अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 17
ऋषिः - चातनः
देवता - अग्निः
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
55
सं॑वत्स॒रीणं॒ पय॑ उ॒स्रिया॑या॒स्तस्य॒ माशी॑द्यातु॒धानो॑ नृचक्षः। पी॒यूष॑मग्ने यत॒मस्तितृ॑प्सा॒त्तं प्र॒त्यञ्च॑म॒र्चिषा॑ विध्य॒ मर्म॑णि ॥
स्वर सहित पद पाठस॒म्ऽव॒त्स॒रीण॑म् । पय॑: । उ॒स्रिया॑या: । तस्य॑ । मा । आ॒शी॒त् । या॒तु॒ऽधान॑: । नृ॒ऽच॒क्ष॒: । पी॒यूष॑म् । अ॒ग्ने॒ । य॒त॒म: । तितृ॑प्सात् । तम् । प्र॒त्यञ्च॑म् । अ॒र्चिषा॑ । वि॒ध्य॒ । मर्म॑णि ॥३.१७॥
स्वर रहित मन्त्र
संवत्सरीणं पय उस्रियायास्तस्य माशीद्यातुधानो नृचक्षः। पीयूषमग्ने यतमस्तितृप्सात्तं प्रत्यञ्चमर्चिषा विध्य मर्मणि ॥
स्वर रहित पद पाठसम्ऽवत्सरीणम् । पय: । उस्रियाया: । तस्य । मा । आशीत् । यातुऽधान: । नृऽचक्ष: । पीयूषम् । अग्ने । यतम: । तितृप्सात् । तम् । प्रत्यञ्चम् । अर्चिषा । विध्य । मर्मणि ॥३.१७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थ
(उस्रियायाः) गौ का [हमारे] (संवत्सरीणम्) निवासस्थान में उपस्थित [जो] (पयः) दूध है, (नृचक्षः) हे मनुष्यों पर दृष्टि रखनेवाले राजन् ! (यातुधानः) दुःखदायी जन (तस्य) उसका (मा आशीत्) न भोजन करे। (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी राजन् !] (यतमः) जो कोई [उनमें से हमारे] (अमृतम्) अमृत [अन्न दुग्ध आदि से] (तितृप्सात्) पेट भरना चाहे, (तम् प्रत्यञ्चम्) उस प्रतिकूलवर्ती को (अर्चिषा) अपने तेज से (मर्मणि) मर्मस्थान में (विध्य) छेद ले ॥१७॥
भावार्थ
राजा सावधानी रक्खे कि कोई दुष्ट जन प्रजा के पदार्थों को न हड़प जावे ॥१७॥
टिप्पणी
१७−(संवत्सरीणम्) अ० ७।७७।३। सम्+वस निवासे-सरन्, ख-प्रत्ययो भवे। सम्यग् निवासे गृहे भवम् (पयः) दुग्धम् (उस्रियायाः) अ० ४।२६।५। गोः (तस्य) पयसः (मा आशीत्) अश भोजने-लुङ्, अङ्भावश्छान्दसः। मा आशीत्-यथा ऋग्वेदपदपाठे। न भोजनं कुर्यात् (यातुधानः) (नृचक्षः) हे नॄणां द्रष्टः (पीयूषम्) पीयेरूषन्। उ० ४।७६। पीय प्रीणने-ऊषन्। अमृतम्। दुग्धम् (अग्ने) (यतमः) तेषां यः कश्चित् (तितृप्सात्) तृप्यतेः सनि। एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्। पा० ७।२।१०। इण्निषेधः, लेटि आडागमः। तर्पयितुमिच्छेत्, आत्मानम् (तम्) दुष्टम् (प्रत्यञ्चम्) प्रतिकूलगतिमन्तम् (अर्चिषा) तेजसा (विध्य) ताडय (मर्मणि) जीवमरणस्थाने ॥
विषय
गोपीड़क को दण्ड
पदार्थ
१. हे (नृचक्ष:) = मनुष्यों का ध्यान करनेवाले प्रजापालक राजन्! (यातुधान:) = गौओं को पीड़ित करके उनके दूध को छीननेवाला यातुधान (उस्त्रियायाः) = गौ का जो (सर्वत्सरीणं पयः) = वर्षभर में मिलनेवाला दूध है (तस्य मा अशीत) = उसका भोजन न करें। उस यातुधान को वर्षभर गौ का दूध पीने को न मिले। वह गौ की सेवा करे, परन्तु उसे गौ के दूध से वंचित रक्खा जाए। क्रूरता से दुग्धहरण का यही समुचित दण्ड है। २. (यतमः) = जो भी यातुधान, (अग्ने) = हे राजन्! (पीयूषम्) = अभिनव पय को-सर्वारम्भ में स्तनों से बाहर आनेवाले दूध को जोकि वस्तुत: बछड़े का भाग है, (तितृप्सात्) = अपनी तृप्ति का साधन बनाने की इच्छा करता है, (तम्) = उस (प्रत्यञ्चम्) = प्रतिकूल मार्ग पर चलनेवाले व्यक्ति के (मर्मणि) = मर्मस्थलों को तू (अर्चिषा) = ज्ञानज्वाला से विध्य बीध दे। तू उसे ऐसे शब्दों में समझाने का प्रयत्न कर कि 'बच्चे भूखे बैठे हों और माता-पिता आनन्द से खा रहे हों तो क्या यह दृश्य माता-पिता की मानवता का सूचक है? इसीप्रकार गौ का बछड़ा तरसता रह जाए और तुम गौ के ऊधस् से एक-एक बूंद दूध को निकालने का प्रयत्न करो तो यह कहाँ तक ठीक है? इसप्रकार उसे ज्ञान दिया जाए कि यह उसके हृदय में घर कर जाए-उसे अपना अपराध मर्माहत करने लगे।
भावार्थ
पीड़ा देकर गोदुग्ध हरण करनेवाले को वर्षभर दूध न मिलने का दण्ड दिया जाए।
भाषार्थ
