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यजुर्वेद अध्याय - 34

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  • यजुर्वेद - अध्याय 34/ मन्त्र 32
    ऋषिः - कुत्स ऋषिः देवता - रात्रिर्देवता छन्दः - पथ्या बृहती स्वरः - मध्यमः
    178

    आ रा॑त्रि॒ पार्थि॑व॒ꣳ रजः॑ पि॒तुर॑प्रायि॒ धाम॑भिः।दि॒वः सदा॑सि बृह॒ती वि ति॑ष्ठस॒ऽआ त्वे॒षं व॑र्त्तते॒ तमः॑॥३२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ। रा॒त्रि॒। पार्थि॑वम्। रजः॑। पि॒तुः। अ॒प्रा॒यि॒। धाम॑भि॒रिति॒ धाम॑ऽभिः ॥ दि॒वः। सदा॑सि। बृ॒ह॒ती। वि। ति॒ष्ठ॒से॒। आ। त्वे॒षम्। व॒र्त्त॒ते॒। तमः॑ ॥३२ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ रात्रि पर्थिवँ रजः पितुरप्रायि धामभिः । दिवः सदाँसि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषँवर्तते तमः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    आ। रात्रि। पार्थिवम्। रजः। पितुः। अप्रायि। धामभिरिति धामऽभिः॥ दिवः। सदासि। बृहती। वि। तिष्ठसे। आ। त्वेषम्। वर्त्तते। तमः॥३२॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 34; मन्त्र » 32
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ रात्रिवर्णनमाह॥

    अन्वयः

    हे मनुष्याः! या बृहती रात्रि दिवः सदांसि वितिष्ठसे, यया पितुर्धामभिः पार्थिवं रज आ अप्रायि, यस्याश्च त्वेषं तम आ वर्त्तते, तां युक्त्या सेवध्वम्॥३२॥

    पदार्थः

    (आ) समन्तात् (रात्रि) रात्रिः। अत्र लिङ्गव्यत्ययः। (पार्थिवम्) पृथिव्याः सम्बन्धि (रजः) लोकः (पितुः) मध्यलोकस्य (अप्रायि) पूर्य्यन्ते (धामभिः) सर्वैः स्थानैः (दिवः) प्रकाशस्य (सदांसि) सीदन्ति येषु तान्यधिकरणानि (बृहती) महती (वि) (तिष्ठसे) तिष्ठते, आक्रमते, व्याप्नोति (आ) (त्वेषम्) स्वकान्त्या प्रकृष्टम् (वर्त्तते) (तमः) अन्धकारः॥३२॥

    भावार्थः

    हे मनुष्याः! या पृथिव्यादेश्छाया रात्रौ प्रकाशं निरोधयति, सर्वमावृणोति तां यथावत् सेवन्ताम्॥३२॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब रात्रि का वर्णन अगले मन्त्र में करते हैं॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! जो (बृहती) बड़ी (रात्रि) रात (दिवः) प्रकाश के (सदांसि) स्थानों को (वि, तिष्ठसे) व्याप्त होती है, जिस रात्रि ने (पितुः) अपने तथा सूर्य के मध्यस्थ लोक के (धामभिः)सब स्थानों के साथ (पार्थिवम्) पृथिवी सम्बन्धी (रजः) लोक को (आ, अप्रायि) अच्छे प्रकार पूर्ण किया है, जिसका (त्वेषम्) अपनी कान्ति से बढ़ा हुआ (तमः) अन्धकार (आ) (वर्त्तते) आता-जाता है, उसका युक्ति के साथ सेवन करो॥३२॥

    भावार्थ

    हे मनुष्यो! जो पृथिव्यादि की छाया रात्रि में प्रकाश को रोकती अर्थात् सबका आवरण करती है, उसका आप लोग यथावत् सेवन करें॥३२॥

