अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 11
त्रिर्या॑तु॒धानः॒ प्रसि॑तिं त एत्वृ॒तं यो अ॑ग्ने॒ अनृ॑तेन॒ हन्ति॑। तम॒र्चिषा॑ स्फूर्जय॑ञ्जातवेदः सम॒क्षमे॑नं गृण॒ते नि यु॑ङ्ग्धि ॥
स्वर सहित पद पाठत्रि: । या॒तु॒ऽधान॑: । प्रऽसि॑तिम् । ते॒ । ए॒तु॒। ऋ॒तम् । य: । अ॒ग्ने॒ । अनृ॑तेन । हन्ति॑ । तम् । अ॒र्चिषा॑ । स्फू॒र्जय॑न् । जा॒त॒ऽवेद: । स॒म्ऽअ॒क्षम् । ए॒न॒म् । गृ॒ण॒ते । नि । यु॒ङ्ग्धि॒ ॥३.११॥
स्वर रहित मन्त्र
त्रिर्यातुधानः प्रसितिं त एत्वृतं यो अग्ने अनृतेन हन्ति। तमर्चिषा स्फूर्जयञ्जातवेदः समक्षमेनं गृणते नि युङ्ग्धि ॥
स्वर रहित पद पाठत्रि: । यातुऽधान: । प्रऽसितिम् । ते । एतु। ऋतम् । य: । अग्ने । अनृतेन । हन्ति । तम् । अर्चिषा । स्फूर्जयन् । जातऽवेद: । सम्ऽअक्षम् । एनम् । गृणते । नि । युङ्ग्धि ॥३.११॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थ
(अग्ने) हे अग्नि [समान प्रतापी राजन् !] (यातुधानः) वह दुःखदायी पुरुष (त्रिः) तीन बार (ते) तेरी (प्रसितिम्) बेड़ी को (एतु) प्राप्त हो, (यः) जो (ऋतम्) सत्य को (अनृतेन) असत्य से (हन्ति) तोड़ता है। (जातवेदः) हे प्रसिद्ध ज्ञानवाले [राजन् !] (अर्चिषा) अपने तेज से (तम् स्फूर्जयन्) उस पर गरजता हुआ तू (समक्षम्) सब के सन्मुख (एनम्) इस [शत्रु] को (गृणते) स्तुति करनेवाले के [हित के] लिये (नि युङ्ग्धि) बाँध ले ॥११॥
भावार्थ
राजा चोर डाकू आदि दुष्टों को प्रजा के हित के लिये यथावत् दण्ड देवे ॥११॥ “(त्रिः) तीन बार” से प्रयोजन ऊपर, नीचे और मध्य पाश है, देखो अ० ७।८३।३ ॥
टिप्पणी
११−(त्रिः) त्रिवारम् (यातुधानः) पीडाप्रदः (प्रसितिम्) प्र+षिञ् बन्धने-क्तिन्। प्रसितिः प्रसयनात्तन्तुर्वा जालं वा-निरु० ६।१२। बन्धनम् (ते) तव (एतु) प्राप्नोतु (ऋतम्) सत्यनियमम् (यः) (अग्ने) तेजस्विन् राजन् (अनृतेन) मिथ्याकथनेन (हन्ति) नाशयति (तम्) दुष्टम् (अर्चिषा) तेजसा (स्फूर्जयन्) स्फुर्ज वज्रशब्दे-शतृ। गर्जयन् (जातवेदः) हे प्रसिद्धज्ञान (समक्षम्) प्रत्यक्षम् (एनम्) शत्रुम् (गृणते) स्त्रोत्रं कुर्वते (नियुङ्ग्धि) युज संयमने, चुरादिः, रुधादित्वं छान्दसम्। नियोजय। बधान ॥
विषय
अध्यापन व उपदेश द्वारा जीवन-परिवर्तन
पदार्थ
१. हे (अग्ने) = राष्ट्र के अग्रणी राजन्! (य:) = जो (यातुधान:) = प्रजापीड़क व्यक्ति (अनृतेन) = अनृत से (ऋतं हन्ति) = ऋत को नष्ट करता है, वह (त्रि:) = तीन बार (ते प्रसितिम् एतु) = तेरे बन्धन में प्रास हो। प्रथम बार उसे 'वाग्दण्ड' देकर छोड़ दिया जाए। दूसरी बार उसके लिए 'धिग्दण्ड' का प्रयोग हो। तीसरी बार उसे 'अर्थदण्ड और वधदण्ड' के योग्य समझा जाए। २. हे (जातवेदः) = राष्ट्र में ज्ञान का प्रसार करनेवाले राजन्! (तम्) = उस यातुधान को (अर्चिषा) = ज्ञान की ज्वाला से (स्फूर्जयन्) = [स्फू ro shine] दीप्त करने के हेतु से (गृणते समक्षम्) = स्तोता व उपदेष्टा के सामने (एनं नियुंग्धि) = इसे नियुक्त कर । प्रभुभक्त उपदेष्टा इसे उचित ज्ञान व प्रेरणा देकर इसके जीवन को ऋतमय बनाने के लिए यत्नशील हो।
भावार्थ
कैदियों के लिए अध्यापन व उपदेश की व्यवस्था करके राजा को उनके जीवन को परिवर्तित करने की व्यवस्था करनी चाहिए।
भाषार्थ
(अग्ने) हे अग्रणी प्रधानमन्त्रिन् ! (यातुधानः) यातना देने वाला (ते) तेरे (प्रसितिम्) बन्धन को (त्रिः) तीन बार (एतु) प्राप्त हो, (यः) जो कि (अनृतेन) असत्य द्वारा (ऋतम्) सत्य का (हन्ति) हनन करता है। (जातवेदः) हे जातप्रज्ञ ! (स्फूर्जयन्) गर्जता हुआ तू (तम्, एनम्) उसे अर्थात् (गृणते) स्तोतृ प्रजाजन के लिये (समक्षम्) अपनी आंखों के सामने (अर्चिषा) निज क्रोधाग्नि द्वारा (नि युङ्ग्धि) नितरां युक्त कर, सम्बद्ध कर।
