Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 13 के सूक्त 3 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 23
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् छन्दः - चतुरवसानाष्टपदा विकृतिः सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    59

    त्वम॑ग्ने॒ क्रतु॑भिः के॒तुभि॑र्हि॒तो॒र्कः समि॑द्ध॒ उद॑रोचथा दि॒वि। किम॒भ्यार्चन्म॒रुतः॒ पृश्नि॑मातरो॒ यद्रोहि॑त॒मज॑नयन्त दे॒वाः। तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑। उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्वम् । अ॒ग्ने॒ । ऋतु॑ऽभि: । के॒तुऽभि॑: । हि॒त: । अ॒र्क: । सम्ऽइ॑ध्द: । उत् । अ॒रो॒च॒था॒: । दि॒वि । किम् ।अ॒भि । आ॒र्च॒न् । म॒रुत॑: । पृश्नि॑ऽमातर: । यत् । रोहि॑तम‌् । अज॑नयन्त । दे॒वा: । तस्य॑ । दे॒वस्य॑ ॥ क्रु॒ध्दस्य॑ । ए॒तत् । आग॑: । य: । ए॒वम् । वि॒द्वांस॑म् । ब्रा॒ह्म॒णम् । जि॒नाति॑ । उत् । वे॒प॒य॒ । रो॒हि॒त॒ । प्र । क्ष‍ि॒णी॒हि॒ । ब्र॒ह्म॒ऽज्यस्य॑ । प्रति॑ । मु॒ञ्च॒ । पाशा॑न् ॥३.२३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वमग्ने क्रतुभिः केतुभिर्हितोर्कः समिद्ध उदरोचथा दिवि। किमभ्यार्चन्मरुतः पृश्निमातरो यद्रोहितमजनयन्त देवाः। तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति। उद्वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्वम् । अग्ने । ऋतुऽभि: । केतुऽभि: । हित: । अर्क: । सम्ऽइध्द: । उत् । अरोचथा: । दिवि । किम् ।अभि । आर्चन् । मरुत: । पृश्निऽमातर: । यत् । रोहितम‌् । अजनयन्त । देवा: । तस्य । देवस्य ॥ क्रुध्दस्य । एतत् । आग: । य: । एवम् । विद्वांसम् । ब्राह्मणम् । जिनाति । उत् । वेपय । रोहित । प्र । क्ष‍िणीहि । ब्रह्मऽज्यस्य । प्रति । मुञ्च । पाशान् ॥३.२३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 3; मन्त्र » 23
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ! (त्वम्) तू (क्रतुभिः) अपने कर्मों से और (केतुभिः) बुद्धियों से (हितः) हितकारी होकर (समिद्धः) प्रकाशित (अर्कः) सूर्य के समान (दिवि) प्रत्येक व्यवहार में (उत्) ऊपर (अरोचथाः) चमका है। (पृश्निमातरः) पूँछने योग्य वेदवाणी को माता समान मान करनेवाले (मरुतः) शूर पुरुषों ने (किम्) किसको [अर्थात् ब्रह्म को ही] (अभि) सब ओर से (आर्चन्) पूजा है, (यत्) जब (रोहितम्) सबके उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर] को (देवाः) [उसके] उत्तम गुणों ने (अजनयन्त) प्रकट किया है। (तस्य) उस (क्रुद्धस्य) क्रुद्ध (देवस्य) प्रकाशमान [ईश्वर] के लिये.... [मन्त्र १] ॥२३॥

    भावार्थ

    वेदवेत्ता पराक्रमी लोग सर्वहितकारी परमेश्वर को उसके गुण कर्म स्वभाव से जानकर सदा आनन्द पाते हैं ॥२३॥इस मन्त्र का चौथा पाद ऊपर मन्त्र १२ में आ चुका है। इस मन्त्र का मिलान करो-अ० १३।१।३ ॥