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    विषय

    रात्रि, उषा, राजशक्ति और स्त्री ।

    भावार्थ

    हे (रात्रि ) रात्रि के समान समस्त प्रजाओं को सुख देने वाली ! सबको दान एवं वेतनादि देने वाली राजशक्ते ! ( पार्थिवम् ) पृथिवी का (रजः) समस्त लोक ( पितुः) पालन करने वाले वायु और सूर्य के समान तेजस्वी बलवान् पुरुष के (धामभिः) धारण सामर्थ्यो और तेजों, पराक्रमों से (अप्रायि) पूर्ण रहे और तू (बृहती) बड़ी शक्ति वाली होकर (दिवः सदांसि ) उप:काल जिस प्रकार आकाश में फैलता है उसी प्रकार राजसभा के (सदांसि) नाना अधिकार पदों पर (वितिष्ठसे) विशेष रूप से स्थिर रह और (तमः) अन्धकार जैसे सर्वत्र फैल कर आंखों को निर्बल कर देता है और ( त्वेषम् ) प्रकाश जैसे सर्वत्र फैल कर प्राणियों को सामर्थ्यवान् करता है उसी प्रकार हे राजशक्ते ! तेरा ( स्वेपं तमः ) अति तेजस्वी रूप मित्रगण को अधिक सामर्थ्यवान् और शत्रुओं को निर्बल करने वाला बल (आवर्त्तते) सर्वत्र फैले । यहां राज्य प्रबन्ध करने वाली शक्ति 'रात्रि' शब्द से कही गयी है ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कशिपा नाम भरद्वाजकन्या ऋषिका । रात्रिर्देवता । पथ्या बृहती । मध्यमः ॥

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    विषय

    रात्रि का दीप्त-तम [अन्धकार]

    पदार्थ

    सूर्य के प्रकाश के बाद रात्रि आती है, रात्रि की समाप्ति पर उषाकाल आता है। ठीक इसी प्रकार सूर्यदेव के ३१वें मन्त्र के पश्चात् यहाँ रात्रि देवता का ३२ वाँ मन्त्र है और इसके पश्चात् उषा का ३३वाँ मन्त्र आएगा और ३४ से ४० तक प्रातःकाल की प्रार्थना के मन्त्र चलेंगे। प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि (आरात्रि) = रात्रि तक, रात्रि के आने तक (पार्थिवं रजः) = यह पार्थिवलोक (पितुः) = उस पालक सूर्य के (धमाभि:) = तेजों से अप्रायि परिपूर्ण किया जाता है। [एषा वै पिता य एष सूर्यस्तपति । - शत० १४ । १।४।१५] । दिनभर सूर्य अपनी हिरण्यय किरणों से तेजस्विता का प्रसारण करता है। सूर्य प्रजाओं का प्राण है । सारा पार्थिवलोक- क्या वनस्पतियाँ और क्या प्राणी सभी सूर्यकिरणों के सम्पर्क में जीवित हो उठते हैं। धीरे-धीरे पृथिवी अपने अक्ष पर घूमती हुई सूर्य की ओर पीठ - सी कर लेती है और उस समय हमारे (दिवः) = आकाश के सदांसि स्थानों में बृहती-बढ़ती हुई यह (रात्रि) = रात (वितिष्ठसे) = विशेषरूप से स्थित होती है। रात्रि का राज्य चारों ओर फैल जाता है और उस समय (त्वेषम् तमः) = यह चमकता हुआ रात्रि का अन्धकार आवर्तते सर्वत्र वर्त्तमान होता है। हम रात्रि के अन्धकार से घिर से जाते हैं। हमारा क्षितिज अत्यन्त संक्षिप्त हो जाता है । इन्द्रियों का बाह्य प्रसार रुक जाता है। इतना ही नहीं इन्द्रियाँ बन्द-सी होकर अन्तर्मुख हो जाती हैं। उस सयम कभी-कभी स्वप्न में प्रभु दर्शन हो जाता है, इसीलिए योगदर्शन में ('स्वप्नज्ञानालम्बनं वा') = स्वप्न में दृष्ट प्रभुज्ञान को न भूलने का प्रयत्न करने के लिए कहा है । सुषुप्ति में तो 'समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता' इस सांख्यसूत्र के अनुसार हम कुछ ब्रह्मरूप में हो जाते हैं। एवं, यह रात्रि का अन्धकार भी हमारे लिए (त्वेषम्) = दीप्तिवाला हो जाता है। दिन के 'प्रकाश' में हमने सांसारिक वस्तुएँ देखी, तो रात्रि के उस अन्धकार में हमें प्रभु - दर्शन हुआ, अतः यह अन्धकार ('त्वेषम्') = दीप्तिवाला तो हुआ ही। उस ब्रह्मरूपता को प्राप्त करनेवाला यह ऋषि 'कुत्स' है, जिसने सब बुराइयों को समाप्त कर दिया है [कुथ हिंसायाम्] ।

    भावार्थ

    भावार्थ - दिनभर सूर्य के प्रकाश से तेजस्विता को धारण करके खूब क्रियाशील रहकर हम रात में सुषुप्ति का अनुभव करें और ब्रह्म के प्रकाश को देख पाएँ।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    हे माणसांनो ! जी रात्र पृथ्वीवरील प्रकाश नाहीसा करते. अर्थात् रात्रीचे आच्छादन सर्वत्र असते तिचा योग्य रीतीने स्वीकार करा.

