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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 10
    ऋषिः - चातनः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    82

    नृ॒चक्षा॒ रक्षः॒ परि॑ पश्य वि॒क्षु तस्य॒ त्रीणि॒ प्रति॑ शृणी॒ह्यग्रा॑। तस्या॑ग्ने पृ॒ष्टीर्हर॑सा शृणीहि त्रे॒धा मूलं॑ यातु॒धान॑स्य वृश्च ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नृ॒ऽचक्षा॑: । रक्ष॑: । परि॑ । प॒श्य॒ । वि॒क्षु । तस्य॑ । त्रीणि॑ । प्रति॑ । शृ॒णी॒हि॒ । अग्रा॑ । तस्य॑ । अ॒ग्ने॒ । पृ॒ष्टी: । हर॑सा । शृ॒णी॒हि॒ । त्रे॒धा । मूल॑म् । या॒तु॒ऽधान॑स्य । वृ॒श्च॒ ॥३.१०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नृचक्षा रक्षः परि पश्य विक्षु तस्य त्रीणि प्रति शृणीह्यग्रा। तस्याग्ने पृष्टीर्हरसा शृणीहि त्रेधा मूलं यातुधानस्य वृश्च ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नृऽचक्षा: । रक्ष: । परि । पश्य । विक्षु । तस्य । त्रीणि । प्रति । शृणीहि । अग्रा । तस्य । अग्ने । पृष्टी: । हरसा । शृणीहि । त्रेधा । मूलम् । यातुऽधानस्य । वृश्च ॥३.१०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 3; मन्त्र » 10
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (नृचक्षाः) मनुष्यों पर दृष्टि रखनेवाला तू (रक्षः) राक्षस को (विक्षु) मनुष्यों के बीच (परि पश्य) जाँच कर देख, (तस्य) उसके (त्रीणि) तीन (अग्रा) अग्रभाग [मस्तक और दो कंधे] (प्रति शृणीहि) तरेड़ दे। (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी राजन् !] (तस्य) उसकी (पृष्टीः) पसलियाँ (हरसा) बल से (शृणीहि) कुचल डाल, (यातुधानस्य) दुःखदायी की (मूलम्) जड़ को (त्रेधा) तीन प्रकार से [दोनों जङ्घा और कटिभाग से] (वृश्च) काट दे ॥१०॥

    भावार्थ

    राजा उपद्रवियों को दण्ड देने में सदा कठोरहृदय रहे ॥१०॥

    टिप्पणी

    १०−(नृचक्षाः) नॄणां द्रष्टा (रक्षः) दुष्टम् (परि) सर्वतः (पश्य) अवलोकय (विक्षु) मनुष्येषु। विशो मनुष्याः-निघ० २।३। (तस्य) (त्रीणि) त्रिसंख्याकानि (प्रति) प्रत्यक्षम् (शृणीहि) नाशय (अग्रा) अग्राणि। शिरः स्कन्धद्वयं च (तस्य) (अग्ने) (पृष्टीः) पार्श्वास्थीनि (शृणीहि) (त्रेधा) त्रिप्रकारेण। जङ्घाद्वयं कटिभागं च (मूलम्) शरीरस्य नीचभागम् (यातुधानस्य) (वृश्च) छिन्धि ॥

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    विषय

    त्रिविध दण्ड

    पदार्थ

    १.हे राजन्! (नृचक्षा:) = प्रजाओं का पालन करनेवाला तू (विक्षु) = प्रजाओं में (रक्ष:) = राक्षसी वृत्तिवाले को (परिपश्य) = सब ओर से देखनेवाला हो। राष्ट्र में जहाँ भी कोई राक्षसीवृत्तिवाला व्यक्ति हो वह तेरी आँख से ओझल न हो जाए। (तस्य) = उस राक्षस के (त्रीणि) = तीन (अग्ना) = प्रमुख दोषों को (प्रतिशृणीहि) = तू एक-एक करके समाप्त करनेवाला हो। राष्ट्र में सब अपराधों के मूल में 'काम-क्रोध तथा लोभ' ही होते हैं। तू पाप के इन तीनों मूलकारणों को समास करनेवाला बन । ज्ञान देकर तू इन्हें कामादि से ऊपर उठानेवाला हो। २. हे (अग्ने) = राष्ट्र की अग्रगति के साधक राजन्! (तस्य) = उसके (पृष्टि:) = आधारभूत स्थानों व लोगों को तू (हरसा) = अपनी तेजस्विता के द्वारा (शृणीहि) = नष्ट कर डाल । तेरे राष्ट्र में कोई भी व्यक्ति राष्ट्र के इन अपराधियों के सहायक [पृष्ठ] न बनें। ३. हे राजन्! तू (यातुधानस्य) = इस प्रजापीड़क के (मूलम्) = मूल को-पापकर्म की आधारभूत वृत्ति को (त्रेधा) = तीन प्रकार से(वृश्च) = काट डाल। 'वाग्दण्ड, धिग्दण्ड, अर्थ वा वधदण्ड' द्वारा तू इस यातुधान की अशुभवृत्ति को समाप्त कर डाल।

    भावार्थ

    राजा यातुधानों को ज्ञान देकर 'काम-क्रोध-लोभ' का शिकार होने से बचाए। इन्हें शरण देनेवालों को भी दण्डित करे। 'वाग्दण्ड' आदि द्वारा इन्हें पापकर्म से निवृत्त करने के लिए यत्नशील हो।

