ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 92/ मन्त्र 30
ऋषिः - श्रुतकक्षः सुकक्षो वा
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
मो षु ब्र॒ह्मेव॑ तन्द्र॒युर्भुवो॑ वाजानां पते । मत्स्वा॑ सु॒तस्य॒ गोम॑तः ॥
स्वर सहित पद पाठमो इति॑ । सु । ब्र॒ह्माऽइ॑व । त॒न्द्र॒युः । भुवः॑ । वा॒जा॒ना॒म् । प॒ते॒ । मत्स्व॑ । सु॒तस्य॑ । गोऽम॑तः ॥
स्वर रहित मन्त्र
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते । मत्स्वा सुतस्य गोमतः ॥
स्वर रहित पद पाठमो इति । सु । ब्रह्माऽइव । तन्द्रयुः । भुवः । वाजानाम् । पते । मत्स्व । सुतस्य । गोऽमतः ॥ ८.९२.३०
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 92; मन्त्र » 30
अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 20; मन्त्र » 4
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अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 20; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
O ruler, protector and promoter of the honour and excellence of life, just as a vibrant scholar of divine knowledge never slackens into sloth from wakefulness, so you too should never be slothful and half asleep. Be ever wakeful, enjoy and guard the distilled essence of knowledge and creative achievement of wealth, honour and excellence.
मराठी (1)
भावार्थ
योगिराज चतुर्वेदवेत्त्या विद्वानाप्रमाणे राजपुरुषालाही कधी आळशी होता कामा नये. राष्ट्राच्या ऐश्वर्य रक्षणासाठी त्याने सदैव सावधान असावे व या प्रकारे विविध प्रशंसकाद्वारे प्रशंसित ऐश्वर्यामध्ये मग्न असावे. ॥३०॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे (वाजनां पते) ज्ञान, बल, धन इत्यादि ऐश्वर्यों के संरक्षक राजपुरुष! (ब्रह्मा इव) योगिराज चतुर्वेदवेत्ता विद्वान् जैसे (तन्द्रयुः) आलसी नहीं होता वैसे तू भी (मा सु भवः) तन्द्रालु न बन, सदैव जागृत रह। सतर्क रह कर ऐश्वर्यों की रक्षा कर। (सुतस्य) निष्पादित (गोमतः) प्रशस्त स्तोताओं वाले ऐश्वर्य में (मत्स्व) हर्षित हो॥३०॥
भावार्थ
चतुर्वेदवेत्ता विद्वान् के तुल्य राजपुरुष भी कभी आलसी नहीं होना चाहिए; राष्ट्र के ऐश्वर्य की रक्षार्थ वह सदैव सतर्क रहे और इस भाँति विविध स्तोताओं से प्रशंसित ऐश्वर्य में मग्न रहे॥३०॥
विषय
उस के कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे ( वाजानां पते ) ज्ञानों, ऐश्वर्यो, बलों, और सेनाओं के पालक ! हे ज्ञानों के पालक ! ( ब्रह्मा इव ) चतुर्वेदवित् ब्राह्मण विद्वान् यज्ञ के ब्रह्मा के समान तू ( तन्द्रयुः मो सु भुवः ) आलस्य से युक्त मत हो। तू ( गोमतः सुतस्य ) गो दुग्ध से युक्त अन्नादि से (मत्स्व) तृप्त हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
श्रुतकक्षः सुकक्षो वा ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१ विराडनुष्टुप् २, ४, ८—१२, २२, २५—२७, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७, ३१, ३३ पादनिचृद् गायत्री। २ आर्ची स्वराड् गायत्री। ६, १३—१५, २८ विराड् गायत्री। १६—२१, २३, २४,२९, ३२ गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
मा तन्द्रयुः [अनालस्य]
पदार्थ
[१] जीव को प्रभु कहते हैं कि हे (वाजानां पते) = शक्तियों के रक्षक जीव ! तू गत मन्त्र के अनुसार प्रभु की मित्रता में दान की वृत्तिवाला बनकर धारणात्मक कर्मों को करता हुआ, (ब्रह्म इव) = प्रभु जैसा बनकर (तन्द्रयुः) = आलस्य को अपने साथ जोड़नेवाला (मा उ) = मत ही (सुभव) = सम्यक् हो। कभी आलसी न बनकर सदा सत्कर्मों में प्रवृत्त रह । [२] तू (सुतस्य) = शरीर में उत्पन्न किये गये इस (गोमतः) = प्रशस्त ज्ञान की वाणियों व इन्द्रियोंवाले सोम का रक्षण करता हुआ (मत्स्वा) = आनन्द का अनुभव कर । सुरक्षित सोम तेरे ज्ञान को बढ़ाये। यह तेरी इन्द्रियों को सशक्त बनाये और तू जीवन में आनन्द व उल्लास का अनुभव करे।
भावार्थ
भावार्थ- हम शक्तियों के स्वामी बनकर प्रभु जैसा बनते हुए कभी आलसी न हों। उत्पन्न सोम के रक्षण के द्वारा इन्द्रियों को प्रशस्त बनाकर आनन्दयुक्त जीवनवाले हों।
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