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यजुर्वेद अध्याय - 34

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  • यजुर्वेद - अध्याय 34/ मन्त्र 51
    ऋषिः - दक्ष ऋषिः देवता - हिरण्यन्तेजो देवता छन्दः - भुरिक्छक्वरी स्वरः - धैवतः
    258

    न तद्रक्षा॑सि॒ न पि॑शा॒चास्त॑रन्ति दे॒वाना॒मोजः॑ प्रथम॒जꣳ ह्ये॒तत्। यो बि॒भर्ति॑ दाक्षाय॒णꣳ हिर॑ण्य॒ꣳ स दे॒वेषु॑ कृणुते दी॒र्घमायुः॒ स म॑नु॒ष्येषु कृणुते दी॒र्घमायुः॑॥५१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न। तत्। रक्षा॑सि। न। पि॒शा॒चाः। त॒र॒न्तिः। दे॒वाना॑म्। ओजः॑। प्र॒थ॒म॒जमिति॑ प्रथम॒ऽजम्। हि। ए॒तत् ॥ यः। बि॒भर्त्ति॑। दा॒क्षा॒य॒णम्। हिर॑ण्यम्। सः। दे॒वेषु॑। कृ॒णु॒ते॒। दी॒र्घम्। आयुः॑। सः। म॒नु॒ष्ये᳖षु। कृ॒णु॒ते॒। दी॒र्घम्। आयुः॑ ॥५१ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    न तद्रक्षाँसि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोजः प्रथमजँ ह्येतत् । यो बिभर्ति दाक्षायणँ हिरण्यँ स देवेषु कृणुते दीर्घमायुः स मनुष्येषु कृणुते दीर्घमायुः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    न। तत्। रक्षासि। न। पिशाचाः। तरन्तिः। देवानाम्। ओजः। प्रथमजमिति प्रथमऽजम्। हि। एतत्॥ यः। बिभर्त्ति। दाक्षायणम्। हिरण्यम्। सः। देवेषु। कृणुते। दीर्घम्। आयुः। सः। मनुष्येषु। कृणुते। दीर्घम्। आयुः॥५१॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 34; मन्त्र » 51
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ ब्रह्मचर्यप्रशंसाविषयमाह॥

    अन्वयः

    हे मनुष्याः! यद्देवानां प्रथमजमोजोऽस्ति, न तद्रक्षांसि न पिशाचास्तरन्ति, यो ह्येतद् दाक्षायणं हिरण्यं बिभर्त्ति, स देवेषु दीर्घमायुः कृणुते, स मनुष्येषु दीर्घमायुः कृणुते॥५१॥

    पदार्थः

    (न) (तत्) अध्ययनं विद्याप्रापणम् (रक्षांसि) अन्यान् प्रपीड्य स्वात्मानमेव ये रक्षन्ति ते (न) (पिशाचाः) ये प्राणिनां पेशितं रुधिरादिकमाचामन्ति भक्षयन्ति ते हिंसका म्लेच्छाचारिणो दुष्टाः (तरन्ति) उल्लंघन्ते (देवानाम्) विदुषाम् (ओजः) बलपराक्रमः (प्रथमजम्) प्रथमे वयसि ब्रह्मचर्य्याश्रमे वा जातम् (हि) खलु (एतत्) (यः) (बिभर्त्ति) (दाक्षायणम्) दक्षेण चतुरेणाऽयनं प्रापणीयं तदेव स्वार्थेऽण् (हिरण्यम्) ज्योतिर्मयम् (सः) (देवेषु) विद्वत्सु (कृणुते) (दीर्घम्) लम्बमानम् (आयुः) जीवनम् (सः) (मनुष्येषु) मननशीलेषु (कृणुते) करोति (दीर्घम्) (आयुः)॥५१॥