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    विषय

    पुढील मंत्रात रात्रीचे वर्णन केले आहे. -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यानो, जी (बृहि) मोठी (रात्रि) रात्र (दिवः) प्रकाशाच्या (सदांसि) स्थानांना (पृथ्वीतल व आकाश, यांना (वि, तिष्ठसे) व्याप्त करते (दिवस संपल्यावर रात्र या स्थानांवर सत्ता मिळविते), जी रात्र (पितुः) आपल्या पित्याच्या, सूर्याच्या मध्यस्थ ग्रह-नक्षत्रादीच्या लोकांना (धामभिः) सर्व स्थानांसह (पर्थिवम्) पृथ्वीविषयक (रजः) लोकांनादेखील (आ, अप्रायि) पूर्णतः व्यापून आहे आणि ज्या रात्रीचा (त्वेषम्) (तमः) अधिक व घोर अंधार (आ, वर्त्तते) सर्वत्र येतो नि जातो, हे मनुष्यानो, तुम्ही त्या रात्रीचाही यथोचित लाभ घ्या. ॥32॥

    भावार्थ

    भावार्थ - हे मनुष्यानो, पृथ्वीची जी छाया रात्री सूर्याच्या प्रकाशाला शेकते (पृथ्वाच्या अर्ध्या भागावर रात्र होते) आणि जी छाया सर्व वातावरणाला आवृत्त करते, त्या रात्रीचे तुम्ही यथोचित सेवन करा. ॥32॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O men, use properly, the great Night, which covers the places of light, which hath filled the planet Earth and Suns mid regions, whose terrific darkness comes and goes.

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    Meaning

    The great night comes and covers the regions of the earth alongwith the regions of the skies. Away from the regions of the sun it stays and eclipses the areas of light, and the darkness remains until the light comes again.

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    Translation

    O night, you have filled the terrestrial realm, alongwith the mid-space. Overspreading you have firmly occupied the realms of heaven also. It is stark darkness all around now. (1)

    Notes

    Pārthivam rajaḥ, पृथ्वी लोकं, this region of earth. रज: शब्दो लोकवचन:, rajah means regions; realm. Pituḥ, that of the father, i. e. after | Divaḥ sadamsi, द्यु लोकस्य स्थानानि, the heaven. Aprayi, समंतात् पूर्यते , has been filled all over. Tveşam tamaḥ, terrific darkness.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথ রাত্রিবর্ণনমাহ ॥
    এখন রাত্রির বর্ণনা পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইতেছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যে (বৃহতী) বৃহতী (রাত্রি) রাত্রি (দিবঃ) প্রকাশের (সদাংসি) স্থানগুলিকে (বি, তিষ্ঠসে) ব্যাপ্ত হয়, যে রাত্রি (পিতুঃ) নিজের তথা সূর্য্যের মধ্যস্থ লোকের (ধামাভিঃ) সকল স্থান সহ (পার্থিবম্) পৃথিবী সম্পর্কীয় (রজঃ) লোককে (আ, অপ্রায়ি) উত্তম প্রকার পূর্ণ করিয়াছে, যাহার (ত্বেষম্) স্বীয় কান্তি দ্বারা বৃদ্ধি প্রাপ্ত (তমঃ) অন্ধকার (আ) (বর্ত্ততে) আসা-যাওয়া করে তাহার যুক্তি সহ সেবন কর ॥ ৩২ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যে পৃথিব্যাদির ছায়া রাত্রিতে প্রকাশকে প্রতিহত করে অর্থীৎ সকলের আবরণ করে, তাহার আপনারা যথাবৎ সেবন করুন ॥ ৩২ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    আ রা॑ত্রি॒ পার্থি॑ব॒ꣳ রজঃ॑ পি॒তুর॑প্রায়ি॒ ধাম॑ভিঃ ।
    দি॒বঃ সদা॑ᳬंসি বৃহ॒তী বি তি॑ষ্ঠস॒ऽআ ত্বে॒ষং ব॑র্ত্ততে॒ তমঃ॑ ॥ ৩২ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    আ রাত্রীত্যস্য কুৎস ঋষিঃ । রাত্রির্দেবতা । পথ্যা বৃহতী ছন্দঃ ।
    মধ্যমঃ স্বরঃ ॥

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