अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 6
ऋषिः - अथर्वा, क्षुद्रः
देवता - स्कन्धः, आत्मा
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - सर्वाधारवर्णन सूक्त
73
क्व प्रेप्स॑न्ती युव॒ती विरू॑पे अहोरा॒त्रे द्र॑वतः संविदा॒ने। यत्र॒ प्रेप्स॑न्तीरभि॒यन्त्यापः॑ स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः स्वि॑दे॒व सः ॥
स्वर सहित पद पाठक्व᳡ । प्रेप्स॑न्ती॒ इति॑ प्र॒ऽईप्सन्ती । यु॒व॒ती इति॑ । विरू॑पे॒ इति॒ विऽरू॑पे । अ॒हो॒रा॒त्रे इति॑ । द्र॒व॒त॒: । सं॒वि॒दा॒ने इति॑ स॒म्ऽवि॒दा॒ने । यत्र॑ । प्र॒ऽईप्स॑न्ती: । अ॒भि॒ऽयन्ति॑ । आप॑: । स्क॒म्भम् । तम् । ब्रू॒हि॒ । क॒त॒म: । स्वि॒त् । ए॒व । स: ॥७.६॥
स्वर रहित मन्त्र
क्व प्रेप्सन्ती युवती विरूपे अहोरात्रे द्रवतः संविदाने। यत्र प्रेप्सन्तीरभियन्त्यापः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः ॥
स्वर रहित पद पाठक्व । प्रेप्सन्ती इति प्रऽईप्सन्ती । युवती इति । विरूपे इति विऽरूपे । अहोरात्रे इति । द्रवत: । संविदाने इति सम्ऽविदाने । यत्र । प्रऽईप्सन्ती: । अभिऽयन्ति । आप: । स्कम्भम् । तम् । ब्रूहि । कतम: । स्वित् । एव । स: ॥७.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
ब्रह्म के स्वरूप के विचार का उपदेश।
पदार्थ
(क्व) कहाँ (प्रेप्सन्ती) पाने की इच्छा करती हुई (युवती) दो मिलनेवाली और अलग होजानेवाली शक्तियाँ, (विरूपे) विरुद्ध रूपवाले, (संविदाने) आपस में मिले हुए (अहोरात्रे) दिन और रात (द्रवतः) दौड़ते हैं ? (यत्र) जहाँ (प्रेप्सन्तीः) मिलने की इच्छा करती हुई (आपः) सब प्रजाएँ (अभियन्ति) चारों ओर से आती हैं, (सः) वह (कतमः स्वित्) कौन सा (एव) निश्चय करके है ? [उत्तर] उसको (स्कम्भम्) स्कम्भ [धारण करनेवाला परमात्मा] (ब्रूहि) तू कह ॥६॥
भावार्थ
यह दिन-रात और सब प्राणी परमेश्वर के ही नियमबद्ध रहते हैं ॥६॥
टिप्पणी
६−(क्व) (प्रेप्सन्ती) प्राप्तुमिच्छन्त्यौ (युवती) यु मिश्रणमिश्रणयोः-कनिन्, ति, ङीप्। मिश्रणामिश्रणशीले शक्ती यौवनवत्यौ स्त्रियौ यथा (विरूपे) विरुद्धस्वरूपे (अहोरात्रे) (द्रवतः) धावतः (संविदाने) संगच्छमाने (यत्र) (प्रेप्सन्तीः) प्राप्तुमिच्छन्त्यः (अभियन्ति) सर्वतो गच्छन्ति (आपः) आप्ताः प्रजाः-दयानन्दभाष्ये, यजु० ६।२७ सर्वे प्राणिनः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
अहोरात्रे-आप:
पदार्थ
१.(क्व प्रेप्सन्ती) = कहाँ-पहुँचने की अभिलाषा करती हुई ये दो (विरूपे) = विपरीत रूपवाली प्रकाश व अन्धकारमयी [एक श्वेता और दूसरी कृष्णा] (संविदाने) = परस्पर मन्त्रणा-सी करती हुई (अहोरात्रे युवती) = दिन व रात्रिरूप युवतियों (द्रवत:) = चली जा रही हैं? (यत्र) = जिसके आधार में (प्रेप्सन्ती:) = विविध वस्तुओं को प्राप्त करने की कामना करती हुई (आप:) = प्रजाएँ [आपो वै नरसूनवः] (अभियन्ति) = चारों और गति कर रही हैं, (तम्) = उस आधार को (स्कम्भम्) = स्कम्भ सर्वाधार प्रभु (ब्रूहि) = कहो। (सः एव) = वही (स्वित्) = निश्चय से (कतमः) = अत्यन्त आनन्दमय है।
भावार्थ
प्रभु के आधार में ही ये दिन व रात निरन्तर चले जा रहे हैं। उसी के आधार में सब प्रजाएँ, विविध पदार्थों को प्राप्त करने की कामना से गतिबाली हो रही हैं।
भाषार्थ
(युवती) युवा (विरूपे) भिन्न-भिन्न रूपों वाले (अहोरात्रे) दिन-रात (सं विदाने) ऐकमत्य को प्राप्त हुए अर्थात् परस्पर मिले हुए (क्व) कहां (प्रेप्सन्तीः) जाने की इच्छा वाले (द्रवतः) गति कर रहे हैं, दौड़ रहे हैं। (यत्र) जहां (प्रेप्सन्तीः) जाना चाहते हुए (आपः) जल (अभियन्ति) जा रहे हैं (स्कम्भम् तम् ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः) अर्थ देखो (मन्त्र ४)।
टिप्पणी
[दिन-रात सदा युवा हैं, सृष्टि के आरम्भ से गति कर रहे हैं, थकावट अनुभव नहीं करते, अतः सदा युवा हैं। इन में दिन तो शुक्ल है और रात्रि कृष्णवर्णा है, अतः ये विरूप हैं। आपः = नदियों, स्रोतों के जल, सामुद्रिक लहरों के जल, वाष्पीभूत और मेघीय तथा वर्षा के जल]।
मन्त्रार्थ