(नृचक्षः) प्रजाजनों पर दृष्टि रखने वाले (अग्ने) हे अग्रणी प्रधानमन्त्रिन् ! (संवत्सरीणम्) संवत्सर में होने वाला (उस्रियायाः पयः) गौ का दूध है, (तस्य) उसका (मा आशीत्) न भक्षण करे (यातुधानः) गौ को यातना देने वाला। (यतमः) जो यातुधान (पीयूषम्) पेय दुग्धामृत को (तितृप्सात्) निज तृप्ति के लिये चाहे, (तम्) उस (प्रत्यञ्चम्) प्रतीपाचारी को (अर्चिषा) "अर्चिः" नामक अस्त्र द्वारा (मर्मणि) मर्मस्थल में (विध्य) बींध।
टिप्पणी
[प्रतिवर्ष वत्स दे कर गौ संवत्सर के पश्चात् दुधारू होती है। जो गौ को यातना देता है उसे गोदुग्ध से वञ्चित कर देना चाहिये (मन्त्र १६)। यदि राजाज्ञा के विरुद्ध वह फिर भी दूध द्वारा निज तृप्ति करता है तो उसे मृत्युदण्ड देना चाहिये]।
विषय
प्रजा पीडकों का दमन।
भावार्थ
हे (नृचक्षः) समस्त प्रजानों के ऊपर अपनी कृपादृष्टि से देखने हारे राजन् ! (यातुधानः) प्रजापीड़क आदमी (उस्त्रियायाः) गाय का (संवत्सरीणम्) वर्ष भर में उत्पन्न होनेवाला जितना (पयः) दूध हैं (तस्य) उसके किसी अंश को भी (मा आशीत्) न खा सके। हे (अग्ने) राजन् ! और (यतमः) दुष्ट पुरुषों में से कोई भी (पीयूषम्) गोदुग्ध रूप अमृत को (तितृप्सात्) भरपेट पावे तो (तम्) उसको (प्रत्यञ्चम्) सबके सामने (अर्चिषा) अग्नि की जलती लपट से (मर्मणि विध्य) उसके मर्मस्थान में मार, उसको तपे लोहे के छड़ों से मर्म स्थानों में मारा जाय।
टिप्पणी
(च०) ‘विध्य ममन्’ इति ऋ०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
चातन ऋषिः। अग्निर्देवता, रक्षोहणम् सूक्तम्। १, ६, ८, १३, १५, १६, १८, २०, २४ जगत्यः। ७, १४, १७, २१, १२ भुरिक्। २५ बृहतीगर्भा जगती। २२,२३ अनुष्टुभो। २६ गायत्री। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Destruction of the Evil
Meaning
All watchful guardian ruler of the people, let the violent evil doer not partake of the yearly milk of the ruddy cow, and whoever of them would fain taste of the milk, by your light and power pierce him to the quick of his heart.
Translation
The ruddy cow yields milk through the year; let not the tormentor enjoy it, O observer of men. O adorable leader, whichever of them seeks his satisfaction with this nectar; pierce him straight through his vitals with your buming rage.
Translation
O King ! you have watchful eyes over all the people. Let not wicked man taste even the minor part of the milk which a cow gives throughout the year. Let mighty one! Pierce with your power before you the vital part of whoever of the evil-doers satisfies him with the milk.
Translation
O King, the Man-Beholder, let not the fiend ever taste the milk, the cow yields in a year. O King, if any one of ignoble persons would like to glut himself with milk, pierce with thy flame his vitals as he meets thee!
Footnote
Flame: Lire of anger or strength.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१७−(संवत्सरीणम्) अ० ७।७७।३। सम्+वस निवासे-सरन्, ख-प्रत्ययो भवे। सम्यग् निवासे गृहे भवम् (पयः) दुग्धम् (उस्रियायाः) अ० ४।२६।५। गोः (तस्य) पयसः (मा आशीत्) अश भोजने-लुङ्, अङ्भावश्छान्दसः। मा आशीत्-यथा ऋग्वेदपदपाठे। न भोजनं कुर्यात् (यातुधानः) (नृचक्षः) हे नॄणां द्रष्टः (पीयूषम्) पीयेरूषन्। उ० ४।७६। पीय प्रीणने-ऊषन्। अमृतम्। दुग्धम् (अग्ने) (यतमः) तेषां यः कश्चित् (तितृप्सात्) तृप्यतेः सनि। एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्। पा० ७।२।१०। इण्निषेधः, लेटि आडागमः। तर्पयितुमिच्छेत्, आत्मानम् (तम्) दुष्टम् (प्रत्यञ्चम्) प्रतिकूलगतिमन्तम् (अर्चिषा) तेजसा (विध्य) ताडय (मर्मणि) जीवमरणस्थाने ॥
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