द्रियाश्व (अस्मत्राञ्चः) = हमारे प्रति [प्रभु के प्रति] आते हुए, अर्थात् प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलते हुए, (वृषणः) = शक्तिशाली व नित्य तरुण हों । (वज्रवाहः) = क्रियाशीलता रूप वज्र का धारण करनेवाले (सुयुजः) = सदा शोभन कर्मों में लगे हुए हों।

    भावार्थ

    भावार्थ- सतत स्व-कार्य-व्यापृत व प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलनेवाले इन्द्रियाश्व सोम का, वीर्यशक्ति का पान करनेवाले हों।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. राजाने उत्तम प्रकारे परीक्षा करून उत्तम गुण, कर्म, स्वभावाच्या माणसांना राजकार्याच्या पदावर नियुक्त करावे व स्वतःही श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभावयुक्त बनावे. ॥ १९ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra, O leading light and spirit of the nation of humanity, may the pioneers, brave and heroic, united with you in thought and action, blazing as sunrays and falling as showers, instant in initiative and perfect in aim, riding mighty chariots, concentrating on our defence and protection, generous and magnanimous, wielding thunder and lightning, willing warriors all, conduct and bring you here for our strength and joy of life’s victory.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How should the minister be-is told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O king ! let those mighty persons, who are powerful and quick going like the horses, are of concentrated mind, possessors of strong well-built chariots, showerers of the happiness of victory and splendid like the rays of the sun, pervading in all good merits and actions, approaching those good persons, who protect us from enemies, bearers of the science of arms and missiles, subduers of the strength of the foes and good comrades bring you here for joy or bliss, which give strength. You should also treat them with love.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    A king should appoint men endowed with good merits, actions and temperament for all administrative posts after testing thoroughly, and he himself should also be of noble virtues, actions and temperament.

    Translator's Notes

    Not taking into consideration the epithets of ह्ररय: like युजान्तः बज्रवाहः, अस्मव्राज्य: etc. almost all commentators have interpreted as हरयः horses where Maharshi Dayananda Sarasvati, taking into account all these epithets and the clear authority of the Vedic Lexicon Nighantu 2-3 हरय इति मनुष्यनाम (NG 2, 3) has rightly interpreted हरयः here as सुशिक्षिता अश्वा इव मनुष्याः । How deep was his seer-like insight which other commentators lacked in spite of their scholarship.

    Foot Notes

    (हरयः) सुशिक्षिता-अश्वा इव मनुष्याः । हरय इति. मनुष्यनामनाम (NG 2, 3)। = Men, who are like well-trained horses. (अत्याः) सकलशुभगुणकर्म व्यापिनः । अत्र सातत्यगमने (भ्वा.) । = Pervading in all good virtues, actions and temperament. (वृषरश्मयः) रश्मय इव विजय-सुखवर्ष कास्तेजस्विनः । = Showerers of the happiness of victory. (वृषण:) शत्रुशक्तिबन्धने (चुरा ) | = Subduers of the strength of the foes.

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