(क्व प्रेप्सन्ती-युवती विरूपे अहोरात्रे संविदाने द्रवतः) किसी देव के अन्दर लक्ष्यप्राप्ति की इच्छा करते हुये मिश्रण धर्म वाली दो कुमारियों के समान दोनों दिन और रात्रि सहभात्र को सेवन करते हुये चलते रहते हैं (यत्र-प्रेप्सन्ती:-आपः-अभियन्ति ) जिस ही देव के अन्दर लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा रखती हुई जलधारायें- नदियां पहुंचतीं हैं (स्कम्भं तं) पूर्ववत्॥६॥
टिप्पणी
इस सूक्त पर सायणभाष्य नहीं है, परन्तु इस पर टिप्पणी में कहा है कि स्कम्भ इति सनातनतमो देवो "ब्रह्मणो प्याद्यभूतः । अतो ज्येष्ठं ब्रह्म इति तस्य संज्ञा । विराडपि तस्मिन्नेव समाहितः” । अर्थात् स्कम्भ यह अत्यन्त सनातन देव है जो ब्रह्म से भी आदि हैं अतः ज्येष्ठ ब्रह्म यह उसका नाम है विराड् भी उसमें समाहित है । यह सायण का विचार है ॥
विशेष
ऋषिः—अथर्वा ( स्थिर-योगयुक्त ) देवनाः - स्कम्भः, आत्मा वा ( स्कम्भ-विश्व का खम्भा या स्कम्मरूप आत्मा-चेतन तत्त्व-परमात्मा )
विषय
ज्येष्ठ ब्रह्म या स्कम्भ का स्वरूप वर्णन।
भावार्थ
(विरूपे) विपरीत रूप वाले, काले और गोरे रंग के, तमः और प्रकाशस्वरूप (युवती) मानो दो नर-नारी के समान परस्पर मन्त्रणा करते हुए (अहोरात्रे) दिन और रात (क्व प्रेप्सन्ती) कहां पहुंचने की अभिलाषा करके (द्रक्तः) जारहे हैं ? (आपः) ये जलधाराएं, नदियें (यत्र) जहां भी (प्रेप्सन्तीः) पहुंचने की अभिलाषा करती हुई (अभि यन्ति) चली जा रही हैं हे विद्वन् ! (तं स्कम्भम्) जगत् के उस परम आश्रयभूत ‘स्कम्भ’=खम्भे का (ब्रूहि) उपदेश कर (कतमः स्विद एव सः) वह कौनसा सर्वोत्कृष्ट पदार्थ है ?
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा क्षुद्र ऋषिः। मन्त्रोक्तः स्कम्भ अध्यात्मं वा देवता। स्कम्भ सूक्तम्॥ १ विराट् जगती, २, ८ भुरिजौ, ७, १३ परोष्णिक्, ११, १५, २०, २२, ३७, ३९ उपरिष्टात् ज्योतिर्जगत्यः, १०, १४, १६, १८ उपरिष्टानुबृहत्यः, १७ त्र्यवसानाषटपदा जगती, २१ बृहतीगर्भा अनुष्टुप्, २३, ३०, ३७, ४० अनुष्टुभः, ३१ मध्येज्योतिर्जगती, ३२, ३४, ३६ उपरिष्टाद् विराड् बृहत्यः, ३३ परा विराड् अनुष्टुप्, ३५ चतुष्पदा जगती, ३८, ३-६, ९, १२, १९, ४०, ४२-४३ त्रिष्टुभः, ४१ आर्षी त्रिपाद् गायत्री, ४४ द्विपदा वा पञ्चपदां निवृत् पदपंक्तिः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Skambha Sukta
Meaning
Whither, seeking and striving for what, do the day and night, youthful maidens ever fresh, so different yet in perfect accord, hasten on? Whither, seeking and striving for what, do the whirlpools of waters and time flow incessantly? Speak to me of that Skambha, that centre-hold controller, which one is that? Say it is Skambha, only that of all, ultimate centre and the circumference.
Translation
Whither desiring to attain, the two young maidens of different appearance, known as day and night, run accordant with each other; whither to attain the water flow onward; tell me of that Skambha; which of so many indeed, is He ?
Translation
Whitherward destined to proceed go with speed these two different young day and night in their full concordance? Who out of the many other powers, tell me O learned! Is that Supporting Divine Power to whom yearning waters go?
Translation
Whitherward yearning speed the two Damsels, accordant Day and Night of different colour? Who out of many, tell me, O learned person, is the All pervading God, to whom the people take way with longing?
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६−(क्व) (प्रेप्सन्ती) प्राप्तुमिच्छन्त्यौ (युवती) यु मिश्रणमिश्रणयोः-कनिन्, ति, ङीप्। मिश्रणामिश्रणशीले शक्ती यौवनवत्यौ स्त्रियौ यथा (विरूपे) विरुद्धस्वरूपे (अहोरात्रे) (द्रवतः) धावतः (संविदाने) संगच्छमाने (यत्र) (प्रेप्सन्तीः) प्राप्तुमिच्छन्त्यः (अभियन्ति) सर्वतो गच्छन्ति (आपः) आप्ताः प्रजाः-दयानन्दभाष्ये, यजु० ६।२७ सर्वे प्राणिनः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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