Loading...
यजुर्वेद अध्याय - 34

मन्त्र चुनें

  • यजुर्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • यजुर्वेद - अध्याय 34/ मन्त्र 48
    ऋषिः - अगस्त्य ऋषिः देवता - मरुतो देवताः छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः
    107

    ए॒ष व॒ स्तोमो॑ मरुतऽइ॒यं गीर्मा॑न्दा॒र्यस्य॑ मा॒न्यस्य॑ का॒रोः।एषा या॑सीष्ट त॒न्वे व॒यां वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥४८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ए॒षः। वः॒। स्तोमः॑। म॒रु॒तः॒। इ॒यम्। गीः। मा॒न्दा॒र्यस्य॑। मा॒न्यस्य॑। का॒रोः ॥ आ। इ॒षा। या॒सी॒ष्ट॒। त॒न्वे᳖। व॒याम्। वि॒द्याम॑। इ॒षम्। वृ॒जन॑म्। जी॒रदा॑नु॒मिति॑ जी॒रऽदा॑नुम् ॥४८ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    एष व स्तोमो मरुतऽइयङ्गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः । एषा यासीष्ट तन्वे वयाँविद्यामेषँवृजनठञ्जीरदानुम् ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    एषः। वः। स्तोमः। मरुतः। इयम्। गीः। मान्दार्यस्य। मान्यस्य। कारोः॥ आ। इषा। यासीष्ट। तन्वे। वयाम्। विद्याम। इषम्। वृजनम्। जीरदानुमिति जीरऽदानुम्॥४८॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 34; मन्त्र » 48
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्मनुष्याः किं कुर्युरित्याह॥

    अन्वयः

    हे मरुतो मनुष्याः! मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोरेष स्तोम इयं च गीर्वोऽस्तु, यूयमिषा वयां तन्वे आ यासीष्ट, जीरदानुमिषं वृजनं च विद्याम॥४८॥

    पदार्थः

    (एषः) (वः) युष्मभ्यम् (स्तोमः) प्रशंसा (मरुतः) मरणधर्माणो मनुष्याः (इयम्) (गीः) सुशिक्षिता वाक् (मान्दार्यस्य) प्रशस्तकर्मसेवकस्योदारचित्तस्य (मान्यस्य) मन्तुं सत्कर्त्तुं योग्यस्य (कारोः) कारुकस्य शिल्पिनः (आ) (इषा) इच्छयाऽन्नेन वा निमित्तेन (यासीष्ट) प्राप्नुयात् (तन्वे) शरीरादिरक्षणार्थम् (वयाम्) वयसामवस्थावतां प्राणिनाम्। अत्राऽऽमि टिलोपश्छान्दसः। (विद्याम) लभेमहि (इषम्) विज्ञानमन्नं वा (वृजनम्) वर्जन्ति दुःखानि येन तद्बलम् (जीरदानुम्) जीवयतीति जीरदानुस्तम्॥४८॥

    भावार्थः

    मनुष्यैस्सदैव प्रशंसनीयानि कर्माणि सेवित्वा शिल्पविद्याविदः सत्कृत्य जीवनं बलमैश्वर्यं च प्राप्तव्यम्॥४८॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर मनुष्य लोग क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे (मरुतः) मरण धर्मवाले मनुष्यो! (मान्दार्यस्य) प्रशस्तकर्मों के सेवक उदार चित्तवाले (मान्यस्य) सत्कार के योग्य (कारोः) पुरुषार्थी कारीगर का (एषः) यह (स्तोमः) प्रशंसा और (इयम्) यह (गीः) वाणी (वः) तुम्हारे लिये उपयोगी होवे, तुम लोग (इषा) इच्छा वा अन्न के निमित्त से (वयाम्) अवस्थावाले प्राणियों के (तन्वे) शरीरादि की रक्षा के लिये (आ, यासीष्ट) अच्छे प्रकार प्राप्त हुआ करो और हम लोग (जीरदानुम्) जीवन के हेतु (इषम्) विज्ञान वा अन्न तथा (वृजनम्) दुःखों के वर्जनवाले बल को (विद्याम) प्राप्त हों॥४८॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि सदैव प्रशंसनीय कर्मों का सेवन और शिल्पविद्या के विद्वानों का सत्कार करके जीवन, बल और ऐश्वर्य को प्राप्त होवें॥४८॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    विद्वानों के कर्तव्य ।

