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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 5
    ऋषिः - चातनः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    66

    यत्रे॒दानीं॒ पश्य॑सि जातवेद॒स्तिष्ठ॑न्तमग्न उ॒त वा॒ चर॑न्तम्। उ॒तान्तरि॑क्षे॒ पत॑न्तं यातु॒धानं॒ तमस्ता॑ विध्य॒ शर्वा॒ शिशा॑नः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत्र॑ । इ॒दानी॑म् । पश्य॑सि । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । तिष्ठ॑न्तम् । अ॒ग्ने॒ । उ॒त । वा॒ । चर॑न्तम् । उ॒त । अ॒न्तरि॑क्षे । पत॑न्तम् । या॒तु॒ऽधान॑म् । तम । अस्ता॑ । वि॒ध्य॒ । शर्वा॑ । शिशा॑न: ॥३.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यत्रेदानीं पश्यसि जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न उत वा चरन्तम्। उतान्तरिक्षे पतन्तं यातुधानं तमस्ता विध्य शर्वा शिशानः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत्र । इदानीम् । पश्यसि । जातऽवेद: । तिष्ठन्तम् । अग्ने । उत । वा । चरन्तम् । उत । अन्तरिक्षे । पतन्तम् । यातुऽधानम् । तम । अस्ता । विध्य । शर्वा । शिशान: ॥३.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (जातवेदः) हे प्रसिद्ध ज्ञानवाले ! (अग्ने) हे अग्नि [समान प्रतापी राजन् !] (यत्र) जहाँ कहीं (इदानीम्) अब (तिष्ठन्तम्) खड़े हुए, (उत) और (वा) अथवा (चरन्तम्) घूमते हुए (उत) और (अन्तरिक्षे) आकाश में [विमान आदि से] (पतन्तम्) उड़ते हुए (यातुधानम्) दुःखदायी जन को (पश्यसि) तू देखता है, (शिशानः) तीक्ष्णस्वभाव, (अस्ता) बाण चलानेवाला तू (शर्वा) बाण वा वज्र से (तम्) उसे (विध्य) वेध ले ॥५॥

    भावार्थ

    राजा पृथिवी, समुद्र और आकाश के उपद्रवियों का नाश करके प्रजा को पाले ॥५॥

    टिप्पणी

    ५−(यत्र) (इदानीम्) (पश्यसि) निरीक्षसे (जातवेदः) हे प्रसिद्धज्ञान (तिष्ठन्तम्) स्थितिं कुर्वन्तम् (अग्ने) अग्निवत्तेजस्विन् राजन् (उत) अपि (वा) अथवा (चरन्तम्) गच्छन्तम् (उत) (अन्तरिक्षे) आकाशे (पतन्तम्) उड्डीयमानम् (यातुधानम्) दुःखप्रदं जनम् (तम्) (अस्ता) बाणानां क्षेप्ता (विध्य) ताडय (शर्वा) शरुणा। बाणेन वज्रेण वा (शिशानः)-म० १। तीक्ष्णस्वभावः ॥

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    विषय

    ज्ञान द्वारा वासना-विनाश

    पदार्थ

    १.हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! आप (इदानीम्) = अब (यत्र) = जहाँ भी (तिष्ठन्तम्) = ठहरे हुए-प्रसुप्त अवस्था में पड़े हुए [यातुधान] हिंसक विचार को (उत वा) = अथवा (चरन्तम्) = गति करते हुए, अर्थात् जागरित अवस्था में कार्य करते हुए (पश्यसि) = देखते हैं, (तम्) = उसको (विध्य) = नष्ट कीजिए। हमारे जागरित व प्रसुप्त सभी अशुभ विचार नष्ट हो जाएँ। २. (उत) = और (अन्तरिक्षे) = हृदयान्तरिक्ष में (पतन्तम्) = गति करते हुए-विविधरूपों में प्रकट होते हुए (यातुधानम्) = यातुधान को (अस्ता) = सुदूर फेंकनेवाले आप (शिशान:) = हमारी बुद्धियों को तीन करते हुए (शर्वा) [विध्य] = नाशक शक्ति के द्वारा बींध डालिए। आपकी कृपा से विविधरूपों में हदय के अन्दर उठनेवाले अशुभ विचार विनष्ट हो जाएँ।

