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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 92 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 92/ मन्त्र 15
    ऋषिः - श्रुतकक्षः सुकक्षो वा देवता - इन्द्र: छन्दः - विराड्गायत्री स्वरः - षड्जः

    स नो॑ वृष॒न्त्सनि॑ष्ठया॒ सं घो॒रया॑ द्रवि॒त्न्वा । धि॒यावि॑ड्ढि॒ पुरं॑ध्या ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सः । नः॒ । वृ॒ष॒न् । सनि॑ष्ठया । सम् । घो॒रया॑ । द्र॒वि॒त्न्वा । धि॒या । अ॒वि॒ड्ढि॒ । पुर॑म्ऽध्या ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स नो वृषन्त्सनिष्ठया सं घोरया द्रवित्न्वा । धियाविड्ढि पुरंध्या ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सः । नः । वृषन् । सनिष्ठया । सम् । घोरया । द्रवित्न्वा । धिया । अविड्ढि । पुरम्ऽध्या ॥ ८.९२.१५

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 92; मन्त्र » 15
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 17; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O lord generous as rain showers, come and help us with constant and most favourable, venerable and sublime, instant and munificent friendly intelligence, planning and wisdom for action and advancement of the human community.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    समाज ज्या व्यक्तीला राजपुरुष म्हणून निवडतो त्याची विचारशक्ती व कर्मशक्ती शीघ्र कार्य करणारी असली पाहिजे. त्याचबरोबर त्या पुरुषाचा समाजाबद्दल अनुरागही असावा व तो इतका तेजस्वी असावा, की सर्वांनी स्वभावत: त्याचा आदर करावा. अति परिचय दोषामुळे तो मानहानीचा शिकार होता कामा नये. ॥१५॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    हे (वृषन्) बलशाली एवं सुखप्रदाता राजपुरुष! (सः) वह तू (सनिष्ठया) स्थिर अथवा हमारे प्रति घनिष्ठ अनुराग रखनेवाली, (घोरया) महा तेजस्विनी इसलिए आदरणीया, (द्रवित्न्वाः) शीघ्रता से कार्यसाधिका, (पुरन्ध्या) संसार भर की रक्षिका (धिया) प्रज्ञा तथा कर्मशक्ति सहित (नः) हमारे समाज में (अविड्ढि) प्रवेश कर॥१५॥

    भावार्थ

    समाज जिस व्यक्ति का राजपुरुष के रूप में चयन करता है उसकी विचारशक्ति तथा कर्मशक्ति शीघ्र कार्य करने वाली तो हो ही, साथ ही उस पुरुष का समाज के प्रति भी अनुराग हो और वह इतना तेजस्वी हो कि स्वभाव से ही सब उसका आदर करें; अतिपरिचयदोष के कारण वह मान-हानि का शिकार न बने॥१५॥

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    विषय

    उस के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे ( वृषन् ) बलशालिन् ! उत्तम प्रबन्धक ! ( सः ) वह तू ( सनिष्ठया ) उत्तम विभाजक, दानशील, ( घोरया ) शत्रु को भय देने वाली, ( द्रवित्न्वा ) वेग से जाने वाली ( पुरन्ध्या ) बहुतों की पालक ( घिया ) बुद्धि और क्रिया वा नीति से ( नः अविड् ढि ) हमारा पालन कर। इति सप्तदशो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्रुतकक्षः सुकक्षो वा ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१ विराडनुष्टुप् २, ४, ८—१२, २२, २५—२७, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७, ३१, ३३ पादनिचृद् गायत्री। २ आर्ची स्वराड् गायत्री। ६, १३—१५, २८ विराड् गायत्री। १६—२१, २३, २४,२९, ३२ गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    'सनिष्ठा घोरा' धी

    पदार्थ

    [१] हे (वृषन्) = सब सुखों व काम्य पदार्थों का वर्षण करनेवाले प्रभो ! (सः) = वे आप (नः) = हमें (धिया) = बुद्धि के द्वारा (अविड्ढि) = रक्षित करिये। बुद्धि ही 'मेधा' है, मेरा धारण करनेवाली है। [२] उस बुद्धि के द्वारा जो (सनिष्ठया) = [स-निष्ठया] प्रभु में पूर्ण निष्ठा व आस्थावाली है, अथवा [सन् संभक्तौ] सब उत्तम पदार्थों का सम्भजन करानेवाली है। (सं घोरया) = सम्यक् घोर है, शत्रुओं के लिये भयङ्कर है। (द्रविल्वा) = शत्रुओं को दूर भगानेवाली है तथा (पुरन्ध्या) = खूब पालन व पूरण करनेवाली है, बहुतों का धारण करनेवाली है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु हमें वह बुद्धि दें जो निष्ठावाली व सब पदार्थों को प्राप्त करानेवाली है। जो बुद्धि शत्रुओं के लिये भयङ्कर व शत्रुओं को दूर भगानेवाली है। वह बुद्धि प्रभु हमें दें जो बहुतों का धारण करनेवाली है।

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