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यजुर्वेद अध्याय - 34

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  • यजुर्वेद - अध्याय 34/ मन्त्र 19
    ऋषिः - देवश्रवा देववातश्च भारतावृषी देवता - इन्द्रो देवता छन्दः - निचृत् त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    137

    न ते॑ दू॒रे प॑र॒मा चि॒द् रजा॒स्या तु प्र या॑हि हरिवो॒ हरि॑भ्याम्।स्थि॒राय॒ वृष्णे॒ सव॑ना कृ॒तेमा यु॒क्ता ग्रावा॑णः समिधा॒नेऽअ॒ग्नौ॥१९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न। ते॒। दू॒रे। प॒र॒मा। चि॒त्। रजा॑सि। आ। तु। प्र। या॒हि॒। ह॒रि॒व॒ इति॑ हरि॒ऽवः। हरि॑भ्या॒मिति॒ हरि॑ऽभ्याम् ॥ स्थि॒राय॑। वृष्णे॑। सव॑ना। कृ॒ता। इ॒मा। यु॒क्ता। ग्रावा॑णः स॒मि॒धा॒न इति॑ सम्ऽइधा॒ने। अ॒ग्नौ ॥१९ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    न ते दूरे परमा चिद्रजाँस्यस्या तु प्र याहि हरिवो हरिभ्याम् । स्थिराय वृष्णे सवना कृतेमा युक्ता ग्रावाणः समिधानेऽअग्नौ ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    न। ते। दूरे। परमा। चित्। रजासि। आ। तु। प्र। याहि। हरिव इति हरिऽवः। हरिभ्यामिति हरिऽभ्याम्॥ स्थिराय। वृष्णे। सवना। कृता। इमा। युक्ता। ग्रावाणः समिधान इति सम्ऽइधाने। अग्नौ॥१९॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 34; मन्त्र » 19
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः सभाध्यक्षः किं कुर्य्यादित्याह॥

    अन्वयः

    हे हरिवो राजन्! यथा समिधानेऽग्नौ इमा सवना कृता तु ग्रावाणो युक्ता भूत्वाऽऽगच्छन्ति तथा स्थिराय वृष्णे हरिभ्यामाप्रयाहि। एवं कृते परमा चिद् रजांसि ते दूरे न भवन्ति॥१९॥

    पदार्थः

    (न) निषेधे (ते) तव सकाशात् (दूरे) विप्रकृष्टे (परमा) परमाणि दूरस्थानि (चित्) अपि (रजांसि) स्थानानि (आ) (तु) हेतौ (प्र) (याहि) गच्छ (हरिवः) प्रशस्तौ हरी विद्येते यस्य तत्सम्बुद्धौ (हरिभ्याम्) धारणाकर्षणवेगगुणैर्युक्ताभ्यां तुरङ्गाभ्यां जलाऽग्निभ्यां वा (स्थिराय) (वृष्णे) सुखसेचकाय पदार्थाय (सवना) प्रातःसवनादीनि कर्माणि (कृता) कृतानि (इमा) इमानि (युक्ताः) एकीभूताः (ग्रावाणः) गर्जनाकर्त्तारौ मेघाः। ग्रावेति मेघनामसु पठितम्॥ (निघं॰१।१०) (समिधाने) समिध्यमाने। अत्र यको लुक्। (अग्नौ)॥१९॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे विद्वांसो! यथा पावकेनोत्पादिता वर्षिता मेघाः पृथिव्याः समीपे भवन्त्याकर्षणेन दूरमपि गच्छन्ति तथाऽग्न्यादियानैर्गमने कृते कोऽपि देशो दूरे न भवति। एवं पुरुषार्थं कृत्वाऽलमैश्वर्याणि जनयत॥१९॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर सभाध्यक्ष राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे (हरिवः) प्रशस्त घोड़ों वाले राजन्! जैसे (समिधाने) प्रदीप्त किये हुए (अग्नौ) अग्नि में (इमा) ये (सवना) प्रातःसवनादि यज्ञकर्म (कृता) किये जाते हैं, (तु) इसी हेतु से (ग्रावाणः) गर्जना करनेवाले मेघ (युक्ताः) इकट्ठे होके आते हैं, वैसे (स्थिराय) दृढ़ (वृष्णे) सुखदायी विद्यादि पदार्थ के लिये (हरिभ्याम्) धारण और आकर्षण के वेगरूप गुणों से युक्त घोड़ों वा जल और अग्नि से (आ, प्र, याहि) अच्छे प्रकार आइये। इस प्रकार करने से (परमा) दूरस्थ (चित्) भी (रजांसि) स्थान (ते) आपके (दूरे) दूर (न) नहीं होते हैं॥१९॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् लोगो! जैसे अग्नि से उत्पन्न किये वर्षा के मेघ पृथिवी के समीप होते आकर्षण से दूर भी जाते हैं, वैसे अग्नि के यानों से गमन करने में कोई देश दूर नहीं होता। इस प्रकार पुरुषार्थ करके सम्पूर्ण ऐश्वर्यो को उत्पन्न करो॥१९॥