    भावार्थः

    ये प्रथमे वयसि दीर्घेण धर्म्येण ब्रह्मचर्येण पूर्णां विद्यामधीयते, न तेषां केचिच्चोरा न दायभागिनो न तेषां भारो भवति। य एवं विद्वांसो धर्म्येण वर्त्तन्ते ते विद्वत्सु मनुष्येषु च दीर्घमायुर्लब्ध्वा सततमानन्दन्त्यन्यानानन्दयन्ति च॥५१॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब ब्रह्मचर्य की प्रशंसा का विषय अगले मन्त्र में कहते हैं॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! जो (देवानाम्) विद्वानों का (प्रथमजम्) प्रथम अवस्था वा ब्रह्मचर्य्य आश्रम में उत्पन्न हुआ (ओजः) बल पराक्रम है, (तत्) उसको (न, रक्षांसि) न अन्यों को पीड़ा विशेष देकर अपनी ही रक्षा करनेहारे और (न, पिशाचाः) न प्राणियों के रुधिरादि को खानेवाले हिंसक म्लेच्छाचारी दुष्टजन (तरन्ति) उल्लङ्घन करते। (यः) जो मनुष्य (हि, एतत्) इस (दाक्षायणम्) चतुर को प्राप्त होने योग्य (हिरण्यम्) तेजःस्वरूप ब्रह्मचर्य्य को (बिभर्त्ति) धारण वा पोषण करता है, (सः) वह (देवेषु) विद्वानों में (दीर्घम्, आयुः) अधिक अवस्था को (कृणुते) प्राप्त होता और (सः) वह (मनुष्येषु) मननशील जनों में (दीर्घम्, आयुः) बड़ी अवस्था को (कृणुते) प्राप्त करता है॥५१॥

    भावार्थ

    जो प्रथम अवस्था में बड़े धर्मयुक्त ब्रह्मचर्य्य से पूर्ण विद्या पढ़ते हैं, उनको न कोई चोर न दायभागी और न उनको भार होता है। जो विद्वान् इस प्रकार धर्मयुक्त कर्म के साथ वर्त्तते हैं, वे विद्वानों और मनुष्यों में बड़ी अवस्था को प्राप्त होके निरन्तर आनन्दित होते और दूसरों को आनन्दित करते हैं॥५१॥

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    विषय

    सुवर्ण और उत्तम सैन्य बल का वर्णन । पक्षान्तर में ब्रह्मचर्य का वर्णन ।

    भावार्थ

    (तत्) उस पूर्वोक्त तेज को ( न रक्षांसि ) न सत्कार्यों में विघ्न करने दूसरे को पीड़ा देने वाले दुष्ट पुरुष और (न पिशाचाः) न प्राणियों के मांस रुधिरादि खाने वाले अत्याचारी लोग (तरन्ति) लांघते हैं । (हि) क्योंकि ( एतत् ) वह ( प्रथमजम् ) सबसे प्रथम उत्पन्न हुआ सर्वश्रेष्ठ, (देवानाम् भोज) देव, विद्वान् विजिगीषु पुरुषों का परम बल, 'पराक्रम है । (यः) जो (दाक्षायणः) दक्ष, व्यवहारकुशल, बलवान् पुरुष से सञ्चालन योग्य, (हिरण्यम् ) प्रजाओं के हितकर और सुखकारी बल, ( बिभर्त्ति ) धारण करता है (सः) वह (देवेषु) देव, विद्वान् विजिगीषु पुरुषों के बीच (दीर्घम आयुः कृणुते) दीर्घ जीवन उत्पन्न करता है और (सः) वह ही (मनुष्येषु दीर्घम् आयुः कृणुते ) मनुष्यों के भी जीवन को चिरस्थायी कर देता है । जो राजा अपने सेनाबल को पुष्ट करता बल का पार दुष्ट, राक्षस और पिशाच भी नहीं पाते । वह अपने वीर पुरुषों और प्रजाजनों के जीवनों की रक्षा करता है । ( २ ) ब्रह्मचर्य पक्ष में- (देवानां हि एतत् प्रथमजं ओजः) विद्वान् पुरुषों की आयु के प्रथमः भाग में उत्पन्न ब्रह्मचर्यरूप वीर्य है जिसको राक्षस और पिशाच नहीं पार कर सकते । दक्ष, अर्थात् बुद्धिमान् पुरुषों से प्राप्त होने योग्य उसको जो धारण करता है वह विद्वानों और मनुष्यों में अपने जीवन को बहुत दीर्घ बना लेता है ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    दक्षः । हिरण्यं तेजः । भुरिक् शक्वरी । धैवतः ॥

