अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 1/ मन्त्र 10
मैतं पन्था॒मनु॑ गा भी॒म ए॒ष येन॒ पूर्वं॒ नेयथ॒ तं ब्र॑वीमि। तम॑ ए॒तत्पु॑रुष॒ मा प्र प॑त्था भ॒यं प॒रस्ता॒दभ॑यं ते अ॒र्वाक् ॥
स्वर सहित पद पाठमा । ए॒तम् । पन्था॑म् । अनु॑ । गा॒: । भी॒म: । ए॒ष: । येन॑ । पूर्व॑म् । न । इ॒यथ॑ । तम् । ब्र॒वी॒मि॒ । तम॑: । ए॒तत् । पु॒रु॒ष॒ । मा । प्र । प॒त्था॒: । भ॒यम् । प॒रस्ता॑त् । अभ॑यम् । ते॒ । अ॒र्वाक् ॥१.१०॥
स्वर रहित मन्त्र
मैतं पन्थामनु गा भीम एष येन पूर्वं नेयथ तं ब्रवीमि। तम एतत्पुरुष मा प्र पत्था भयं परस्तादभयं ते अर्वाक् ॥
स्वर रहित पद पाठमा । एतम् । पन्थाम् । अनु । गा: । भीम: । एष: । येन । पूर्वम् । न । इयथ । तम् । ब्रवीमि । तम: । एतत् । पुरुष । मा । प्र । पत्था: । भयम् । परस्तात् । अभयम् । ते । अर्वाक् ॥१.१०॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मनुष्य कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(एतम्) इस (पन्थाम्) पथ [अधर्मपथ] पर (मा अनु गाः) मत कभी चल, (एषः) यह (भीमः) भयानक है, (येन) जिस [मार्ग] से (पूर्वम्) पहिले (न इयथ) तू नहीं गया है, (तम्) उसी [मार्ग] को (ब्रवीमि) मैं कहता हूँ। (पुरुष) हे पुरुष ! (एतत्) इस (तमः) अन्धकार में (प्र) आगे (मा पत्थाः) मत पद रख (परस्तात्) दूरस्थान [कुपथ] में (भयम्) भय है, (अर्वाक्) इस ओर [धर्मपथ में] (ते) तेरे लिये (अभयम्) अभय है ॥१०॥
भावार्थ
विद्वानों के निश्चय से मनुष्यों को अधर्म छोड़कर धर्म पर चलना आनन्ददायक है ॥१०॥
टिप्पणी
१०−(एतम्) प्रसिद्धम् (पन्थाम्) पन्थानम्। कुमार्गमित्यर्थः (अनु) निरन्तरम् (मा गाः) मा याहि (भीमः) भयानकः (एषः) कुमार्गः (येन) (पूर्वम्) अग्रे (न) निषेधे (इयथ) इण् गतौ-लिट्, छान्दसं रूपम्। इयेथ। गतवानसि (तम्) कुमार्गम् (ब्रवीमि) कथयामि (तमः) अन्धकारम् (एतत्) (पुरुष) (प्र) अग्रे (मा पत्थाः)-म० ४। पदनं गमनं मा कार्षीः (भयम्) (परस्तात्) परस्मिन् दूरदेशे, कुमार्ग इत्यर्थः (अभयम्) कुशलम् (ते) तुभ्यम् (अर्वाक्) अभिमुखम्। समीपम् ॥
विषय
परस्तात् भर्य, अर्वाक् अभयम्
पदार्थ
१. हे पुरुष! (एतं पन्थाम् मा अनुगा:) = इस मार्ग के पीछे मत जा, जिससे कि मृत जाते हैं। (एषः भीम:) = यह गये हुओं का स्मरण करते रहने का मार्ग भंयकर है। मृतों का ही शोक करते रहना ठीक नहीं। इस मार्ग पर जाने के निषेध के द्वारा मैं तुझे (तं ब्रवीमि) = उस मार्ग का उपदेश करता है, (येन पूर्व न इयथ) = जिससे मृत्युकाल से पूर्व तू नहीं जाता है। मरों का ही शोक करता रहेगा तो समय से पहले जाएगा ही। २. एतत्-यह मरे हुओं का ही शोक करते रहना तो तमः अन्धकार है-अज्ञान है। मा प्रपत्था: इसकी ओर मत जा। परस्तात्-परे, अर्थात् इहलोक के कर्तव्यों में ध्यान देकर गये हुओं का शोक करते रहने में तो (भयम्) = भय-ही-भय है। अर्वाक्-हम सबके सम्मुख आने में ही (अभयम्) = निर्भयता है । कल्याण इसी बात में है कि तू शोक को छोड़कर जीवितों के सम्मुख प्रास हो और उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर।
भावार्थ
-गये हुओं का ही शोक करते रहना और अपने कर्तव्यों में प्रमाद करना भयान्वित मार्ग है। यह तो हमें समय से पूर्व ही मृत्यु-मुख में ले जाएगा।
भाषार्थ
(एतम्) इस (पन्थाम्) प्रेय पथ का (मा अनुगाः) अनुगमन न कर, (एषः) यह पथ (भीमः) भयानक है, (येन) जिस पथ द्वारा (पूर्वम्) पुराकाल में (न इयथ) तुम अभी नहीं गए (तम्) उसे (ब्रवीमि) मैं आचार्य कहता हूं। (पुरुष) हे पुरुष ! (एतत् तमः) इस प्रेयरूपी तमोमय पथ को (मा प्र पत्थाः) न स्वीकार कर (परस्तात्) यह परला पथ है (भयम्) जो कि भयानक है, (अर्वाक्) और इधर का ब्रह्मचर्य पथ (ते, अभयम्) तेरे लिये भयरहित है।
