ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 92/ मन्त्र 23
ऋषिः - श्रुतकक्षः सुकक्षो वा
देवता - इन्द्र:
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
वि॒व्यक्थ॑ महि॒ना वृ॑षन्भ॒क्षं सोम॑स्य जागृवे । य इ॑न्द्र ज॒ठरे॑षु ते ॥
स्वर सहित पद पाठवि॒व्यक्थ॑ । म॒हि॒ना । वृ॒ष॒न् । भ॒क्षम् । सोम॑स्य । जा॒गृ॒वे॒ । यः । इ॒न्द्र॒ । ज॒ठरे॑षु । ते॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
विव्यक्थ महिना वृषन्भक्षं सोमस्य जागृवे । य इन्द्र जठरेषु ते ॥
स्वर रहित पद पाठविव्यक्थ । महिना । वृषन् । भक्षम् । सोमस्य । जागृवे । यः । इन्द्र । जठरेषु । ते ॥ ८.९२.२३
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 92; मन्त्र » 23
अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 19; मन्त्र » 3
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अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 19; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
O lord of universal love and grace as showers of rain, ever awake in the world of existence, your divine bliss pervades all that essence of soma, joy and beauty of life, which is food for the human soul, and it ripples and rolls in the blissful reservoirs of your divine presence.
मराठी (1)
भावार्थ
प्रभूच्या सृष्टीतील पदार्थात माणसाचा जितका सेवनीय अंश आहे, त्याच्यावर प्रभूच्या बुद्धीचा अधिकार आहे. परमात्मा माणसाच्या कर्मानुसार आपल्या विवेकबुद्धीने भोग्य पदार्थाचे जणू वाटप करतो. ॥२३॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे (वृषन्) सुखदाता! (जागृवे) जागरूक! सदैव सतर्क! (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् परमेश्वर! (यः) जो (ते) तेरे (जठरेषु) उदर की भाँति अन्तर्हित सुखाधिष्ठानों में (सोमस्य) ऐश्वर्य का (भक्षम्) मेरा भक्षणीय (या) सेवनीय अंश है उसे तूने (महिना) अपनी बुद्धि से (विव्यक्थ) व्याप्त किया है॥२३॥
भावार्थ
भगवान् की सृष्टि के पदार्थों में मानव का जितना सेवनीय अंश है--उस पर प्रभु की बुद्धि का अधिकार है। परमात्मा मनुष्य के कर्मानुसार अपनी विवेक बुद्धि से भोग्य पदार्थों को मानो वितरित करते हों॥२३॥
विषय
उस के कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! ( यः ) जो तेरे ( जठरेषु ) उदरों में, तेरे अधीन है, हे ( जागृवे ) जागरणशील ! हे ( वृषन् ) बलशालिन् ! तू उस ( सोमस्य भक्षं ) महान् ऐश्वर्य के सेवनीय अंश को ( महिना ) अपने महान् सामर्थ्य से ( विव्यक्थ ) व्याप्त है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
श्रुतकक्षः सुकक्षो वा ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१ विराडनुष्टुप् २, ४, ८—१२, २२, २५—२७, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७, ३१, ३३ पादनिचृद् गायत्री। २ आर्ची स्वराड् गायत्री। ६, १३—१५, २८ विराड् गायत्री। १६—२१, २३, २४,२९, ३२ गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
प्रभु के उदर को सोम से मरना
पदार्थ
[१] हे (वृषन्) = सुखों का वर्षण करनेवाले (जागृवे) = सदा जागरणशील प्रभो! आप ही (महिना) = अपनी महिमा से (सोमस्य भक्षम्) = सोम के भक्षण को (विव्यक्थ) = व्याप्त करते हैं। अर्थात् आपके अनुग्रह से ही सोम का शरीर में व्यापन होता है। [२] हे (इन्द्र) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! उस सोम का आप व्यापन करते हो (यः) = जो (ते जठरेषु) = आपके उदरों में हैं। हम अपने इन उदरों को जब आपका उदर बना देते हैं, अर्थात् इसे आपका ही जानकर पवित्र रखने का प्रयत्न करते हैं, तो सोम इसमें सुरक्षित रहता है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु सदा जागरणशील [अप्रमत्त] व हमारे पर सुखों का वर्षण करनेवाले हैं। वे प्रभु हमारे अन्दर सोम का रक्षण करते हैं। हम इन उदरों को प्रभु का उदर बना के पवित्र भोजनों को करते हुए सोम का रक्षण कर पायें।
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