    भावार्थ

    हे ( मरुतः ) विद्वान् वीर पुरुषो ! एवं प्रजापुरुषो ! (मान्यस्य) * मान करने योग्य एवं मनन करने हारे शत्रुओं का स्तम्भन करने वाले और (मांदार्यस्य) मुझे यह वीर सेनानायक काटेगा इस प्रकार का शत्रुगण में भय उत्पन्न करने हारे, सबको हर्ष देने हारे (कारो :) क्रिया कुशल सेनापति का (वः) तुम्हारे ही हित के लिये (एषः स्तोमः) यह शस्त्रास्त्र समूह या नियम या अधिकार व्यवस्था या सैनिक संघ है और ( इथं गीः) यह सबकी वाणी अर्थात् आज्ञा है । उसको आप लोग ( वयाम्) दीर्घजीवन वाले प्राणियों के (तन्वे) शरीरों की रक्षा के लिये (इषा) इच्छापूर्वक (आ अयासिष्ट) प्राप्त होवो ! हम लोग ( इषम् ) अन्न और सर्वप्रेरक (जीरदानुम् ) दीर्घ जीवन देने वाले ( वृजनम् ) दु:खों के वारक बल को ( विद्याम) प्राप्त करें ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अगस्त्यः । मरुतः । पंक्तिः । पंचमः ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    पापों से दूर

    पदार्थ

    १. पिछले मन्त्र में प्राणसाधना का वर्णन है। प्राणों को वैदिक साहित्य में 'मरुतः' भी कहते हैं। इनकी साधना करनेवाले भी 'मरुतः' कहलाते हैं। ये प्राणसाधक 'मितराविण: 'कम बोलनेवाले होते हैं। यह प्राणसाधना ही वस्तुतः प्रभु-स्तवन है। हे (मरुतः) = प्राणसाधना करनेवाले मनुष्यो ! (एषः वः स्तोमः) = यही तुम्हारा स्तुतिसमूह है। प्राणसाधना से हम दोषों का दहन करते हैं, इससे उत्तम प्रभु का स्तवन और क्या हो सकता है? २.(इयं गी:) = यह वेदवाणी (मान्दार्यस्य) [मन्दते: ईयतेश्च] = सदा प्रसन्न रहनेवाले गतिशील पुरुष की है। यह वाणी (मान्यस्य) = बड़ों का आदर करनेवाले देवपूजक [ respectful] की है, अर्थात् वेदवाणी के अध्ययन का मानव जीवन पर यह प्रभाव पड़ता है कि वह [क] सदा प्रसन्न, [ख] गतिशील, [ग] बड़ों का आदर करनेवाला तथा [घ] क्रियाओं को सुन्दरता से करनेवाला होता है। यदि उसका जीवन ऐसा नहीं बना तो यही समझना कि उसने वस्तुतः वेदवाणी का अध्ययन नहीं किया । ३. (एषा) = यह वेदवाणी (तन्वे) = [शरीरवृद्धयै] शरीर की सब शक्तियों के विस्तार के लिए यासीष्ट तुम्हें प्राप्त हो। वेदवाणी हमारे जीवन का अङ्ग बनती है तो हमारी शक्तियों का सब प्रकार से वर्धन होता है। ४. (वयाम्) [वयम् ] = कर्मतन्तु का विस्तार करनेवाले हम [वेञ् तन्तुसन्ताने] (इषम्) = प्रेरणा को (वृजनम्) = पापवर्जन को और परिणामतः (जीरदानुम्) = जीवनौषध को (विद्याम) = प्राप्त हों। वेदवाणी के अन्दर निहित प्रभु-प्रेरणा को आलसी व्यक्ति प्राप्त नहीं करता। वह प्रेरणा क्रियाशील को ही प्राप्त होती है, उस प्रेरणा से हम पापों को दूर फेंकते हैं और अपने जीवन को सर्वथा नीरोग बना पाते हैं। शरीर में रोग नहीं, मन में पाप नहीं, बुद्धि में कुण्ठा नहीं। इस प्रकार (अग) = [अग] आगे न बढ़ने देनेवाले [पातक] गिरावट के कारणभूत सब पापों का [स्त्या] संहार -करनेवाला यह 'अगस्त्य' बनता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्राणसाधना ही प्रभु-स्तवन है। वेदाध्येता सदा प्रसन्न, क्रियाशील, देवपूजक व दक्ष बनता है। वेदवाणी हमारी शक्तियों का विस्तार करती है। हम वेदवाणी की प्रेरणा को प्राप्त करके पापों से ऊपर उठें और जीवन को सुन्दर बनाएँ ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (2)

    भावार्थ

    माणसांनी सदैव प्रशंसनीय कर्म करावे व हस्त कौशल्य (शिल्पविद्या) जाणणाऱ्या विद्वानांचा सत्कार करून जीवन, बल व ऐश्वर्य प्राप्त करावे.

