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अथर्ववेद के काण्ड - 13 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 8
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् छन्दः - त्र्यवसाना षट्पदात्यष्टिः सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    65

    अ॑होरा॒त्रैर्विमि॑तं त्रिं॒शद॑ङ्गं त्रयोद॒शं मासं॒ यो नि॒र्मिमी॑ते। तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑। उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒हो॒रा॒त्रै: । विऽमि॑तम् । त्रिं॒शत्ऽअ॑ङ्गम् । त्र॒य॒:ऽद॒शम् । मास॑म् । य: । नि॒:ऽमिमी॑ते । तस्य॑ । दे॒वस्य॑ ॥ क्रु॒ध्दस्य॑ । ए॒तत् । आग॑: । य: । ए॒वम् । वि॒द्वांस॑म् । ब्रा॒ह्म॒णम् । जि॒नाति॑ । उत् । वे॒प॒य॒ । रो॒हि॒त॒ । प्र । क्ष‍ि॒णी॒हि॒ । ब्र॒ह्म॒ऽज्यस्य॑ । प्रति॑ । मु॒ञ्च॒ । पाशा॑न् ॥३.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अहोरात्रैर्विमितं त्रिंशदङ्गं त्रयोदशं मासं यो निर्मिमीते। तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति। उद्वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अहोरात्रै: । विऽमितम् । त्रिंशत्ऽअङ्गम् । त्रय:ऽदशम् । मासम् । य: । नि:ऽमिमीते । तस्य । देवस्य ॥ क्रुध्दस्य । एतत् । आग: । य: । एवम् । विद्वांसम् । ब्राह्मणम् । जिनाति । उत् । वेपय । रोहित । प्र । क्ष‍िणीहि । ब्रह्मऽज्यस्य । प्रति । मुञ्च । पाशान् ॥३.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 3; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जो [परमेश्वर] (अहोरात्रैः) दिन और रातों के साथ (विमितम्) नापे गये, (त्रिंशदङ्गम्) तीस अङ्गोंवाले [अर्थात् ऋग्वेद आदि चारों वेद+ब्राह्मण आदि चारों वर्ण+ब्रह्मचर्य आदि चार आश्रम+अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य+पृथिवी आदि पाँच भूत+उछालना, गिराना, सकोड़ना, फैलाना और चलना पाँच कर्म जिसमें हैं] और (त्रयोदशम्) तेरह पदार्थवाले [अर्थात् कान, त्वचा, नेत्र, जीभ, नासिका−पाँच ज्ञानेन्द्रिय, गुदा, उपस्थ वा मूत्रमार्ग, हाथ, पाँव, वाणी−पञ्च कर्मेन्द्रिय, मन बुद्धि और जीव के स्थान] (मासम्) नापने योग्य [संसार] को (निर्मिमीते) बनाता है। (तस्य) उस (क्रुद्धस्य) क्रुद्ध (देवस्य) प्रकाशमान [ईश्वर] के लिये.... [मन्त्र १] ॥८॥

    भावार्थ

    जिस परमेश्वर ने खोजने योग्य संसार में मनुष्य के सुख के लिये वेद आदि और इन्द्रिय आदि पदार्थ रचे हैं, हे मनुष्यो ! उसी को इष्टदेव जानकर पुरुषार्थी बनकर उन्नति करो ॥८॥

    टिप्पणी

    ८−(अहोरात्रैः) रात्रिदिवसैः (विमितम्) परिमितम् (त्रिंशदङ्गम्) त्रिंशदङ्गानि यस्य तम्। ऋग्वेदादयश्चत्वारो वेदा ब्राह्मणादयश्चत्वारो वर्णा ब्रह्मचर्यादयश्चत्वार आश्रमा अणिमादयोऽष्टविभूतय उत्क्षेपणावक्षेपणाकुञ्चन-प्रसारणगमनानीति पञ्चकर्माणि-इति त्रिंशदङ्गानि (त्रयोदशम्) बहुव्रीहौ संख्येये डजबहुगणात्। पा० ५।४।७३। इति त्रयोदशन्-डच्। त्रयोदशपदार्था यस्मिंस्तम्। श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वानासिकापञ्चज्ञानेन्द्रियाणि, गुदोपस्थहस्तपादवाणीपञ्चकर्मेन्द्रियाणि मनोबुद्धिजीवाश्चेति त्रयोदशपदार्थाः (मासम्) मसी परिमाणे च। घञ्। मस्यते परिमीयते यः स मासस्तं संसारम् (निर्मिमीते) रचयति ॥