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    विषय

    विद्वानों और नायक राजा के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    हे (हरिवः) अश्वों के स्वामिन् ! (परमा चित् रजांसि ) दूर से दूर के लोक, प्रजाजनों के निवासस्थान और शत्रुओं के देश भी (ते) तेरे लिये (दूरे न) दूर नहीं हैं । तू ( हरिभ्याम् ) अश्वों से ही (आ प्र याहि) सब देशों में आया जाया कर । (स्थिराय) स्थिर (वृष्णे ) सुखों के वर्षक, बलवान् तेरे लिये ही (इमा ) ये सब (सवना) ऐश्वर्य उत्पादक कार्य (कृता) किये जाते हैं और ( समिधाने अग्नौ ) अति प्रदीप्त अग्नि में जिस प्रकार ( सवाना कृता) यज्ञ कर्म करने पर ( ग्रावाण:) मेघ उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार तुझ नायक, पुरुष के अग्नि के समान युद्ध में प्रज्वलित हो जाने पर (ग्रावाणः) ज्ञानों का उपदेश करने वाले विद्वान् एवं पाषाणों के समान दुष्टों के दलन करने वाले बलवान् पुरुष (युक्ताः) योग्य स्थानों पर नियुक्त हों । (२) परमेश्वर को दूर से दूर का स्थान भी दूर नहीं । वह अपने धारण और आकर्षण सामर्थ्य से सब में व्याप्त है । उसके ही ये हुए ये सब कार्य हैं । हृदय में प्रदीप्त हो जाने पर ही ये सब (ग्रावाणः) समस्त स्तुतिकर्त्ता विद्वान् योग द्वारा उसका साक्षात् करते हैं ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    देवश्रवोदेववातौ । इन्द्रः । निचृत् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥