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    मनुष्यांनी काय केले पाहिजे, याविषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे (मरुतः) मरणधर्मा मनुष्यानो, (मान्दार्यस्य) प्रशंसनीय कर्म करणार्‍या आणि उदारचेता (मान्यस्य) आणि सत्कार करण्यास जे पात्र आहेत, अशा (कारोः) परिश्रमी कारागीरांची आम्ही (सज्जनांनी केलेली) (एषः) ही (स्तोमः) प्रशंसा आणि (इयम्) ही (गीः) प्रिय वाणी (वः) तुम्हा सर्व सामान्यजनांसाठी उपयोगी व लाभकारिणी व्हावी, (अशी आमची कामना आहे) (समाजातील श्रेष्ठ लोकांनी शिल्पी, वैज्ञानिक, कलाकार आदीची प्रशंसा करून त्याना प्रोत्साहन दिले पाहिजे) तुम्ही सामान्यजन (इषा) इच्छापूर्तीसाठी वा अन्नप्राप्तीसाठी (वयाम्) तरूण व शक्तिवान लोकांच्या (तन्वे) शरीराच्या रक्षणासाठी (आ, यासीष्ट) आनंदित मनाने तयार रहात जा. आणि आम्ही (श्रेष्ठ विद्वज्जन (जीरदानुम्) उत्तम जीवन जगण्यासाठी (इषम्) उपयोगी ज्ञान आणि उत्तम भोजन प्राप्त करण्याचे यत्न करू तसेच (वृजनम्) दुःख निवारण करणारी शक्ती (विद्याम) तुमच्यासाठी आणि आमच्यासाठी प्राप्त करू. ॥48॥

    भावार्थ

    भावार्थ - मनुष्याचे कर्तव्य आहे की त्यांनी नेहमी प्रशंसनीय कर्में करावीत आणि शिल्पविद्या (तंत्रशास्त्र, विज्ञान, अभियांत्रिकी ज्ञान) जाणणार्‍या लोकांचा नेहमी सत्कार करावा. व त्यामागे त्यांच्यासाठी आणि स्वतःसाठी दीर्घायू, शक्ती आणि ऐश्‍वर्य प्राप्त करावे. ॥48॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O mortals, may this praise and speech of the magnanimous, laudable and energetic artisan be conducive to your benefit. Protect well with food the body of the aged. For long life may we acquire strength, knowledge and food.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Meaning

    Maruts, dynamic citizens of the land, this valuable work of the venerable artist of eminence and this treatise is for you. Come with food and energy for the growth and protection of the health of the people of all ages. And we shall find the food, energy and knowledge for a general tonic and panacea for all disease.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O vital senses, this praise is for you; this sacred hymn sung by the venerable poet is for you. May you confer delight on the singer; may this praise reach you, for the good of your persons; may we thence obtain food, strength and long life. (1)

    Notes

    Marutaḥ, vital breaths. Also, brave soldiers. Tanve vayām, for the benefit of bodies. Vidyām, may we obtain. Jiradānum, bestowing long life. Kāruḥ, poet; also, sacrificer.

    इस भाष्य को एडिट करें

    बंगाली (1)

    विषय

    পুনর্মনুষ্যাঃ কিং কুর্য়ুরিত্যাহ ॥
    পুনঃ মনুষ্যগণ কী করিবে, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (মরুতঃ) মরণ ধর্মযুক্ত মনুষ্যগণ ! (মান্দার্য়স্য) প্রশস্তকর্মের সেবক উদার চিত্তসম্পন্ন (মান্যস্য) সৎকারের যোগ্য (কারোঃ) পুরুষার্থী শিল্পীর (এষঃ) এই (স্তোমঃ) প্রশংসা এবং (ইয়ম্) এই (গীঃ) বাণী (বঃ) তোমাদের জন্য উপযোগী হইবে, তোমরা (ইষা) ইচ্ছা বা অন্নের নিমিত্ত দ্বারা (বয়াম্) অবস্থাযুক্ত প্রাণিদের (তন্বে) শরীরাদির রক্ষার জন্য (আ, য়াসীষ্ট) উত্তম প্রকার প্রাপ্ত হও এবং আমরা (জীরদানুম্) জীবনের হেতু (ইষম্) বিজ্ঞান বা অন্ন তথা (বৃজনম্) দুঃখের বর্জনযুক্ত বলকে (বিদ্যাম) প্রাপ্ত হই ॥ ৪৮ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- মনুষ্যদিগের উচিত যে, সর্বদা প্রশংসনীয় কর্মের সেবন এবং শিল্পবিদ্যার বিদ্বান্দিগের সৎকার করিয়া জীবন, বল এবং ঐশ্বর্য্যকে প্রাপ্ত হইবে ॥ ৪৮ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    এ॒ষ ব॒ স্তোমো॑ মরুতऽই॒য়ং গীর্মা॑ন্দা॒র্য়স্য॑ মা॒ন্যস্য॑ কা॒রোঃ ।
    এষা য়া॑সীষ্ট ত॒ন্বে᳖ ব॒য়াং বি॒দ্যামে॒ষং বৃ॒জনং॑ জী॒রদা॑নুম্ ॥ ৪৮ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    এষ ব ইত্যস্যাগস্ত্য ঋষিঃ । মরুতো দেবতাঃ । পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top