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    भाषार्थ

    (अग्ने) हे अग्रणी प्रधानमन्त्रिन् ! (नृचक्षाः) प्रजाजनों पर दृष्टि रखने वाला तू (विक्षु) निज प्रजाजनों में [प्रविष्ट] (रक्षः) परकीय राक्षस प्रकृति वाले व्यक्ति को (परि पश्य) ढूंढ। (तस्य) उसके (त्रीणि) तीन (अग्रा) अग्र अर्थात् उपर के भागों को (प्रति शृणीहि) एक-एक करके काट डाल ! (तस्य) उसकी (पृष्टीः) छाती और पीठ के अङ्गों को (हरसा) संहारी शस्त्र द्वारा (शृणीहि) काट डाल, (यातुधानस्य) यातना देने वाले के (मूलम्) मूलभाग को (त्रेधा) तीन भागों में (वृश्च) छिन्न-भिन्न कर।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में उग्र दण्ड का विधान है। उग्रदण्ड, राष्ट्रव्यवस्था को स्थिररूप में बनाए रखता है। नर्मदण्ड प्रजा को भ्रष्टाचारी बनाता है। किसी उग्र अपराधी को उग्रदण्ड दे देने पर प्रजा भ्रष्टाचार से बची रहती है। उपरि भाग के तीन अग्र हैं, सिर तथा दो बाहुएं। मूल का अर्थ होता है जड़। वृक्ष का मूल अर्थात् जड़ नीचे की ओर होती है। अतः यातुधान के मूल का अभिप्राय है शरीर के निचले अङ्ग। ये तीन हैं। घुटनों से ऊपर के अङ्ग हैं ऊरू; घुटनों से नीचे के अङ्ग हैं टांगें अर्थात् जङ्घाएं तथा पाद। धड़ के अङ्गों को काटने का पृथक् विधान हुआ है "पृष्टीः" शब्द द्वारा। इस प्रकार ये नीचे के विविध अंग हैं। सिर, पृष्टीः और बाहुओं से नीचे हैं।]

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    विषय

    प्रजा पीडकों का दमन।

    भावार्थ

    हे (अग्ने) राजन् ! परन्तप ! तू (नृचक्षाः) प्रजा के हित पर निरन्तर दृष्टि रखता हुआ (विक्षु) अपनी प्रजा में विचरते, हुए (रक्षः) प्रजा के सुख और उन्नति के कार्य में विघ्न डालने और प्रजा को पीड़ा देनेवाले दुष्ट पुरुष को अवश्य (परि पश्य) देख, उस पर सदा चक्षु रख। और (तस्य त्रीणि अग्रा) उसके तीन अग्रयायी लोगों को (प्रति श्रृणीहि) विनष्ट कर। हे (अग्ने) राजन् और (तस्याः) उसके पीठ की (पृष्टीः) पसुलियों को अर्थात् उसके पास के सहयोगी जो सदा उसके पक्षपोषक हैं उनको (हरसा) अपने हरण सामर्थ्य से अर्थात् कैद में डालनेवाले पोलिस विभाग से भयभीत करके या पकड़ कर (श्रृणीहि) विनष्ट कर। और इसी प्रकार (यातुधानस्य) प्रजापीड़क लोगों के (त्रेधा) तीन प्रकार के (मूलम्) मूल को, अड्डे को (त्रेधा) तीन प्रकार से ही (वृश्च) काट डाल। पीड़ादायी दुष्ट आदमी के तीन अग्र-शक्ति, धन और जन।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चातन ऋषिः। अग्निर्देवता, रक्षोहणम् सूक्तम्। १, ६, ८, १३, १५, १६, १८, २०, २४ जगत्यः। ७, १४, १७, २१, १२ भुरिक्। २५ बृहतीगर्भा जगती। २२,२३ अनुष्टुभो। २६ गायत्री। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destruction of the Evil

    Meaning

    O watchful guardian of the people and the dominion, Agni, watch all round and sight out the evil and destructive elements from amongst the people. Then destroy three prime forces of theirs : Break their back with awful force and passion, eliminate their intelligence and forward planning, and uproot their roots in three ways: dig out the roots, dismantle their bases and roast out the future seeds.

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    Translation

    O observer of men, look out for the wicked ones among the people. Tear down his three fore-parts. O adorable leader, break his ribs with intense heat; cut off the root of the tormentor thrice.

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    Translation

    O King! you have your eyes on all the subjects) Look on the anti-national and anti-social clement among all the subject and break his three main iimes—the two shoulders and head. O strong one break his ribs with your might and destroy his three roots—the waist and two thighs.

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    Translation

    O King, the Man-Beholder, look on the fiend, ’mid men, rend thou his three extremities in pieces. Demolish with thy strength his ribs. O King, destroy thou triply the lower part of the fiend!

    Footnote

    Extremities; Head, and two shoulders; or strength, wealth and men, the three agencies of a wicked person. Triply; Both the legs and waist.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १०−(नृचक्षाः) नॄणां द्रष्टा (रक्षः) दुष्टम् (परि) सर्वतः (पश्य) अवलोकय (विक्षु) मनुष्येषु। विशो मनुष्याः-निघ० २।३। (तस्य) (त्रीणि) त्रिसंख्याकानि (प्रति) प्रत्यक्षम् (शृणीहि) नाशय (अग्रा) अग्राणि। शिरः स्कन्धद्वयं च (तस्य) (अग्ने) (पृष्टीः) पार्श्वास्थीनि (शृणीहि) (त्रेधा) त्रिप्रकारेण। जङ्घाद्वयं कटिभागं च (मूलम्) शरीरस्य नीचभागम् (यातुधानस्य) (वृश्च) छिन्धि ॥

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