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    विषय

    'यज्ञ, भक्ति व ज्ञान' का समन्वय

    पदार्थ

    प्रस्तुत मन्त्र में प्रभु 'देवश्रव' से कहते हैं - १. हे देवश्रव! वे उत्कृष्ट लोक, जिन्हें तूने प्राप्त करना है, (ते दूरे न) = तुझसे दूर नहीं हैं। सौम्य, सखा, सोमपायी, सत्त्वस्थ व सहनशील बनकर तू उन लोकों के समीप पहुँच गया है। हे (हरिवः) = उत्कृष्ट इन्द्रियरूप घोड़ोंवाले! (हरिभ्याम्) = अपने इन ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप घोड़ों से (तु चित्) = निश्चय से (परमा रजांसि) = उत्कृष्ट लोकों में (आप्रयाहि) = सवर्था आ । प्रभु ने हमारे इस शरीररूप रथ में परन्तु इन्द्रियरूप घोड़े जोते तो इसीलिए हैं कि हम इनके द्वारा उत्कृष्ट लोकों में पहुँच सकें, सामान्यतः हीनाकर्षण के कारण हम उत्कर्ष के मार्ग पर न चलकर अपकर्ष के मार्ग पर भागे चले जाते हैं, परन्तु 'देवश्रवदेववात' उत्तम ज्ञान व प्रेरणा प्राप्त करता हुआ उत्कृष्ट लोकों की ओर ही बढ़ता है। २. इस देवश्रव की बुद्धि विषयों से आन्दोलित नहीं होती, यह स्थितप्रज्ञ बना रहता है। (स्थिराय) = इस स्थिर बुद्धिवाले (वृष्णे) = शक्तिशाली पुरुष के लिए अक्षर ब्रह्म' [प्रभु] ने वेदों में यज्ञों का (इमा सवना कृता) = ये यज्ञ बनाये गये हैं। उस प्रतिपादन किया है, जिससे ये स्थिर बुद्धिवाले शक्तिशाली पुरुष इन यज्ञों के करने में अपने समय का सद्व्यय कर पाएँ। ३. ये यज्ञों में लगे हुए 'देवश्रव' लोग (अग्नौ समिधाने) = यज्ञों में अग्नि के दीप्त होने पर (युक्ताः) = योगयुक्त होते हैं तथा (ग्रावाणः) = उत्कृष्ट वेदगिरा [वेदवाणी] के उपदेष्टा बनते हैं। ये केवल यज्ञों में ही अपने जीवन को समाप्त नहीं कर देते। यज्ञों के साथ ये योग का अभ्यास करते हैं, अपने मन की वृत्तियों को प्राणनिरोध द्वारा केन्द्रित करके ये उस प्रभु में अपने को युक्त करते हैं तथा इस निरुद्ध चित्तवृत्ति को ज्ञानोपार्जन में लगाके, स्वयं ऊँचे ज्ञानी बनकर, उस ज्ञान का उपदेश देनेवाले होते हैं। इस प्रकार ये अपने जीवन में 'कर्म, भक्ति व ज्ञान' तीनों ही बातों का समन्वय करने का प्रयत्न करते हैं। केवल यज्ञों से ये अपने को कृतकृत्य नहीं मान बैठते ।

    भावार्थ

    भावार्थ- 'देवश्रव' का जीवन 'यज्ञ, भक्ति व ज्ञान' का समन्वय करके चलता है।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे विद्वान लोकांनो ! अग्नीद्वारे उत्पन्न झालेले मेघ आकर्षणाने पृथ्वीवर पर्जन्य बनून येतात व काही वेळ दूरही जातात, तसेच अग्नीच्या यानाने गमन केल्यास कोणताही देश दूर नसते. याप्रकारे पुरुषार्थ करून संपूर्ण ऐश्वर्य उत्पन्न करा.

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    विषय

    सभाध्यक्ष राजाने काय करावे, याविषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (हरिवः) पुष्कळ घोड्यांचे स्वामी हे राजन्), जसे (समिधाने) प्रदीप्त (अग्नौ) अग्नीमधे (इमाः, सवनाः) हे प्रातःसवन आदी यज्ञकर्म (कृता) केले जातात, (तु) आणि यामुळे आकाशात (ग्रावाणः) गर्जना करणारे मेघ (युक्ताः) एकत्रित होतात, त्याप्रमाणे स्थिर राहणारे (वृष्णे) सुखकारक विद्या आदी पदार्थ आम्हांला (प्रजाजनांना) देण्यासाठी (हरिभ्याम्) घोड्यावर स्वार होऊन अथवा धारण आकर्षण, वेग आदी गुणांनी युक्त अशा जल आणि अग्नीद्वारे संचालित यानंतर स्वार होऊन (आ, प्र, याहि) इथे त्वरित या (ते) आपणांसाठी (परमा) अति दुरस्थ (रजांसि) स्थान (चित्) देखील (दूरे) (न) दूर नाही. (आपण यानादीद्वारा सर्वत्र सहज व त्वरित जाऊ शकता) ॥19॥

    भावार्थ

    भाावर्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. हे विद्वज्जन, ज्याप्रमाणे अग्नीद्वारे उत्पन्न पावसाचे ढग कधी पृथ्वीच्या आकर्षणामुळे जवळ येतात, तर कधी दूर जातात, त्याप्रमाणे अग्नीचे संचालित यानांनी निर्मिती करून पुष्कळ ऐश्‍वर्य ऐश्यर्व उत्पन्न करावे. ॥19॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O king, just as in the kindled fire these morning yajnas are performed, whereby the clouds come together, so come thou hither in conveyances moved by water and fire for acquiring permanent happiness. In this way even the distant places are not far for thee.

