अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 21
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम्
छन्दः - चतुरवसानाष्टपदाकृतिः
सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
54
नि॒म्रुच॑स्ति॒स्रो व्युषो॑ ह ति॒स्रस्त्रीणि॒ रजां॑सि॒ दिवो॑ अ॒ङ्ग ति॒स्रः। वि॒द्मा ते॑ अग्ने त्रे॒धा ज॒नित्रं॑ त्रे॒धा दे॒वानां॒ जनि॑मानि वि॒द्म। तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑। उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥
स्वर सहित पद पाठनि॒:ऽम्रुच॑: । ति॒स्र: । वि॒ऽउष॑: । ह॒ । ति॒स्र: । त्रीणि॑ । रजां॑सि । दिव॑: । अ॒ङ्ग । ति॒स्र: । वि॒द्म । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । त्रे॒धा । ज॒नित्र॑म् । त्रे॒धा । दे॒वाना॑म् । जनि॑मानि । वि॒द्म॒ । तस्य॑ । दे॒वस्य॑ ॥ क्रु॒ध्दस्य॑ । ए॒तत् । आग॑: । य: । ए॒वम् । वि॒द्वांस॑म् । ब्रा॒ह्म॒णम् । जि॒नाति॑ । उत् । वे॒प॒य॒ । रो॒हि॒त॒ । प्र । क्षि॒णी॒हि॒ । ब्र॒ह्म॒ऽज्यस्य॑ । प्रति॑ । मु॒ञ्च॒ । पाशा॑न् ॥३.२१॥
स्वर रहित मन्त्र
निम्रुचस्तिस्रो व्युषो ह तिस्रस्त्रीणि रजांसि दिवो अङ्ग तिस्रः। विद्मा ते अग्ने त्रेधा जनित्रं त्रेधा देवानां जनिमानि विद्म। तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति। उद्वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान् ॥
स्वर रहित पद पाठनि:ऽम्रुच: । तिस्र: । विऽउष: । ह । तिस्र: । त्रीणि । रजांसि । दिव: । अङ्ग । तिस्र: । विद्म । ते । अग्ने । त्रेधा । जनित्रम् । त्रेधा । देवानाम् । जनिमानि । विद्म । तस्य । देवस्य ॥ क्रुध्दस्य । एतत् । आग: । य: । एवम् । विद्वांसम् । ब्राह्मणम् । जिनाति । उत् । वेपय । रोहित । प्र । क्षिणीहि । ब्रह्मऽज्यस्य । प्रति । मुञ्च । पाशान् ॥३.२१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा और जीवात्मा का उपदेश।
पदार्थ
(निम्रुचः) नीच गतियाँ [मानसिक, वाचिक और कायिक भेद से] (तिस्रः) तीन और (व्युषः) उच्च गतियाँ (ह) भी [मानसिक, वाचिक और कायिक भेद से] (तिस्रः) तीन हैं, (रजांसि) लोक [भूत भविष्यत् और वर्तमान भेद से] (त्रीणि) तीन और (दिवः) व्यवहारक्रियाएँ (अङ्ग) भी [धर्म, अर्थ और काम-इन पुरुषार्थभेदों से] (तिस्रः) तीन हैं। (अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ! [कर्म, उपासना और ज्ञान द्वारा] (त्रेधा) तीन प्रकार से (ते) तेरे (जनित्रम्) प्रत्यक्षपन को (विद्म) हम जानते हैं, [सत्त्व, रज और तमोगुण के भेद से] (त्रेधा) तीन प्रकार पर (देवानाम्) गतिवाले लोकों के (जनिमानि) प्रादुर्भावों को (विद्म) हम जानते हैं। (तस्य) (क्रुद्धस्य) क्रुद्ध (देवस्य) प्रकाशमान [ईश्वर] के लिये.... [मन्त्र १] ॥२१॥
भावार्थ
मनुष्यों को योग्य है कि मानसिक, वाचिक और कायिक अवनति अर्थात् नीच गति को छोड़ कर मानसिक वाचिक और कायिक उन्नति करके भूत भविष्यत् और वर्तमान का विचार करें और पुरुषार्थपूर्वक परमात्मा के तत्त्वज्ञान से आनन्द पावें ॥२१॥
टिप्पणी
२१−(निम्रुचः) नि+म्रुचु गतौ-क्विप्। अवनतयः। अधोगतयः (तिस्रः) मानसिकवाचिककायिकभेदेन (व्युषः) उष दाहे वधे च-क्विप्। उन्नतयः (ह) एव (तिस्रः) मानसिकादिभेदेन (त्रीणि) भूतभविष्यद्वर्तमानभेदेन (रजांसि) लोकाः (दिवः) व्यवहारक्रियाः (अङ्ग) अङ्गेति क्षिप्रनाम-निरु० ५।१७। क्षिप्रम्। अवश्यम् (तिस्रः) धर्मार्थकामभेदेन (विद्म) सांहितिको दीर्घः। जानीमः (ते) तव (अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् (त्रेधा) त्रिप्रकारेण। कर्मोपासनाज्ञानद्वारा (जनित्रम्) प्रादुर्भावम् (त्रेधा) सत्त्वरजस्तमोगुणभेदेन (देवानाम्) गतिशीलानां लोकानाम् (जनिमानि) प्रादुर्भावान् (विद्म) जानीमः ॥