टिप्पणी
[यातुधान को प्रधानमन्त्री तीन बार कारागार में बन्द करे। यातुधान है असत्य वक्ता और असत्य व्यवहारी। यदि वह तब भी सत्याचारी न बने तो प्रधानमन्त्री गर्जता हुआ, निज क्रोधाग्नि द्वारा उसे सम्बद्ध करे, उसे फटकारे। प्रजा के भले के लिए यह कार्य वह अपने सामने कराए या करे। मन्त्र में जेलदण्ड तथा वाग्दण्ड का वर्णन हुआ है। प्रसितिम् =प्र+सि (षिञ् बन्धने)+तिम्]।
विषय
प्रजा पीडकों का दमन।
भावार्थ
हे (अग्ने) राजन् ! (यः) जो दुष्ट पुरुष (अनृतेन) असत्य से (ऋतम्) सत्य को (हन्ति) मारता है वह (यातुधानः) प्रजा का पीड़क दुष्ट पुरुष ‘यातुधान’, राक्षस है। वह (ते) तेरे (प्र सितिम्) बन्धन में (त्रिः) तीनों प्रकार से या तीन बार (एतु) आवे यदि फिर भी बाज़ न आवे तो हे (जातवेदः) अग्ने ज्ञानवान् राजन् ! (तम्) उसको (अर्चिषा) आग से (स्फूर्जयन्) तड़पाता हुआ, (समक्षम्) सबके सामने (एनम्) इसको (गृणते) अपनी पीड़ा प्रकट करनेवाले प्रजाजन के हित के लिये (नियुधि) दण्ड दे, उसका निग्रह कर।
टिप्पणी
(च०) ‘मृणते निवृङ्धि’ इति ऋ०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
चातन ऋषिः। अग्निर्देवता, रक्षोहणम् सूक्तम्। १, ६, ८, १३, १५, १६, १८, २०, २४ जगत्यः। ७, १४, १७, २१, १२ भुरिक्। २५ बृहतीगर्भा जगती। २२,२३ अनुष्टुभो। २६ गायत्री। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Destruction of the Evil
Meaning
O Jataveda Agni, the destroyer who violates truth and law by untruth must suffer the chains of your law three ways: Arrest him, overwhelm him with the refulgence of truth, power and law, and face him with people that honour the order and value the truth of the order.
Translation
May the tormentor, who smites the truth with untruth, come thrice under your fire. O adorable Lord, O knower of all, overwhelming-him with your flames, may you capture and destroy him in the presence of your (this) adorer.
Translation
O mighty ruler! Let that wicked man who by his falsehood injures the truth or holy order; come to your fetter and cuffs triply—in neck, hands and legs. O wise one! fetter him before your admirers flashing you with your radiance.
Translation
Thrice, O King, let thy noose surround the demon who with his false hood injures truth. Roaring loud with thy strength. O King, fetter him in the presence of all, for the good of him who praises God.
Footnote
Thrice' means three times, again and again, or in three parts of the body, the lower, middle and upper, i.e., feet, legs, hands.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
११−(त्रिः) त्रिवारम् (यातुधानः) पीडाप्रदः (प्रसितिम्) प्र+षिञ् बन्धने-क्तिन्। प्रसितिः प्रसयनात्तन्तुर्वा जालं वा-निरु० ६।१२। बन्धनम् (ते) तव (एतु) प्राप्नोतु (ऋतम्) सत्यनियमम् (यः) (अग्ने) तेजस्विन् राजन् (अनृतेन) मिथ्याकथनेन (हन्ति) नाशयति (तम्) दुष्टम् (अर्चिषा) तेजसा (स्फूर्जयन्) स्फुर्ज वज्रशब्दे-शतृ। गर्जयन् (जातवेदः) हे प्रसिद्धज्ञान (समक्षम्) प्रत्यक्षम् (एनम्) शत्रुम् (गृणते) स्त्रोत्रं कुर्वते (नियुङ्ग्धि) युज संयमने, चुरादिः, रुधादित्वं छान्दसम्। नियोजय। बधान ॥
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