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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 92 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 92/ मन्त्र 17
    ऋषिः - श्रुतकक्षः सुकक्षो वा देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    यस्ते॑ चि॒त्रश्र॑वस्तमो॒ य इ॑न्द्र वृत्र॒हन्त॑मः । य ओ॑जो॒दात॑मो॒ मद॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः । ते॒ । चि॒त्रश्र॑वःऽतमः । यः । इ॒न्द्र॒ । वृ॒त्र॒हन्ऽत॑मः । यः । ओ॒जः॒ऽदात॑मः । मदः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यस्ते चित्रश्रवस्तमो य इन्द्र वृत्रहन्तमः । य ओजोदातमो मद: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यः । ते । चित्रश्रवःऽतमः । यः । इन्द्र । वृत्रहन्ऽतमः । यः । ओजःऽदातमः । मदः ॥ ८.९२.१७

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 92; मन्त्र » 17
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 18; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    That ananda, will and pleasure of yours which is most wonderful and famous, which destroys evil and darkness upon the instant completely and which is most potent in inspiring the celebrant with the courage of action, honour and dignity, with that, prey, inspire us and let us share that ecstasy.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वर्णित ईश्वरीय आनंद संपूर्णपणे निष्पापच असतो. माणसांनी अशा आनंदाचे सेवन केले पाहिजे. ॥१७॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) प्रभो! उस हर्ष में अब हमें भी हर्षित कर कि (यः) जो (ते) तेरा हर्ष (चित्रश्रवस्तमः) नितान्त आश्चर्यजनकरूप से अतिशय श्रवण करने योग्य या प्रशंसनीय है; (यः) जो (वृत्रहन्तमः) विघ्नकारी, गुणों की अवरोधक शक्तियों को नष्ट करने में समर्थ है और (यः) जो (ओजोदातमः) ओजस्विता का आधान करने में समर्थ है॥१७॥

    भावार्थ

    निश्चित रूप से ही इस मन्त्र में वर्णित ईश्वरीय हर्ष सर्वथा निष्पाप ही होता है। मनुष्यों को ऐसे ही हर्ष का सेवन करना अपेक्षित है॥१७॥

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    विषय

    उस के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! ( यः ) जो ( ते ) तेरा (चित्र-श्रवस्तमः ) आश्चर्यकारक श्रवण करने योग्य अद्भुत और ( यः वृत्रहन्तमः ) शत्रुओं को खूब दण्डित करने वाला और ( यः ओजो-दातमः ) पराक्रम को देने वाला ( मदः ) आनन्द वा हर्ष है तू उससे हमें भी सुखी कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्रुतकक्षः सुकक्षो वा ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१ विराडनुष्टुप् २, ४, ८—१२, २२, २५—२७, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७, ३१, ३३ पादनिचृद् गायत्री। २ आर्ची स्वराड् गायत्री। ६, १३—१५, २८ विराड् गायत्री। १६—२१, २३, २४,२९, ३२ गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    'चित्रश्रवस्तम, वृत्रहन्तम, ओजोदातम' मद

    पदार्थ

    [१] हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! हमें उस मद को, हर्षजनक सोम को प्राप्त कराइये (यः) = जो (ते) = आपका (मदः) = उल्लासजनक सोम (चित्रश्रवस्तमः) = अद्भुत ज्ञान को सर्वाधिक प्राप्त करानेवाला है । (यः) = जो सोम (वृत्रहन्तमः) = वासना को अधिक से अधिक नष्ट करनेवाला है। और (यः) = जो (ओजोदातमः) = अत्यधिक ओज को देनेवाला है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु से प्राप्त कराया गया यह उल्लासजनक सोम [क] अद्भुत ज्ञान को देनेवाला है, [ख] वासना को विनष्ट करनेवाला है और [ग] हमें खूब ही ओजस्वी बनानेवाला है।

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