विषय
तीन
पदार्थ
१. (निम्रुच:) = निम्नगतियाँ [नि-मुच् गतौ] (तिस्त्र:) = तीन है-तीन बातें हमारी अधोगति का कारण बनती हैं, वे हैं-'काम, क्रोध और लोभ'(ह) = निश्चय से (व्युषः तिस्त्र:) = [वि उष दाहे] दोषों को दग्ध करनेवाली भी तीन बातें हैं, वे है-'ज्ञान, कर्म और उपासना'। (त्रीणि रजांसि) = तीन ही लोक है-पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक। शरीर में ये तीन लोक-'देह, हृदय व मस्तिष्क' हैं। 'काम' देह को विनष्ट कर देता है, 'क्रोध' हृदय को तथा 'लोभ' मस्तिष्क को। 'कर्म' शरीर को ठीक रखता है, "उपासना' हृदय को तथा 'ज्ञान' मस्तिष्क को। हे (अङ्ग) = प्रिय! (दिवः तिस्त्रः) = ज्ञान भी तीन हैं-प्रकृति का ज्ञान, जीव का ज्ञान व परमात्मा का ज्ञान । प्रकृति के ज्ञान से, प्रकृति का ठीक उपयोग होने पर रोग नहीं आते। जीव को समझने पर, जीव के साथ ठीक व्यवहार होने पर झगड़े नहीं होते। प्रभु की सर्वव्यापकता का ज्ञान होने पर पापवृत्ति हमें आक्रान्त नहीं करती। २. हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! हम (त्रेधा) = तीन प्रकार से (ते जनित्रं विद्म) = तेरे प्रादुर्भाव को जानते हैं। तम, रज व सत्व से ऊपर उठकर, गुणातीत बनकर ही हम आपको जान पाते हैं। प्रमाद, आलस्य, निद्रा से ऊपर उठना ही तमोगुण से ऊपर उठना है। तृष्णा से ऊपर उठना ही रजस् से ऊपर उठना है तथा सुखसंग से ऊपर उठना हो सत्त्वातीत होना हैं। इस स्थिति में ही हम प्रभु को प्राप्त करते हैं। (देवानां जनिमानि त्रेधा विद्म) = 'अग्नि, वायु, सूर्य' आदि देवों के 'पृथिवी, अन्तरिक्ष व धुलोक' में होनेवाले तीन भागों में विभक्त प्रादुर्भावों को हम जानते हैं। ग्यारह प्रथिवी के देव हैं, ग्यारह अन्तरिक्ष के व ग्यारह धुलोक के। इसप्रकार प्रभु की सृष्टि को समझनेवाले ब्रह्मज्ञानी को मारना एक महान् पाप है। शेष पूर्ववत्।
भावार्थ
'काम, क्रोध, लोभ' अधोगति के कारण बनते हैं। 'ज्ञान, कर्म, उपासना' दोषदहन के साधन हैं। 'देह, हृदय व मस्तिष्क' यह अध्यात्म की त्रिलोकी है। 'प्रकृति, जीव व प्रभु' का ज्ञान ही त्रिविध ज्ञान है। तम, रज व सत्त्व से ऊपर उठकर हम प्रभु के प्रकाश को देखते हैं। अग्नि, वायु, सूर्यादि देव पृथिवी, अन्तरिक्ष व घुलोक में ग्यारह-ग्यारह की संख्या में प्रादुर्भूत होते हैं। इसप्रकार हम प्रभु की दृष्टि में प्रभु की महिमा को देखनेवाले को आदर दें।
भाषार्थ
(निम्रुचः) सूर्यास्त (तिस्रः) तीन हैं, (व्युषः) उषाएँ (ह तिस्रः) निश्चय से तीन हैं, (रजांसि) लोक (त्रीणि) तीन हैं, (अङ्ग) हे प्रिय ! (दिवः) द्युलोक (तिस्रः) तीन हैं। (अग्ने) हे अग्नि (त्रेधा) तीन प्रकार के (ते) तेरे (जनित्रम्) जन्मों को (विद्मा) हम जानते हैं। (त्रेधा) तीन प्रकार के (देवानाम्) देवों के (जनिमानि) जन्मों को (विद्म) हम जानते हैं। (तस्य देवस्य..... पाशान्) पूर्ववत् (मन्त्र १)।
टिप्पणी
[दिवः तिस्रः = (१) विषुवती रेखा अर्थात् Equinoctial, जिस पर सूर्य के उदयास्त पर दिन-रात बराबर होते हैं. २१ मार्च तथा २३ सितम्बर को- वह द्यु भाग। (२) विषुवती रेखा के उत्तर का द्युभाग। (३) विषुवती रेखा के दक्षिण का द्युभाग। इस प्रकार तीन द्युभाग "दिवः तिस्रः" हैं। निम्रुचः व्युषः तिस्रः = (१) सूर्य का विषुवती रेखा पर उदयास्त होना, २१ मार्च तथा २३ सितम्बर को; (२) सूर्य का कर्क राशि पर उदयास्त होना २१ जून को, कर्क राशि उत्तरायण की अन्तिम सीमा है; (३) सूर्य का मकर राशि पर उदयास्त होना २१ दिसम्बर