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    विषय

    त्रयोदशं मासं [निर्मिमीते]

    पदार्थ

    १. (अहोरात्रैः) = दिन और रातों के (विमितम्) = विशेष रूप से परिमित, नपे हुए (त्रिंशत् अङ्गम्) = तीस अंगों से बने हुए (त्रयोदशं मासम्) = तेरहवें मास को भी (यः निर्मिमीते) = जो पूरी तरह से बना देता है उस व्यवस्थापक प्रभु के प्रति यह अपराध है कि ऐसे ब्रह्मज्ञानी की हत्या करना। शेष पूर्ववत्।

    भावार्थ

    प्रभु ने इस कालचक्र का अद्भुत निर्माण किया है। समय-समय पर तेरहवाँ मास भी आता है और बड़े नियमितरूप से आता है। इस कालविद्या में निपुण ब्रह्मज्ञानी की हत्या करना महापाप है।

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    भाषार्थ

    (अहोरात्रैः) दिनों और रात्रियों द्वारा (विमितम्) मापे हुए, (त्रिंशदङ्गम्) तीस अङ्गों वाले, (त्रयोदशं मासम्) १३ वे मास का (यः) जो परमेश्वर (निर्मिमीते) निर्माण करता है। (तस्य देवस्य-पाशान्) पूर्ववत् (मन्त्र १)

    टिप्पणी

    [सौरमास वेद में ३० दिनों का माना है, और वर्ष ३६० दिनों का। यथा "तस्मिन् साकं त्रिशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चला चलास:" (ऋ० १।१६४।४८), अर्थात् उस संवत्सर-चक्र में ३०० और ६० शङ्कु हैं। तथा "षष्टिर्ह वै त्रोणि च शतानि संवत्सरस्याहोरात्राः" (शत० ब्राह्मण ९।१।१।४३), अर्थात् ६० और ३०० दिन-रात्र, संवत्सर के हैं। राशिचक्र ३६०° अंशों में बांटा जाता है। सम्भवतः इन अंशों की दृष्टि से संवत्सर के ३६० सौर दिन माने हों। चान्द्रवर्ष ३५४ दिनों का होता है। Lunar year= a Period of twelve lunar months or 354 days (Chamber's Dictionary)। इस प्रकार वैदिक सौरवर्ष और चान्द्रवर्ष में ३६०-३५४=६ दिनों का अन्तर प्रतिवर्ष हो जाता है। ३० दिनों के मल मास या अधिमास के लिये ५ वर्ष अपेक्षित हैं, ६×५= ३० दिन। इन ५ वर्षों का वर्णन यजुर्वेद में हुआ है। यथा "संवत्सराय, परिवत्सराय, इदावत्सराय, इद्वत्सराय, वत्सराय"१ (३०।१५)। कहीं "इद्वत्सराय" के स्थान में "अनुवत्सर" नाम भी आया है, (अथर्व पैप्पलाद शाखा १७।६।१५)। इस प्रकार वैदिक ३६० दिनों के सौरवर्ष और ३५४ दिनों के चान्द्र वर्ष की दृष्टि से, प्रत्येक ५ वर्षो के पश्चात्, ३० दिनों का १ मलमास या अधिमास अथवा त्रयोदश मास पड़ता है। वैदिक ३६० दिनों के सौरवर्ष और वर्तमान कैलेण्डर के ३६६ दिनों के सौर वर्षों में भी लगभग ६ दिनों का अन्तर प्रति कैलेण्डर सौरवर्ष के हिसाब से पड़ता है। प्रति ५ वर्षों के पश्चात् ३० दिनों का एक मास इस हिसाब में भी पूर्ववत है। कैलेण्डर सौर वर्ष के दिन= ३६५ दिन, ५ घण्टे ४८ मिनिट, ४९.७ सेकण्ड, अर्थात् लगभग ३६६ दिन।] [१. पारस्कर गृह्यसूत्र ३।२।२ में इसी क्रम से ५ नाम पठित हैं (अथर्ववेद, विलियम डि्वट ह्विटनी, ६।५५।३)।]