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    विषय

    हिरण्य का धारण

    पदार्थ

    गतमन्त्र के 'हिरण्य' का ही परिचय इन शब्दों में देते हैं कि १. (तत्) = इस हिरण्य = वीर्य को न रक्षांसि न तो रक्षस् और (न पिशाचाः) = न ही पिशाच (तरन्ति) = तैर पाते हैं। 'रक्षस्' वे कृमि हैं जो अपने रमण के लिए हमारा क्षय करते हैं। ये कृमि नाना प्रकार के रोगों का कारण बनते हैं और 'पिशितम् अश्नन्ति' जो हमारे मांस को ही खा जाते हैं और हमें निर्बल [Emaciated] कर देते हैं- ये 'पिशाच' कहलाते हैं। शरीर में हिरण्य के होने पर ये रक्षस् व पिशाच हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाते। वीर्य शब्द का अर्थ ही 'विशेषरूप से कम्पित करके इन्हें दूर भगानेवाला' है, इसीलिए तो यह हिरण्य-हित व रमणीय है । २. (देवनाम् ओजः) = यह देवताओं का ओज है। देवों की वृद्धि का कारण है [ओज् to increase]। असुर इसे भोगों का साधन बना विनष्ट हो जाते हैं। देव इसकी रक्षा करते हैं। (एतत्) = यह (हि) = निश्चय से (प्रथमजम्) = प्रथामाश्रम में, ब्रह्मचर्याश्रम में होनेवाला देवताओं का तेज सचमुच (प्रथमजम्) = [प्रथ विस्थारे] अत्यन्त विस्तृत शक्तियोंवाले पुरुष को जन्म देनेवाला है । ३. (यः) = जो कोई भी इस (दाक्षायणम्) = [to grow ] वृद्धि के कारणभूत [to kill] रोगकृमियों के विध्वंसक (हिरण्यम्) = हितरमणीय वीर्य को बिभर्ति धारण करता है। (सः) = वह (देवषु) = देवों में (दीर्घं आयुः) = दीर्घ जीवन को कृणुते करता है, (सः) = वह मनुष्येषु मनुष्यों में (दीर्घं आयुः) = दीर्घ जीवन (कृणुते) = कर लेता है, अर्थात् इस वीर्य को धारण करनेवाला व्यक्ति देव- दिव्य गुणों का पुञ्ज बनता है और मनुष्य मननशील ज्ञानी बनता है। दिव्य व ज्ञानी बनकर यह दीर्घ जीवनवाला होता है, एवं इस दाक्षायण हिरण्य के तीन लाभ हैं - [क] शरीर में नीरोगता से दीर्घ जीवन, [ख] मन में दिव्यगुण, [ग] मस्तिष्क में अवबोध [मनु अवबोध ] । इसी कारण इसे दाक्षायाण सुनहला आभूषण a golden ornament कहा गया है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम दाक्षायण हिरण्य को धारण करके दीर्घजीवी, दिव्य व दीप्त ज्ञानवाले बनें।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    जे प्रथमावस्थेत धर्माने वागून ब्रह्मचर्य पालन करून पूर्ण विद्या प्राप्त करतात त्यांची विद्या व बल कुणी चोरून घेऊ शकत नाही. त्यांचा भागीदार बनू शकत नाही किंवा ते भारवहक बनू शकत नाहीत. जे विद्वान अशा प्रकारचे धर्मयुक्त कर्म करतात ते इतरांपेक्षा अधिक वर्षे जगतात. सतत आनंदी राहून इतरांनाही आनंदी करतात.

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    विषय

    या मंत्रात ब्रह्मचर्याची प्रशंसा केली आहे-

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, (देवानाम्) विद्वज्जनांना (प्रथमजम्) जीवनाच्या प्रथम अवस्थेत म्हणजे ब्रह्मचर्याश्रमात जे (ओजः) बळ वा पराक्रम प्रपात केलेला असतो, (तत्) त्याला (न, रक्षांसि) इतरांना पीडा (न, पिशाचाः) प्राण्यांचे रूधिर, मांस आदी खाणारे हिंसक, म्लेच्छ दुष्ट लोक असतात, ते (तरन्ति) उल्लंघित वा नष्ट करू शकत नाहींत (राक्षसी व पिशाच प्रवृत्तीचे दुर्जन ब्रह्मचर्याश्रमात अर्जित केलेल्या शक्तीचा पराभव कदापि करू शकत नाहीत. ब्रह्मचारी सदैव अविजित राहतो) (यः) जो कोणी माणूस (एतत्) या (दाक्षायणम्) कौशल्याने प्राप्त करण्यासारख्या (हिरण्यम्) तेजाःस्वरूप ब्रह्मचर्याला (बिभर्त्ति) धारण करतो, (सः) तो (देवेषु) विद्वानामदे (दीर्गम्, आयुः) अधिक आयुष्य (कृणुते) प्राप्त करतो (अन्यांपेक्षा तो अधिक आयुष्मान् होतो) तसेच (सः) तो ब्रह्मचर्य अर्जित केलेला मनुष्य (मनुष्येषु) अन्य मननशील लोकांमधे (दीर्घम्, आयुः) दीर्घ आयू (कृणुते) प्राप्त करतो. ॥51॥