    टिप्पणी

    २३−(त्वम्) (अग्ने) प्रकाशस्वरूप परमेश्वर (क्रतुभिः) कर्मभिः-निघ० २।१। (केतुभिः) प्रज्ञाभिः-निघ० ३।९। (हितः) उपकारी (अर्कः) सूर्यः (समिद्धः) प्रदीप्तः (उत्) उत्तमतया (अरोचथाः) दीप्तवानसि (दिवि) व्यवहारे (किम्) प्रश्ने। ब्रह्मैवेत्यर्थः (आर्चन्) पूजितवन्तः (मरुतः) अ० १।२०।१। शूरपुरुषाः (पृश्निमातरः) अ० १।१३।१३। प्रच्छ ज्ञीप्सायाम्-नि। प्रष्टव्या वेदवाणी मातृवत् सत्करणीया येषां ते। अन्यत् पूर्ववत्-म० १२ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    क्रतुभिः केतुभिः

    पदार्थ

    १. हे (अग्ने) = अग्नणी प्रभो ! (त्वम्) = आप (क्रतुभिः) = यज्ञों के द्वारा तथा (केतुभि:) = प्रकाश की रश्मियों के द्वारा (हित:) = हदयदेश में स्थापित किये जाते हो। (अर्कः) = आप पूजनीय हो, (समिद्धः) = ज्ञान से दीप्त हो। आप (दिवि) = अपने प्रकाशमय स्वरूप में (उत् अरोचथा:) = उत्कर्षेण दीस होते हो। २. (यत्) = जब (देवा:) = सूर्यादि देव (रोहितम्) = उस सदा से वृद्ध प्रभु को (अजनयन्त) = प्रादुर्भूत करते हैं-उस प्रभु की महिमा को हमें दिखलाते हैं, तब ये (मरुतः) = प्राणसाधना करनेवाले (पृश्निमातरः) = ज्ञान की वाणियों को अपनी माता के समान बनानेवाले, अर्थात् वेदमाता से सतत प्रेरणा प्राप्त करनेवाले ये ज्ञानी (किम् अभि आर्चन्) = उस अनिर्वचनीय प्रभु का ही पूजन करते हैं। इन प्रभुपूजक ब्रह्मज्ञानियों का हनन प्रभु के प्रति महान् अपराध है। शेष पूर्ववत्।

     

    भावार्थ

    वे प्रभु यज्ञों व ज्ञानों के द्वारा हृदयदेश में समिद्ध किये जाते हैं। वे पूजनीय, ज्ञानदीप्त प्रभु अपने प्रकाशमयस्वरूप में दौस हो रहे हैं। सूर्यादि देव इस प्रभु को प्रकाशित करते हैं। प्राणसाधक, ज्ञानप्रवण मनुष्य उस अनिर्वचनीय प्रभु का पूजन करते हैं। इन ब्रह्मपूजक ज्ञानियों का हनन महान् पाप है।

     

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (अग्ने) हे अग्रणी ! (त्वम्) तू (ऋतुभिः) निज कर्मों द्वारा (केतुभिः) तथा प्रज्ञाओं द्वारा (हितः) सब का हितकारी है। (समिद्ध) प्रदीप्त हुआ अर्थात् प्रकट हुआ तू (अर्कः) सूर्य सदृश है, और (दिवि) मस्तिष्क में (उदरोचथाः) उदित हुआ चमकता है। (यद्) जब (देवाः) दिव्य योगिजन (रोहितम्) तुझ सर्वोपरि आरूढ़ को (अजनयन्त) प्रकट करते हैं; तव वे (पृश्निमातरः) भूमि माता से उत्पन्न हुए (मरुतः) मरणधर्मा मनुष्य (किम्) और किस को (अभि आर्चन्) लक्ष्य कर के अर्चना अर्थात् स्तुति तथा पूजा करें, अर्थात् तेरी ही स्तुति तथा पूजा करें।

    टिप्पणी

    [दिवि= दिवं यश्चक्रे मूर्धानम्" (अथर्व० १०।७।३२)। पृश्निमातरः = पृश्नि अर्थात् विविध वर्णों से स्पृष्ट पृथिवी है माता जिन की ऐसे मनुष्य मरुत्= म्रियते, मनुष्य जातिः (उणा० १।९४ महर्षि दयानन्द)। अजनयन्त = परमेश्वर के सम्बन्ध में जब जन्म या जन् धातु का प्रयोग हो तो अर्थ "प्रकट होना" होता है, उत्पन्न होना नहीं। देखो (अथर्व १३।४ (४)। २९-३९)।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    रोहित, आत्मा ज्ञानवान् राजा और परमात्मा का वर्णन।