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    विषय

    रोहित, आत्मा ज्ञानवान् राजा और परमात्मा का वर्णन।

    भावार्थ

    (अहोरात्रैः) दिन और रातों से (विमित्तम्) विशेष रूप से परिमित (त्रिंशद्-अङ्गं) तीस अङ्ग अर्थात् अवयवों से बने (त्रयोदशं मासम्) १३ वें मास को भी (यः) जो पूरी तरह से (निर्मिमीते) बना देता है वह व्यवस्थापक परमेश्वर है। (तस्य०) इत्यादि पूर्ववत्।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। अध्यात्मम्। रोहित आदित्य देवता। १ चतुरवसानाष्टपदा आकृतिः, २-४ त्र्यवसाना षट्पदा [ २, ३ अष्टिः, २ भुरिक् ४ अति शाक्वरगर्भा धृतिः ], ५-७ चतुरवसाना सप्तपदा [ ५, ६ शाक्वरातिशाक्वरगर्भा प्रकृतिः ७ अनुष्टुप् गर्भाति धृतिः ], ८ त्र्यवसाना षट्पदा अत्यष्ठिः, ६-१९ चतुरवसाना [ ९-१२, १५, १७ सप्तपदा भुरिग् अतिधृतिः १५ निचृत्, १७ कृति:, १३, १४, १६, १९ अष्टपदा, १३, १४ विकृतिः, १६, १८, १९ आकृतिः, १९ भुरिक् ], २०, २२ त्र्यवसाना अष्टपदा अत्यष्टिः, २१, २३-२५ चतुरवसाना अष्टपदा [ २४ सप्तपदाकृतिः, २१ आकृतिः, २३, २५ विकृतिः ]। षड्विंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    To the Sun, against Evil Doer

    Meaning

    The One lord and master who measures the thirty day month counted by day-night cycle, he that shapes and ordains the thirteenth month of the lunar year, to that supreme lord that person is an offensive sinner who violates a Brahmana, the man who knows Brahma in truth. O Rohita, Ruler high risen and brilliant, shake up that person, punish him down to naught, extend the arms of law, justice and correction to the Brahmana- violator.

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    Translation

    He, who forms the thirteenth month, measured well with days and nights and containing thirty members -- to that wrathful (enraged) Lord it is offending that some one scathes such a learned intellectual person. O ascending one, make him tremble; destroy him; put your snares upon the harasser of intellectual persons

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    Translation

    He who...... who makes thirteenth month consisted of thirty parts with day and night.

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    Translation

    God creates the universe of thirty limbs, measured by day and night, the measurable universe of thirteen objects. This God is wroth offended by the sinner who vexes the Brahman who hath gained this knowledge. Terrify him, O King, destroy him, entangle in thy snares the Brahman’s tyrant!

    Footnote

    Thirty limbs: Four Vedas, Four Varnas, Four Ashramas, Eight Sidhis. (I) Fineness अणिमा (2) Lightness, लघिमा (3) Acquisition प्राप्ति (4) Irresistible Will प्राकाम्य (5) Glory महिमा (6) Superiority इशित्व (7) Control of passions वशित्व (8) Stoicism आत्मसंयम. Five primary elements, Throwing, Felling, Contraction, Expansion and Motion. Thirteen objects: Ear, Skin, Eye, Tongue, Nose i.e., five organs of cognition, Anus, organ of generation, hand, foot, mouth, i.e., five organs of action, Mind, Intellect, Soul.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ८−(अहोरात्रैः) रात्रिदिवसैः (विमितम्) परिमितम् (त्रिंशदङ्गम्) त्रिंशदङ्गानि यस्य तम्। ऋग्वेदादयश्चत्वारो वेदा ब्राह्मणादयश्चत्वारो वर्णा ब्रह्मचर्यादयश्चत्वार आश्रमा अणिमादयोऽष्टविभूतय उत्क्षेपणावक्षेपणाकुञ्चन-प्रसारणगमनानीति पञ्चकर्माणि-इति त्रिंशदङ्गानि (त्रयोदशम्) बहुव्रीहौ संख्येये डजबहुगणात्। पा० ५।४।७३। इति त्रयोदशन्-डच्। त्रयोदशपदार्था यस्मिंस्तम्। श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वानासिकापञ्चज्ञानेन्द्रियाणि, गुदोपस्थहस्तपादवाणीपञ्चकर्मेन्द्रियाणि मनोबुद्धिजीवाश्चेति त्रयोदशपदार्थाः (मासम्) मसी परिमाणे च। घञ्। मस्यते परिमीयते यः स मासस्तं संसारम् (निर्मिमीते) रचयति ॥

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