यजुर्वेद - अध्याय 19/ मन्त्र 20
ऋषिः - हैमवर्चिर्ऋषिः
देवता - यजमानो देवता
छन्दः - भुरिगुष्णिक्
स्वरः - ऋषभः
136
प॒शुभिः॑ प॒शूना॑प्नोति पुरो॒डाशै॑र्ह॒वीष्या। छन्दो॑भिः सामिधे॒नीर्या॒ज्याभिर्वषट्का॒रान्॥२०॥
स्वर सहित पद पाठप॒शुभि॒रिति॑ प॒शुभिः॑। प॒शून्। आ॒प्नो॒ति॒। पु॒रो॒डाशैः॑। ह॒वीषि॑। आ। छन्दो॑भि॒रिति॒ छन्दः॑ऽभिः। सा॒मि॒धे॒नीरिति॑ साम्ऽइधे॒नीः। या॒ज्या᳖भिः। व॒ष॒ट्का॒रानिति॑ वषट्ऽका॒रान् ॥२० ॥
स्वर रहित मन्त्र
पशुभिः पशूनाप्नोति पुरोडाशैर्हवीँष्या । छन्दोभिः सामिधेनीर्याज्याभिर्वषट्कारान् ॥
स्वर रहित पद पाठ
पशुभिरिति पशुभिः। पशून्। आप्नोति। पुरोडाशैः। हवीषि। आ। छन्दोभिरिति छन्दःऽभिः। सामिधेनीरिति साम्ऽइधेनीः। याज्याभिः। वषट्कारानिति वषट्ऽकारान्॥२०॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यथा सद्गृहस्थः पशुभिः पशून् पुरोडाशैर्हवींषि छन्दोभिस्सामिधेनीर्याज्याभिर्वषट्कारानाऽऽप्नोति तथैतान् यूयमाप्नुत॥२०॥
पदार्थः
(पशुभिः) गवादिभिः (पशून्) गवादीन् (आप्नोति) (पुरोडाशैः) पचनक्रियासंस्कृतैः (हवींषि) होतुमर्हाणि वस्तूनि (आ) (छन्दोभिः) प्रज्ञापकैर्गायत्र्यादिभिः (सामिधेनीः) सम्यगिध्यन्ते याभिस्ताः सामिधेनीः (याज्याभिः) याभिः क्रियाभिरिज्यन्ते ताभिः (वषट्कारान्) ये वषट् धर्म्यां क्रियां कुर्वन्ति तान्॥२०॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। योऽत्र बहुपशुर्हविर्भुग्वेदवित्सत्क्रियो मनुष्यो भवेत्, स प्रशंसामाप्नोति॥२०॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! जैसे सद्गृहस्थ (पशुभिः) गवादि पशुओं से (पशून्) गवादि पशुओं को (पुरोडाशैः) पचन क्रियाओं से पके हुए उत्तम पदार्थों से (हवींषि) हवन करते योग्य उत्तम पदार्थों को (छन्दोभिः) गायत्री आदि छन्दों की विद्या से (सामिधेनीः) जिससे अग्नि प्रदीप्त हो, उस सुन्दर समिधाओं को (याज्याभिः) यज्ञ की क्रियाओं से (वषट्कारान्) जो धर्मयुक्त क्रिया को करते हैं, उनको (आ, आप्नोति) प्राप्त होता है, वैसे इनको तुम भी प्राप्त होओ॥२०॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो संसार में बहुत पशु वाला होम करके, हुतशेष का भोक्ता, वेदवित् और सत्यक्रिया का कर्त्ता मनुष्य होवे, सो प्रशंसा को प्राप्त होता है॥२०॥
विषय
राजा का बल-सम्पादन । राष्ट्रयज्ञ का विस्तार ।
भावार्थ