    भावार्थ

    (केतुभिः) अपने ज्ञापक किरणों से (हितः) धारित (अर्कः) सूर्य के समान (समिद्धः) अतिदीप्त तेजोमय (अर्कः) सब के अर्चनायोग्य होकर हे (अग्ने) ज्ञानमय ! प्रकाशस्वरूप ! तू अपने (केतुभिः) प्रज्ञापक, ज्ञान करानेहारे (क्रतुभिः) कर्मो से (दिवि) महान् आकाश में (उद् अरोचथाः) सर्वोपरि चमकता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। अध्यात्मम्। रोहित आदित्य देवता। १ चतुरवसानाष्टपदा आकृतिः, २-४ त्र्यवसाना षट्पदा [ २, ३ अष्टिः, २ भुरिक् ४ अति शाक्वरगर्भा धृतिः ], ५-७ चतुरवसाना सप्तपदा [ ५, ६ शाक्वरातिशाक्वरगर्भा प्रकृतिः ७ अनुष्टुप् गर्भाति धृतिः ], ८ त्र्यवसाना षट्पदा अत्यष्ठिः, ६-१९ चतुरवसाना [ ९-१२, १५, १७ सप्तपदा भुरिग् अतिधृतिः १५ निचृत्, १७ कृति:, १३, १४, १६, १९ अष्टपदा, १३, १४ विकृतिः, १६, १८, १९ आकृतिः, १९ भुरिक् ], २०, २२ त्र्यवसाना अष्टपदा अत्यष्टिः, २१, २३-२५ चतुरवसाना अष्टपदा [ २४ सप्तपदाकृतिः, २१ आकृतिः, २३, २५ विकृतिः ]। षड्विंशत्यृचं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    To the Sun, against Evil Doer

    Meaning

    O Agni, light of life, by acts, attributes, rays of light and flames of fire, you manifest for the benefit of your creations. Self-lighted and raised, you rise and shine in the heavens. Lighted and raised in yajna, you rise and reach the solar regions. When all the Divinities manifest the presence of Rohita, the Sun on high and everywhere, who would the people, vibrant children of versatile mother earth, worship? Only you, none else. To such lord of light, that person is an offensive sinner who violates the Brahmana, the man who knows Brahma in truth. O Rohita, Ruler on high, shake up that person, punish him down to naught, throw the snares of justice and retribution to the Brahmana-violator.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O adorable fire divine, set in motion by the sacrifices and by _ therays, enkindled well, you shine up as the sun in the sky. What was that, which the cloud-bearing winds, sons of the earth, worshipped, when the bounties of Nature brought the ascending sun into being -- to that wrathful (enraged) Lord it is offending that Some one scathes such a learned intellectual person. O ascending one, make him tremble; destroy him; put your snares upon the harasser of intellectual persons.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    He who…in whose worldly kingdom this fire is established with its inherent powers and with the rays of sun and being refulgent sun illumines the heaven; the Marutah.natured by the earth obtain pleasant light and strength from it as the material forces create the Rohita,the sun.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O God, with Thy marvelous deeds and intellectual powers, being highly benevolent, Thou hast shone in heaven like the enkindled Sun. Whom have the valiant, the respecters of the Vedas as their mother, worshiped, when the excellent qualities of God manifested Him. This God is wroth offended by the sinner who offends the Brahman who hath gained this knowledge. Terrify him, O God, destroy him, entangle in thy snare the Brahman’s tyrant!

    Footnote

    The devotees of the Vedas worshiped none else but God.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २३−(त्वम्) (अग्ने) प्रकाशस्वरूप परमेश्वर (क्रतुभिः) कर्मभिः-निघ० २।१। (केतुभिः) प्रज्ञाभिः-निघ० ३।९। (हितः) उपकारी (अर्कः) सूर्यः (समिद्धः) प्रदीप्तः (उत्) उत्तमतया (अरोचथाः) दीप्तवानसि (दिवि) व्यवहारे (किम्) प्रश्ने। ब्रह्मैवेत्यर्थः (आर्चन्) पूजितवन्तः (मरुतः) अ० १।२०।१। शूरपुरुषाः (पृश्निमातरः) अ० १।१३।१३। प्रच्छ ज्ञीप्सायाम्-नि। प्रष्टव्या वेदवाणी मातृवत् सत्करणीया येषां ते। अन्यत् पूर्ववत्-म० १२ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top