    भावार्थ

    भावार्थ - जे लोक जीवनाच्या प्रथम अवस्थेत अत्यंत धार्मिक, ब्रह्मचारी राहून पूर्ण विद्या प्राप्त करतात, त्यांना कोणी चोर वा लूटारू लुबाडू शकत नाही. ते कोणावर भार नसतात (स्वावलंबी असतात) जे विद्वान अशाप्रकारे धर्ममय कर्म करतात, ते विद्वानांपेक्षा व इतर मनुष्यांपेक्षा दीर्घ आयू प्राप्त करतात. अशी माणसें स्वतः आनंदात राहतात आणि इतरांनाही आनंदित करतात. ॥51॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    The strength acquired by the learned in the Brahmcharya Ashrama, can be destroyed neither by demons nor by fiends. Whoever possesses the strength of celibacy, lives a long life among the sages, and also lives a long life among thoughtful persons.

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    Meaning

    That golden glow of celibate life the demons and ogres cannot violate, nor can they cross over and attain it. It is the splendour of the divines, first born of Mother Nature. One who commands this golden essence of the art of life and living lives a long age of activity among the divines, lives a long age of activity among humanity.

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    Translation

    The gold is, verily, the first offspring and the foremost gift of the bounties of Nature. No demons or evil spirited person can ignore it. One, who wears gold as an ornament, lives long among the enlightened ones; he lives long among men too. (1)

    Notes

    Ojah, तेज:, radiance; lustre. Dākṣāyaṇam, name of an ornament; wears gold as an or nament. Also, earned in a proper way.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথ ব্রহ্মচর্য়প্রশংসাবিষয়মাহ ॥
    এখন ব্রহ্মচর্য্যের প্রশংসার বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যাহা (দেবানাম্) বিদ্বান্দিগের (প্রথমজম্) প্রথম অবস্থা বা ব্রহ্মচর্য্য আশ্রমে উৎপন্ন (ওজঃ) বল পরাক্রম (তৎ) তাহাকে (ন, রক্ষাংসি) অন্যান্যদেরকে না পীড়া বিশেষ দিয়া নিজেরই রক্ষাকারী এবং (ন, পিশাচাঃ) না প্রাণিদিগের রুধিরাদি ভক্ষণকারী হিংসক ম্লেচ্ছাচারী দুষ্টগণ (তরন্তি) উল্লঙ্ঘন করে, (য়ঃ) যে মনুষ্য (হি, এতৎ) এই (দাক্ষায়ণম্) দক্ষতা প্রাপ্ত হওয়ার যোগ্য (হিরণ্যম্) তেজঃস্বরূপ ব্রহ্মচর্য্যকে (বিভর্ত্তি) ধারণ বা পোষণ করে (সঃ) সে (দেবেষু) বিদ্বান্দিগের মধ্যে (দীর্ঘম্, আয়ুঃ) দীর্ঘায়ুকে (কৃণুতে) প্রাপ্ত হয় এবং (সঃ) সে (মনুষ্যেষু) মননশীল ব্যক্তিদিগের মধ্যে (দীর্ঘম্, আয়ু) দীর্ঘায়ুকে (কৃণুতে) প্রাপ্ত করে ॥ ৫১ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- যাহারা প্রথম আয়ুতে বড় ধর্মযুক্ত ব্রহ্মচর্য্য দ্বারা পূর্ণ বিদ্যা পড়েন, তাহাদেরকে না কোন চোর, না দায়ভাগী এবং না তাহাদের ভার হয়, যে সব বিদ্বান্ এই প্রকার ধর্মযুক্ত কর্ম সহ আচরণ করে তাহারা বিদ্বান্গণ ও মনুষ্যগণের মধ্যে দীর্ঘ আয়ুকে প্রাপ্ত হইয়া নিরন্তর আনন্দিত হয় এবং অন্যকে আনন্দিত করে ॥ ৫১ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ন তদ্রক্ষা॑ᳬंসি॒ ন পি॑শা॒চাস্ত॑রন্তি দে॒বানা॒মোজঃ॑ প্রথম॒জꣳ হ্যে॒তৎ । য়ো বি॒ভর্তি॑ দাক্ষায়॒ণꣳ হির॑ণ্য॒ꣳ স দে॒বেষু॑ কৃণুতে দী॒র্ঘমায়ুঃ॒ স ম॑নু॒ষ্যে᳖ষু কৃণুতে দী॒র্ঘমায়ুঃ॑ ॥ ৫১ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ন তদিত্যস্য দক্ষ ঋষিঃ । হিরণ্যন্তেজো দেবতা । ভুরিক্ছক্বরী ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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