२८. (पशुभिः पशून् आप्नोति) यज्ञगत पशुओं द्वारा राष्ट्र के पशुओं की तुलना है । २९. (पुरोडाशैः हवींषि ) यज्ञ के पुरोडाशों से राष्ट्र के अन्न आदि भोग्य पदार्थों की तुलना है । ३०. (छन्दोभि: [ छन्दांसि ] ) यज्ञ में मन्त्ररूप छन्दों से राष्ट्र में- नाना अधिकार और व्यवहारों, व्यवसायों, कानूनों, विधानों की तुलना है। ३१. ( [ सामिधेनीभि: ] सामिधेनी: ) यज्ञ में समिधा आधान की ऋचाओं द्वारा सामिधेनी अर्थात् राष्ट्र में सेना के विशेष अधिकार और सेनाबलों की तुलना है । ३२. ( याज्याभि: [ याज्या: ] ) यज्ञ की याज्या ऋचाओं से राष्ट्र की याज्या अर्थात् भूमि, अन्न और धन के दानों की तुलना है । ३३. ([ वषट्कारैः ] वषट्कारान् ) यज्ञ के वषट्कारों से राष्ट्र में 'योग्य पुरुषों को योग्य अधिकार सत् कारों की तुलना है । इस प्रकार "यज्ञ' राज्यरचना की व्याख्या करता 1 वज्रो वै सामिधेन्यः । कौ० ३ । २, ३ ॥ ' याज्या' - इयं पृथिवी -याज्या । श० १/७/२/११ ॥ अन्नं वै याज्या | कौ० १५ । ३ ॥ प्रत्तिर्वै याज्या पुण्यैव लक्ष्मीः । ऐ० २।४० ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
यजमानः । भुरिग् उष्णिक् । ऋषभः ||
विषय
पशुओं से पशुओं को
पदार्थ
१. (पशुभिः) = पशुओं से (पशून्) = पशुओं को (आप्नोति) = प्राप्त करता है। यदि दौर्भाग्यवश माता-पिता में 'कामः पशुः क्रोधः पशुः ' इस उपनिषद् वाक्य के अनुसार काम-क्रोधादि पशुवृत्तियाँ प्रबल होंगी तो वे इन पशुवृत्तियों की प्रबलतावाले सन्तानों को ही प्राप्त करेंगे। २. (पुरोडाशैः) = [पुर: दाश्नोति = kill] परन्तु सबसे प्रथम इन काम-क्रोधादि के संहार से (पुरोडाशान्) = सबसे प्रथम काम-क्रोध का संहार करनेवाली सन्तानों को प्राप्त करता है । ३. (हविर्भिः) = [हु दानादनयोः] दानपूर्वक अदन की वृत्तियों से (हवींषि आप्नोति) = देकर खाने की वृत्तिवाले सन्तानों को पाता है ४. (छन्दोभिः) = [छन्दांसि छादनात् ] अपने को पापों से बचाने की वृत्तियों से (छन्दांसिः) = अपने को पाप से बचानेवाले सन्तानों को प्राप्त करता है ५. (सामिधेनीभि:) = अपने में ज्ञान की समिधाओं के आधान की वृत्तियों से, अर्थात् ज्ञानदीप्तियों के द्वारा (सामिधेनी:) = ज्ञानदीप्तियोंवाली सन्तानों को पाता है। ६. (याज्याभिः) = यज्ञ की क्रियाओं से (याज्ञा:) = यज्ञक्रियाओंवाली सन्तानों को और ७ (वषट्कारैः) = वाक्शक्ति के विकासों से (वषट्कारान्) = विकसित वाक्शक्तिवाली सन्तानों को प्राप्त करता है।
भावार्थ
भावार्थ-माता-पिता का पाशविक आचरण सन्तानों को पशुतुल्य बना देता है।
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जो या जगात गाई वगैरे पुष्कळ पशूंपासून प्राप्त होणाऱ्या पदार्थांचा तूप वगैरेंनी होम करून हुतशेषाचा (उरलेला भाग) भोक्ता, वेदज्ञ, सत्य कर्म करणारा माणूस बनतो तो प्रशंसनीय असतो.
