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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 92 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 92/ मन्त्र 27
    ऋषिः - श्रुतकक्षः सुकक्षो वा देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    प॒रा॒कात्ता॑च्चिदद्रिव॒स्त्वां न॑क्षन्त नो॒ गिर॑: । अरं॑ गमाम ते व॒यम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प॒रा॒कात्ता॑त् । चि॒त् । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । त्वाम् । न॒क्ष॒न्त॒ । नः॒ । गिरः॑ । अर॑म् । ग॒मा॒म॒ । ते॒ । व॒यम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पराकात्ताच्चिदद्रिवस्त्वां नक्षन्त नो गिर: । अरं गमाम ते वयम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पराकात्तात् । चित् । अद्रिऽवः । त्वाम् । नक्षन्त । नः । गिरः । अरम् । गमाम । ते । वयम् ॥ ८.९२.२७

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 92; मन्त्र » 27
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 20; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Indra, lord of clouds and mountains, wielder of thunder and lightning, our songs of adoration reach you even from far where we happen to be. We pray we may realise your presence intimately by direct experience of the spirit, beyond thought and speech.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ईश्वरापासून जास्तीत जास्त विमुख व्यक्ती ही त्याच्या गुणकीर्तनाद्वारे त्याला काही प्रमाणात समजून घेते. तेव्हा प्रभूच्या गुणांच्या स्तुतीचा अर्थ जाणून घ्यावा. ॥२७॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    हे (अद्रिवः) मेघ जैसे उदार तथा पाषाणवत् शक्तिशाली प्रभु! (नः) हमारी (गिरः) वाणी (त्वाम्) तुझ तक (पराकात् चित्) दूर से भी दूर (नक्षन्त) पहुँच जाती है (वयम्) हम (ते) तुझे (अरम्) पर्याप्त (गमाम) समझ लें॥२७॥

    भावार्थ

    प्रभु से अधिकाधिक विमुख व्यक्ति भी उसके गुणकीर्तन से उसे पर्याप्त समझ लेता है। स्पष्ट है कि प्रभु के गुणों की स्तुति अर्थ समझते हुए ही करें॥२७॥

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    विषय

    उस के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    ( पराकात्तात् चित्) दूर से भी दूर से हे ( अद्रिवः ) शक्तिमन् ! ( नः गिरः त्वां नक्षन्त ) हमारी वाणियां तुझ तक पहुंचती हैं। ( वयम् ते अरं गमाम ) हम तुझ से बहुत कुछ प्राप्त करें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्रुतकक्षः सुकक्षो वा ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१ विराडनुष्टुप् २, ४, ८—१२, २२, २५—२७, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७, ३१, ३३ पादनिचृद् गायत्री। २ आर्ची स्वराड् गायत्री। ६, १३—१५, २८ विराड् गायत्री। १६—२१, २३, २४,२९, ३२ गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    प्रभु-स्तवन व प्रभु प्राप्ति

    पदार्थ

    [१] हे (अद्रिवः) = आदरणीय प्रभो ! (पराकातात् चित्) = अत्यन्त सुदूर देश से भी (नः गिरः) = हमारी स्तुति-वाणियाँ (त्वां नक्षन्त) = आपको प्राप्त होती हैं। हम चाहे आप से कितनी भी दूर हैं, अभी आपके दर्शन के पात्र चाहे नहीं भी बन पाये हैं, तो भी आपकी सत्ता में निष्ठा रखते हुए हम आपका स्तवन करते हैं। [२] हे प्रभो ! इस प्रकार आपका स्तवन करते हुए (वयम्) = हम (ते) = आपके प्रति (अरं गमाम) = खूब ही गतिवाले हों। आपके समीप और समीप प्राप्त होनेवाले हों।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु से दूर होते हुए भी हम प्रभु का स्तवन करें। प्रभु-स्तवन करते हुए हम प्रभु को समीपता से प्राप्त होनेवाले हों।

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