को, मकर राशि दक्षिणायन की अन्तिम सीमा है। इन तीन१ स्थानों पर सूर्य के उदयास्त के अनुसार सूर्यास्त तथा उषाएं भी तीन प्रकार की हो जाती है। दिन-रात के बराबर होने, दिनों के बड़े होने, तथा रातों के बड़े होने से सूर्य के उदयास्त के समय भिन्न-भिन्न हो जाने से निम्रुचः अर्थात् सूर्यास्त, तथा व्युषः अर्थात् सूर्योदय सम्बन्धी उषाएं भी भिन्न-भिन्न अर्थात् त्रिविध हो जाते हैं। व्युषः अर्थात् विविध प्रकार की उषाएं। त्रीणि रजांसि = "लोका रजांस्युच्यन्ते" निरुक्त (४।३।१९)। तीन लोक हैं पृथिवी, अन्तरिक्ष तथा द्यौः। अग्ने त्रेधा जनित्रम् = अग्नि के जन्म तीन प्रकार के हैं। पार्थिवाग्नि का जन्म इध्म से होता है। अन्तरिक्षीय अग्नि अर्थात् विद्युत् का जन्म मेघों से होता हैं। द्युलोकस्थ अग्नि का जन्म द्युलोक के तत्त्वों द्वारा होता है। वर्तमान पाश्चात्य वैज्ञानिक इस तत्त्व को हाईड्रोजन कहते हैं। त्रेधा देवानां जन्मानि = देवों के त्रिविध जन्म=सूर्य तथा सूर्य सदृश स्वयं प्रकाशी देवों का जन्म प्रकृति की प्रकाशमयी "विराट्" अवस्था से; पृथिवी आदि ग्रहों का जन्म सूर्य से; तथा उपग्रह रूपी चन्द्र आदि का जन्म ग्रहों से हुआ हैं। इस प्रकार देवों के जन्म त्रेधा अर्थात त्रिविध है]। [१.आदित्य के लिये इन तीन स्थानों को "तीन बन्धन" भी कहा है। यथा त्रीणित आहुर्दिविबन्धनानि" (यजु० २९।१५)। आदित्य की प्रतीयमान गति द्युलोक के इन तीन स्थानों में बन्धी हुई है।]
विषय
रोहित, आत्मा ज्ञानवान् राजा और परमात्मा का वर्णन।
भावार्थ
(तिस्रः) तीन (निम्रुचः) अस्त काल हैं। (तिस्रः) तीन (व्युषः) उषाकाल हैं। (स्त्रीणि रजांसि) तीन रजस हैं। (अङ्ग) हे जिज्ञासो (तिस्रः दिवः) तीन द्यौ = आकाश हैं। हे (अग्ने) अग्ने ! ज्ञानस्वरूप परमेश्वर (ते) तेरे (त्रेधा) तीन प्रकार के (जनित्रम्) प्रकट होने के स्वरूप को हम (विद्म) जानें। और इसी प्रकार (देवानाम्) समस्त देवों के (त्रेधा जनिमानि) तीन तीन प्रकार के प्रादुर्भाव होने के रूपों को भी (विद्म) जानें। (तस्य०) इत्यादि पूर्ववत्।
टिप्पणी
‘रजांसि’—इमे वै लोकाः रजांसि। श० ६। ३। १। १८॥ द्योर्वै तृतीयं रंजः। श० ६। ७। ४। ५॥ तिस्रः दिवः अग्निर्विद्युत् सूर्याः। अहर्व्युष्टिः। तै० ३। ८। १६। ४॥ रात्रिर्व्युष्टिः। श० १३। २। १। ६॥ अध्यात्म, अधिदैविक, अधिभौतिकभेदेन तिस्रो व्युषाः, तिस्रो निम्रुचः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। अध्यात्मम्। रोहित आदित्य देवता। १ चतुरवसानाष्टपदा आकृतिः, २-४ त्र्यवसाना षट्पदा [ २, ३ अष्टिः, २ भुरिक् ४ अति शाक्वरगर्भा धृतिः ], ५-७ चतुरवसाना सप्तपदा [ ५, ६ शाक्वरातिशाक्वरगर्भा प्रकृतिः ७ अनुष्टुप् गर्भाति धृतिः ], ८ त्र्यवसाना षट्पदा अत्यष्ठिः, ६-१९ चतुरवसाना [ ९-१२, १५, १७ सप्तपदा भुरिग् अतिधृतिः १५ निचृत्, १७ कृति:, १३, १४, १६, १९ अष्टपदा, १३, १४ विकृतिः, १६, १८, १९ आकृतिः, १९ भुरिक् ], २०, २२ त्र्यवसाना अष्टपदा अत्यष्टिः, २१, २३-२५ चतुरवसाना अष्टपदा [ २४ सप्तपदाकृतिः, २१ आकृतिः, २३, २५ विकृतिः ]। षड्विंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
To the Sun, against Evil Doer
Meaning