विषय
पुनश्च, तोच विषय -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, ज्या प्रमाणे कोणीही सद्गृहस्थ (पशुभिः) गौ आदी पशूंचे (पालन-संगोपन-वृद्धी करतो, तसेच (पुरोडाशैः) शिजविण्याच्या योग्य क्रियांद्वारे (हवींषि) होम करण्यास योग्य अशा उत्तम पदार्थ (एकत्रित करतो) (तसे तुम्हीही करा) हे लोकहो, जसे कोणी विद्वान (छन्दोभिः) गायत्री आदी छंद शास्त्राद्वारे (सामिधेनीः) अग्नीला उत्तमप्रकारे प्रदीप्त करणाऱ्या समिधा एकत्रित करतो आणि (याज्याभिः) यज्ञ-क्रिया, विधीद्वारे (वषट्कारान्) धर्मयुक्त कार्य करतो, तो (आ, आप्नोति) सुख प्राप्त करतो, तुम्ही समाजातील इतर सर्वलोकांनीही तसेच केले पाहिजे ॥20॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. या जगात जो माणूस अनेक पशूंचे पालन करतो, सदा यज्ञ करतो, यज्ञानंतर अवशिष्ट शेष अन्नादीचे सेवन करतो, वेदांचे अध्ययन-पठन करतो आणि केवळ सत्यकर्में करतो, तो या संसारात अवश्यमेव प्रशंसनीय ठरतो. ॥20॥
इंग्लिश (3)
Meaning
A householder gains cows from cows, sacrificial materials from ground rice-cakes, fire-kindling fuel from the knowledge of metres like Gayatri etc. , and virtuous people from sacrificial practices.
Meaning
By love and care of animals, you beget the wealth of animals. By oblations of rice cakes and generous gifts, you get the wealth of holy materials. By the knowledge and practice of sacred verses, you get the secrets of fire kindling. And by sacrificial chants and actions, you collect holy people around you.
Translation
By animals one gets animals; by offering sacrificial cakes one gets sacrificial provisions; by metres one gets kindling verses (samidheni) and by sacred hymns one gets sacrificial oblations. (1)
Notes
Purodāśa, a mass of ground rice made into a rice cake, something like idliof South India. Also, any oblation offered in sacrificial fire. According to the commentators, this verse is to be inter preted as पुरोडाशैः पुरोडाशान्, हविर्भिः हवींषि, छन्दोभिः छन्दांसि, सामिधेनीभिः सामिधेनीः, याज्याभिर्याज्याः, वषट्कारैः वषट्कारान् । Sămidenīḥ, mantras with which the sacrificial fire is kindled. Yajyā, mantras recited by the hota, when oblations are poured into the fire.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! যেমন সদ্গৃহস্থ (পশুভিঃ) গবাদি পশুগুলির দ্বারা (পশূন্) গবাদি পশুগুলিকে (পুরোডাশৈঃ) পচন ক্রিয়াগুলির দ্বারা পক্ব উত্তম পদার্থের দ্বারা (হবিংষি) হবন করণীয় উত্তম পদার্থগুলিকে (ছন্দোভিঃ) গায়ত্রী আদি ছন্দের বিদ্যা দ্বারা (সামিধেনীঃ) যদ্দ্বারা অগ্নি প্রদীপ্ত হয় সেই সুন্দর সমিধাগুলিকে (য়াজ্যাভিঃ) যজ্ঞের ক্রিয়াগুলির দ্বারা (বষট্কারান্) যাহারা ধর্মযুক্ত ক্রিয়া করে তাহাদিগকে (আ, আপ্নোতি) প্রাপ্ত হয় সেইরূপ ইহাদিগকে তোমরাও প্রাপ্ত হও ॥ ২০ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যে এই সংসারে বহু পশুযুক্ত হোম করিয়া হুতশেষের ভোক্তা বেদবিৎ এবং সত্যক্রিয়ার কর্ত্তা মনুষ্য হইবে সে প্রশংসা লাভ করিয়া থাকে ॥ ২০ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
প॒শুভিঃ॑ প॒শূনা॑প্নোতি পুরো॒ডাশৈ॑র্হ॒বীᳬंষ্যা ।
ছন্দো॑ভিঃ সামিধে॒নীর্য়া॒জ্যা᳖ভির্বষট্কা॒রান্ ॥ ২০ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
পশুভিরিত্যস্য হৈমবর্চির্ঋষিঃ । য়জমানো দেবতা । ভুরিগুষ্ণিক্ ছন্দঃ । ঋষভঃ স্বরঃ ॥
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