टिप्पणी
[मन्त्र ९ में "पथिरक्षी" द्वारा पथ का निर्देश हुआ है, यह मार्ग, "जिस में कि "श्वानौ" अर्थात् श्याम और शबल दो कुत्ते रक्षक हैं" भयानक है। यह मार्ग तमोगुणी और रजस्तमस्-गुणी व्यक्तियों का है, सत्त्वगुणियों का नहीं। यह मार्ग सत्त्वगुणियों के लिये परे१ का मार्ग है, और अर्वाक मार्ग है ब्रह्मचर्य का मार्ग। यह "अर्वाक्" मार्ग तेरे लिये अभयरूप है, श्रेयरूप है। प्रेय और श्रेय मार्गों की विस्तृत व्याख्या के लिये देखो "कठोपनिषद२"]। [१. अर्थात् त्याज्य है। २. श्रेय और प्रेय मार्ग (अध्याय १, बल्ली २, सन्दर्भ १-५)।
विषय
दीर्घजीवन-विद्या
भावार्थ
हे (पुरुष) मोहवश अपने मरों के साथ ममता करके उनके साथ मरने की इच्छा करने वाले मूढ़ पुरुष ! (एतम्) इस (पन्थानम्) मार्ग का (मा अनु गाः) अनुसरण मत कर। (भीमः एषः) यह मार्ग बहुत भयपूर्ण है। (येन) जिस मार्ग से (पूर्वम्) तू पहले भी (न इयथ) नहीं चला (तम्) उस अज्ञान मार्ग के विषय में मैं (ब्रवीमि) तुम्हें उपदेश करता हूँ कि (एतत्) यह मार्ग (तमः) अन्धकारमय मृत्यु है। हे (पुरुष) पुरुष ! उसकी तरफ़ (मा प्र पत्थाः)। तू मत जा, क्योंकि (परस्तात्) उसके परे अतीत काल में जाने से (भयम्) भय है कि भटक जाय। (ते) तेरे लिए तो (अर्वाक्) आगे बढ़ना ही (अभयम्) भय रहित है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। आयुर्देवता। १, ५, ६, १०, ११ त्रिष्टुभः। २,३, १७,२१ अनुष्टुभः। ४,९,१५,१६ प्रस्तारपंक्तयः। त्रिपाद विराड् गायत्री । ८ विराट पथ्याबृहती। १२ त्र्यवसाना पञ्चपदा जगती। १३ त्रिपाद भुरिक् महाबृहती। १४ एकावसाना द्विपदा साम्नी भुरिग् बृहती।
इंग्लिश (4)
Subject
Long Life
Meaning
Do not follow upon this seductive path of Adharma. It is dangerous, unknown, you have not gone this way earlier. Of this I warn you, man, take not a single step on to it. It is far, unfathomable, fearful. This way hither on the path of Dharma, it is all fearless for you.
Translation
Follow not this path. This is awful. By which you shall not go before your time, that I tell you of. O man, do not enter this darkness. There is danger thitherwards; hitherward no fear for you.
Translation
Do not tread this path of cyclic death and birth as it is very terrible or awful one. I, the learned man tell you of the path (the path leading to emancipation) which you have not travelled before. Enter not, O man! in this path of cyclic death and birth as it is full of darkness (ignorance). Herein prevails danger forward and safety is prevalent hitherward.
Translation
Forbear to tread this path of sin, for it is aweful: that path I speak of, which thou hast not travelled before. Enter it not, O man; this way is darkness: forward is danger, hitherward is safety.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१०−(एतम्) प्रसिद्धम् (पन्थाम्) पन्थानम्। कुमार्गमित्यर्थः (अनु) निरन्तरम् (मा गाः) मा याहि (भीमः) भयानकः (एषः) कुमार्गः (येन) (पूर्वम्) अग्रे (न) निषेधे (इयथ) इण् गतौ-लिट्, छान्दसं रूपम्। इयेथ। गतवानसि (तम्) कुमार्गम् (ब्रवीमि) कथयामि (तमः) अन्धकारम् (एतत्) (पुरुष) (प्र) अग्रे (मा पत्थाः)-म० ४। पदनं गमनं मा कार्षीः (भयम्) (परस्तात्) परस्मिन् दूरदेशे, कुमार्ग इत्यर्थः (अभयम्) कुशलम् (ते) तुभ्यम् (अर्वाक्) अभिमुखम्। समीपम् ॥
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