Three are the kinds of sun-set, three the dawns, three are the regions of firmament, dear friend, three the heavens. O Agni, we know your three kinds of birth, we know three kinds of the birth of divinities. To that Lord whose manifestation all these are, that person is an offensive sinner who violates the Brahmana, the man who knows Brahma in truth. O Rohita, Ruler on high, shake up that sinner, punish him down to naught, extend the arms of law, justice and retribution to the Brahmana-violator. (Three sun-rises and sun-sets have been interpreted by Yishwanatha Vidyalankara as: one on March 21 and September 23, another on June 21, and the third on December 21. With reference to these three, the relative position of the earth with the solar region makes for three heavens or regions of light on earth, the northern, the central and the southern. Three ‘Rajansi’ or regions of the world are the earth, the middle region, and the solar region. Three kinds of the birth of fire are: from fuel on earth, from Vayu (electricity), in the middle regions, and from the sun in the solar region. Three kinds of the birth of divinities are: Birth of the stars from Prakrti’s Virat mutation, birth of the planets from the stars, and birth of satellites such as moon from planets.)
Translation
There are three evening; verily, are three; three are the midspaces; O dear one, the heaven also are three, O adorable fire divine, we know your three-fold birth-place; we know threefold births of the enlightened ones — to that wrathful (enraged) Lord it is offending that some one scathes such a learned intellectual person. O ascending one, make him tremble; destroy him; put your snares upon the harasser of intellectual persons.
Translation
He who….in whose creation are round three settings,three rising,three spheres…the earth,the atmosphere and heaven, and three refulgences….the fire, the electricity and the sun; and under whose guidance we know the three places of fires’ birth and three generations of the luminous rays.
Translation
There are three baser and three higher modes of conduct. There are three divisions of time. There are three usages. O God, we know thy three sources of realization, and three manifestations of living beings. This God is wroth offended by the sinner who vexes the Brahman who hath gained this knowledge, terrify him, O King, destroy him, entangle in thy snares the Brahman’s tyrant!
Footnote
Modes of conduct: Physical, Oral, Mental (Mansik, Kaika, Vachika). Divisions of time: Past, Present, Future. Usages: Dharma, Artha and Kama. realisation: Karma, Action, Upasna, Contemplation, Jnana, Knowledge. Three manifestations: Satva, Rajas, Tamas.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२१−(निम्रुचः) नि+म्रुचु गतौ-क्विप्। अवनतयः। अधोगतयः (तिस्रः) मानसिकवाचिककायिकभेदेन (व्युषः) उष दाहे वधे च-क्विप्। उन्नतयः (ह) एव (तिस्रः) मानसिकादिभेदेन (त्रीणि) भूतभविष्यद्वर्तमानभेदेन (रजांसि) लोकाः (दिवः) व्यवहारक्रियाः (अङ्ग) अङ्गेति क्षिप्रनाम-निरु० ५।१७। क्षिप्रम्। अवश्यम् (तिस्रः) धर्मार्थकामभेदेन (विद्म) सांहितिको दीर्घः। जानीमः (ते) तव (अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् (त्रेधा) त्रिप्रकारेण। कर्मोपासनाज्ञानद्वारा (जनित्रम्) प्रादुर्भावम् (त्रेधा) सत्त्वरजस्तमोगुणभेदेन (देवानाम्) गतिशीलानां लोकानाम् (जनिमानि) प्रादुर्भावान् (विद्म) जानीमः ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal