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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 92 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 92/ मन्त्र 14
    ऋषिः - श्रुतकक्षः सुकक्षो वा देवता - इन्द्र: छन्दः - विराड्गायत्री स्वरः - षड्जः

    त्वे सु पु॑त्र शव॒सोऽवृ॑त्र॒न्काम॑कातयः । न त्वामि॒न्द्राति॑ रिच्यते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्वे इति॑ । सु । पु॒त्र॒ । श॒व॒सः॒ । अवृ॑त्रन् । काम॑ऽकातयः । न । त्वाम् । इ॒न्द्र॒ । अति॑ । रि॒च्य॒ते॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वे सु पुत्र शवसोऽवृत्रन्कामकातयः । न त्वामिन्द्राति रिच्यते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्वे इति । सु । पुत्र । शवसः । अवृत्रन् । कामऽकातयः । न । त्वाम् । इन्द्र । अति । रिच्यते ॥ ८.९२.१४

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 92; मन्त्र » 14
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 17; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O protector and promoter of strength and courage, seekers of ambition and victory look up to you for inspiration and depend on you for encouragement. No one excels you in incentive and exhortation.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    समाजात सर्वोत्कृष्ट व सर्वात अधिक शक्तिशाली पुरुषाला उच्च राजपद दिले जाते. सामान्य लोक आपल्या सुख साधनासाठी स्वाभाविकरीत्या त्यावर अवलंबून असतात. ॥१४॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    हे (शवसः) बल के पुत्ररक्षक! अथवा बल से अनेकों के रक्षक राजपुरुष! (कामकातयः) कामनाओं की पूर्ति के अभिलाषी जन (त्वे) तुझ पर (सु, अवृत्रन्) भली-भाँति निर्भर हैं। हे (इन्द्र) शक्तिशाली राजपुरुष! (त्वम्) तुझ से कोई भी (न अतिरिच्यते) बढ़कर नहीं॥१४॥

    भावार्थ

    समाज में सर्वोत्कृष्ट तथा सर्वाधिक शक्तिशाली पुरुष को उच्चतम राजपद प्रदान किया जाता है। साधारण जन स्व सुख-साधनों हेतु स्वभावतः उसी पर निर्भर हैं॥१४॥

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    विषय

    उस के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    ( शवसः पुत्र ) बल के द्वारा बहुतों के रक्षक ! ( कामकातयः ) अपने नाना अभिलाषाओं को कहने वाले लोग ( त्वे सु अवृत्रन् ) तेरे अधीन सुख से रहते हैं। हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! ( त्वाम् न अतिरिच्यते ) तुझ से कोई बढ़कर नहीं है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्रुतकक्षः सुकक्षो वा ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१ विराडनुष्टुप् २, ४, ८—१२, २२, २५—२७, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७, ३१, ३३ पादनिचृद् गायत्री। २ आर्ची स्वराड् गायत्री। ६, १३—१५, २८ विराड् गायत्री। १६—२१, २३, २४,२९, ३२ गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    कामकातयः

    पदार्थ

    [१] हे (शवसः) = पुत्र-बल के पुत्र, शक्ति के पुतले, सर्वशक्तिमन् प्रभो ! (कामकातयः) = [कामपराः कातयः शब्दाः येषां] नाना कामनाओं की प्रार्थना करनेवाले ये उपासक (त्वे सु अवृजन्) = आप में स्थित होते हुए उत्तम वृत्तिवाले होते हैं। आपका स्मरण करते हुए ये शुभ मार्ग से ही अपनी कामनाओं को पूर्ण करने के लिये यत्नशील होते हैं । [२] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (त्वां न अतिरिच्यते) = आप से कोई भी अधिक नहीं है। सो आपको छोड़कर और किस की आराधना करना।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु से ही हम सब काम्य पदार्थों की याचना करते हैं। प्रभु ही हमारी कामनाओं को पूर्ण करते हैं।

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