    भावार्थ

    प्रभुकृपा से हमारा ज्ञान बढ़े और अशुभ बृत्तियाँ विनष्ट हो जाएँ।

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    भाषार्थ

    (अग्ने) हे अग्रणी, प्रधानमन्त्रिन् ! (जातवेदः) तथा हे उत्पन्नप्रज्ञ ! (इदानीम्) इस काल में (यत्र) जिस भी प्रदेश में (तिष्ठन्तम्) स्थित हुए (उत वा) या (चरन्तम्) इधर-उधर घूमते हुए, (उत) या (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (पतन्तम्) उड़ते हुए (यातुधानम्) यातना देने वाले को (पश्यसि) तू देखता है, (तम्) उसे (अस्ता) अस्त्र प्रहार करने वाला तू (शिशानः) उग्र हुआ-हुआ (शर्वा) घातकायुध द्वारा (विध्य) वींध।

    टिप्पणी

    [पतन्तम्=विमान द्वारा उड़ते हुए को। विध्य=वाण या वज्र द्वारा, या गोली द्वारा बींध। (अथर्व० १।१६।४) में सीसे द्वारा बींधने का वर्णन हुआ है, जो कि सीसे की गोली प्रतीत होती है]।

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    विषय

    प्रजा पीडकों का दमन।

    भावार्थ

    हे (जातवेदः) विद्वन् ! राजन् ! (यत्र इदानीम्) जहां कहीं भी और जब कभी भी (तिष्ठन्तम्) खड़े हुए, (चरन्तम्) विचरते हुए (उत) और (अन्तरिक्षे पतन्तम्) अन्तरिक्ष में, आकाश मार्ग से जाते हुए (यातुधानम्) पीड़ाकारी दुष्ट पुरुष को (पश्यसि) तू देखे, तभी और उसी स्थान पर तू (शिशानः) अतितीक्ष्ण (अस्ता) शरों के फेंकने में सावधान और (शर्वा) हिंसक, घातक अस्त्र, बाण या गोली से (तम्) उसको (विध्य) बेंध डाल, यदि किसी प्रकार वश में न आता हो और छिपता फिरता हो तो जहां भी मिले वहां ही उसको गोली का शिकार किया जाय। राजा स्वयं तो क्या करेगा ? वह (अस्ता) धनुर्धर बाण फेंकने और गोली चलाने वाले पुरुषों या (शर्वा, शिशानः) तीक्ष्ण हिंसक पुरुषों को लगा कर उनसे मरवा डाले।

    टिप्पणी

    (तृ०) यद् बालरिक्षे पथिभिः पतन्त इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चातन ऋषिः। अग्निर्देवता, रक्षोहणम् सूक्तम्। १, ६, ८, १३, १५, १६, १८, २०, २४ जगत्यः। ७, १४, १७, २१, १२ भुरिक्। २५ बृहतीगर्भा जगती। २२,२३ अनुष्टुभो। २६ गायत्री। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destruction of the Evil

    Meaning

    Now wherever O Jataveda Agni, you sight the soboteur destroyer, whether settled or moving on earth or flying in the sky, then immediately acting at the fastest, sharp and unsparing, fix him with the strike of an arrow or bullet.

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    Translation

    O knower of all, wherever you see any tormentors, Standing still, or moving about, or flying up in the midspace, O sacrificial fire, may you, the killer, (burning) fiercely, pierce him through and hurl him down.

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    Translation

    O learned King ! wherever and whenever you see the wicked man be he sitting or be he wandering, or be he roming in space, pierce him with lethal means as you are the master of archery and flashed with anger.

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    Translation

    O wise king, where now thou sees, a wicked person, standing still or roaming, or flying through the air’s mid-region, kindled to fury as an archerpierce him with an arrow!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(यत्र) (इदानीम्) (पश्यसि) निरीक्षसे (जातवेदः) हे प्रसिद्धज्ञान (तिष्ठन्तम्) स्थितिं कुर्वन्तम् (अग्ने) अग्निवत्तेजस्विन् राजन् (उत) अपि (वा) अथवा (चरन्तम्) गच्छन्तम् (उत) (अन्तरिक्षे) आकाशे (पतन्तम्) उड्डीयमानम् (यातुधानम्) दुःखप्रदं जनम् (तम्) (अस्ता) बाणानां क्षेप्ता (विध्य) ताडय (शर्वा) शरुणा। बाणेन वज्रेण वा (शिशानः)-म० १। तीक्ष्णस्वभावः ॥

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