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    Meaning

    Indra, lord of power and majesty, ruler of the world, even the farthest regions are not too far for you. Lord of the fastest carriers, come post-haste by the steeds at your command. These offerings of yajna have been made for the constant lord of showers. The clouds are full and ready. The fire is lit and blazing.

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    Translation

    O Lord of sun-rays, the remotest regions are not remote for you; please do come speedily with your radiance. O steady showerer of benefits, these offerings are for your presentation. While inner fire is being kindled, we are pouring forth the expressions of devotion, as juice from herbs flows out when pressed between stones. (1)

    Notes

    Rajāmsi, regions (स्थानानि) | Paramā परमाणि, दूरस्थानि, remote or distant (places). Harivaḥ, Lord of sun-rays; lord of horses. Also, radiant one. Haribhayām, with your two horses. Grāvāṇaḥ, pressing stones. Vrsne, to the showerer of ben efits. Imā savanā kṛtā, इमानि सवनानि कृतानि, those offerings are prepared (for presenting to you). Samidhane agnau, in the fire that is being kindled.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনঃ সভাধ্যক্ষঃ কিং কুর্য়্যাদিত্যাহ ॥
    পুনঃ সভাধ্যক্ষ রাজা কী করিবে, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (হরিবঃ) প্রশস্ত অশ্বসম্পন্ন রাজন্ ! যেমন (সমিধানে) প্রদীপ্ত কৃত (অগ্নৌ) অগ্নিতে (ইমাঃ সবনা) এই সব প্রাতঃ সবনাদি যজ্ঞকর্ম (কৃতা) করা হয় (তু) এই হেতু দ্বারা (গ্রাবাণঃ) গর্জনকারী মেঘ (য়ুক্তাঃ) একত্রিত হইয়া আইসে তদ্রূপ (স্থিরায়) দৃঢ় (বৃষ্ণে) সুখদায়ী বিদ্যাদি পদার্থের জন্য (হরিভ্যাম্) ধারণ ও আকর্ষণের বেগরূপ গুণ দ্বারা যুক্ত অশ্বগুলি বা জল ও অগ্নি দ্বারা (আ, প্র, য়াহি) উত্তম প্রকার আসুন । এই প্রকার করিলে (পরম) দূরস্থ (চিৎ)(রজাংসি) স্থান (তে) আপনার (দূরে) দূরে (ন) থাকে না ॥ ১ঌ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । হে বিদ্বান্গণ ! যেমন অগ্নি দ্বারা উৎপন্ন কৃত বর্ষার মেঘ পৃথিবীর সমীপ হয়, আকর্ষণের ফলে দূরেও গমন করে, তদ্রূপ অগ্নিযান দ্বারা গমন করিলে কোন দেশ দূর হয় না, এই প্রকার পুরুষার্থ করিয়া সম্পূর্ণ ঐশ্বর্য্যকে উৎপন্ন কর ॥ ১ঌ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ন তে॑ দূ॒রে প॑র॒মা চি॒দ্ রজা॒ᳬंস্যা তু প্র য়া॑হি হরিবো॒ হরি॑ভ্যাম্ ।
    স্থি॒রায়॒ বৃষ্ণে॒ সব॑না কৃ॒তেমা য়ু॒ক্তা গ্রাবা॑ণঃ সমিধা॒নেऽঅ॒গ্নৌ ॥ ১ঌ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ন ত ইত্যস্য দেবশ্রবা দেববাতশ্চ ভারতাবৃষী । ইন্দ্রো দেবতা ।
    নিচৃৎত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ । ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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