ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 92/ मन्त्र 16
ऋषिः - श्रुतकक्षः सुकक्षो वा
देवता - इन्द्र:
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
यस्ते॑ नू॒नं श॑तक्रत॒विन्द्र॑ द्यु॒म्नित॑मो॒ मद॑: । तेन॑ नू॒नं मदे॑ मदेः ॥
स्वर सहित पद पाठयः । ते॒ । नू॒नम् । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । इन्द्र॑ । द्यु॒म्निऽत॑मः । मदः॑ । तेन॑ । नू॒नम् । मदे॑ । म॒देः॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
यस्ते नूनं शतक्रतविन्द्र द्युम्नितमो मद: । तेन नूनं मदे मदेः ॥
स्वर रहित पद पाठयः । ते । नूनम् । शतक्रतो इति शतऽक्रतो । इन्द्र । द्युम्निऽतमः । मदः । तेन । नूनम् । मदे । मदेः ॥ ८.९२.१६
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 92; मन्त्र » 16
अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 18; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 18; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
O lord of a hundred great actions, Indra, ruler of the world, the most generous, brilliant and ecstatic will and pleasure that is yours, by that, pray, inspire us and let us share the joy of divine achievement.
मराठी (1)
भावार्थ
सर्वजण आनंदात राहू इच्छितात. ऐश्वर्यवान व्यक्ती आपल्या समृद्धीच्या बलावर आनंदात मग्न असतात; परंतु उपासक परमेश्वराला असा आनंद मागतो, ज्यामुळे परम प्रभू आनंदित होतो. अर्थात् यशस्वी आनंद या जगातील ऐश्वर्यवान लोक असा आनंद साजरा करतात, की ज्याला विलासिता म्हणता येईल. त्यामुळे त्यांचे अपयश सूचित होते. अशा आनंदापासून उपासकाने बचाव करून घेतला पाहिजे. ॥१६॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे (शतक्रतो) सैकड़ों प्रकार के प्रज्ञान तथा क्रिया शक्ति से समृद्ध (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् परमेश्वर! (नूनम्) निस्सन्देह (यः) जो (ते) आपका (द्युम्नितमः) नितान्त यशस्वी (मदः) हर्ष है; (तेन मदे) उस हर्ष में (नूनम्) अब (मदेः) हमें भी हर्षित बना॥१६॥
भावार्थ
हर्षित तो सभी होना चाहते हैं; ऐश्वर्यवान् जन अपनी समृद्धि के बल पर हर्ष में रत रहते हैं; परन्तु उपासक तो परमेश्वर से वही हर्ष माँगता है कि जिस हर्ष से परम प्रभु हर्षित रहते हैं अर्थात् अत्यन्त यशस्वी हर्ष। इस लोक के ऐश्वर्यवान् व्यक्ति ऐसे हर्ष भी मनाते हैं, जो उनके अपयश के सूचक हैं। ऐसे हर्षों से उपासक बचे॥१६॥
विषय
उस के कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे ( शतक्रतो ) अपरिमित बलशालिन् ! हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! ( नूनं ) निश्चय ही (ते) तेरा ( यः ) जो ( द्युम्नि-तमः ) अति यशो-जनक ( मदः ) हर्ष है ( तेन ) उस से ( मदे ) सब को तृप्त प्रसन्न हर्षित करने में तू ( मदेः ) स्वयं हर्षित हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
श्रुतकक्षः सुकक्षो वा ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१ विराडनुष्टुप् २, ४, ८—१२, २२, २५—२७, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७, ३१, ३३ पादनिचृद् गायत्री। २ आर्ची स्वराड् गायत्री। ६, १३—१५, २८ विराड् गायत्री। १६—२१, २३, २४,२९, ३२ गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
'द्युम्नितमः ' मदः
पदार्थ
[१] हे (शतक्रतो) = अनन्त प्रज्ञान व शक्तिवाले (इन्द्र) = शत्रु-विद्रावक प्रभो ! (यः) = जो (ते) = आपका दिया हुआ (मदः) = हर्ष का उत्पादक यह सोम है, वह (नूनम्) = निश्चय से (द्युम्नितमः) = हमारे जीवनों को खूब ही ज्योतिर्मय बनानेवाला है। [२] तेन उस उल्लास जनक सोम से (नूनम्) = निश्चय ही (मदे) = उल्लास के होने पर आप (मदे:) = हमें आनन्दित करनेवाले हों।
भावार्थ
भावार्थ-सुरक्षित सोम जीवन को ज्योतिर्मय व उल्लासयुक्त करता है। इससे जीवन आनन्दमय बनता है।
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