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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 18
    ऋषिः - चातनः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    51

    स॒नाद॑ग्ने मृणसि यातु॒धाना॒न्न त्वा॒ रक्षां॑सि॒ पृत॑नासु जिग्युः। स॒हमू॑रा॒ननु॑ दह क्र॒व्यादो॒ मा ते॑ हे॒त्या मु॑क्षत॒ दैव्या॑याः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒नात् । अ॒ग्ने॒ । मृ॒ण॒सि॒ । या॒तु॒ऽधाना॑न् । न । त्वा॒ । रक्षां॑सि । पृत॑नासु । जि॒ग्यु॒: । स॒हऽमू॑रान् । अनु॑ । द॒ह॒ । क्र॒व्य॒ऽअद॑: । मा । ते॒ । हे॒त्या: । मु॒क्ष॒त॒ । दैव्या॑या: ॥३.१८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः। सहमूराननु दह क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सनात् । अग्ने । मृणसि । यातुऽधानान् । न । त्वा । रक्षांसि । पृतनासु । जिग्यु: । सहऽमूरान् । अनु । दह । क्रव्यऽअद: । मा । ते । हेत्या: । मुक्षत । दैव्याया: ॥३.१८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 3; मन्त्र » 18
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्ने) हे विद्वान् राजन् ! तू (यातुधानान्) पीड़ा देनेवाले [प्राणियों वा रोगों] को (सनात्) नित्य (मृणसि) नष्ट करता है, (रक्षांसि) राक्षसों ने (त्वा) तुझे (पृतनासु) संग्रामों में (न) नहीं (जिग्युः) जीता है। (क्रव्यादः) मांसभक्षकों को (सहमूरान्) [उनके] मूल [अथवा मूढ़ मनुष्यों] सहित (अनु दह) भस्म कर दे, (ते) तेरे (दैव्यायाः) दिव्य गुणवाले (हेत्याः) वज्र से (मा मुक्षत) वे न छूटें ॥१८॥

    भावार्थ

    राजा दुःखदायी मनुष्यों को उनके मूल और साथियों सहित नाश करने में उत्साही रहे ॥१८॥ यह मन्त्र आ चुका है-अथर्व० ५।२९।११ ॥

    टिप्पणी

    १८−(सहमूरान्) मूलेन कारणेन सहितान्। यद्वा मूढमनुष्यैः सहितान्। अन्यद् व्याख्यातम्-अ० ५।२९।११ ॥

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    विषय

    ज्ञान-प्रसार द्वारा यातुधान का अन्त

    पदार्थ

    १. है (अग्ने) = राष्ट्र को आगे ले-जानेवाले राजन् ! तू (सनात्) = चिरकाल से (यातुधानान्) = प्रजा व पशुओं के पीड़कों को (मृणसि) = कुचल देता है। (त्वा) = तुझे (पृतनासु) = संग्रामों में (रक्षांसि) = ये राक्षसीवृत्ति के लोग (न) = नहीं (जिग्युः) = जीत पाते। तू (क्रव्याद:) = इन मांसभक्षियों को (सहमूरान्) = जड़ समेत [सह+मूर-मूल] (अनुदह) = भस्म कर दे। इन्हें जड़ समेत भस्म करने का भाव यह है कि "ये न तो मांस खाएँ और न ही इनकी मांस खाने की रुचि रह जाए। विषय तो जाएँ विषरस भी जाए'। (ते) = आपके (दैव्याया: हेत्या:) = दिव्य वज्र से-प्रकाशमय वन से (मा मुक्षत) = कोई भी यातुधान मुक्त न रह जाए। ज्ञान-प्रकाश के फैलने से उनका यातुधानत्व व क्रव्यादपना ही समाप्त हो जाए|

    भावार्थ

    राजा राष्ट्र में ज्ञान-प्रसार के द्वारा यातुधानत्व को समाप्त करे।


     

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    भाषार्थ

    (अग्ने) हे अग्रणी प्रधानमन्त्रिन् ! (सनात्) सदा से (यातुधानान्) यातना देने वालों को (मृणसि) तू मारता रहा है, (रक्षांसि) राक्षस-स्वभाव वाले यातुधान (त्वा) तुझे (पृतनासु) युद्धों में (न जिग्युः) नहीं जीत पाए। (क्रव्यादः) इन मांसभक्षियों को (सहमूरान) जो कि मूढ़ता के साथ विद्यमान हैं, (अनु दह) निरन्तर दग्ध कर, (ते) तेरी (दैव्यायाः हेत्याः) दिव्य हेति अर्थात् अस्त्र से (मा मुक्षत) ये मुक्त न हों, छूट न पाएं।

    टिप्पणी

    [सनात् = सदा से, जब से तू प्रधानमन्त्री बना है तभी से। ये राक्षस मूढ़तासम्पन्न हैं, अतः कर्तव्याकर्तव्य से अनभिज्ञ हैं। मन्त्र १७ में अर्चिः, और १८ में हेति, दोनों अस्त्र विशेष हैं। सहमूरान् =अथवा मूढ़सैनिकों सहित अधिकारियों को]।

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    विषय

    प्रजा पीडकों का दमन।

    भावार्थ

    हे (अग्ने) राजन् ! तू (यातुधानान्) प्रजापीड़कों को (सनात्) सदा से ही (मृणसि) विनष्ट करता आता है (त्वा) तुझे (रक्षांसि) राक्षस लोग (पृतनासु) संग्रामों में भी (न जिग्युः) न जीत पावें। (क्रव्यादः) मांसखोर (सह-मूरान्) मूढ़ लोगों, घातक अज्ञानी लोगों के साथ ही (अनु दह) अपने वश में करके भस्म कर डाल, (ते दैव्यायाः) तेरे दिव्य गुणयुक्त और राजकीय (हेत्याः) दण्डकारी शस्त्र से (ते) वे दुष्ट पुरुष (मा मुक्षत) बचने न पावें।

    टिप्पणी

    (तृ०) ‘अनुदह सहमूरान्’ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चातन ऋषिः। अग्निर्देवता, रक्षोहणम् सूक्तम्। १, ६, ८, १३, १५, १६, १८, २०, २४ जगत्यः। ७, १४, १७, २१, १२ भुरिक्। २५ बृहतीगर्भा जगती। २२,२३ अनुष्टुभो। २६ गायत्री। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destruction of the Evil

    Meaning

    For all time, Agni, the spirits of evil, tormentors, and destroyers of life, have not been able to win over you in the battles of nature and humanity. You always destroy them. Pray burn the flesh eating demons along with their roots and seeds. Let none escape the on¬ slaughts of your life saving divine power.

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    Translation

    From of old, O fire-divine (Agni) you have been killing the tormenters; the wicked (demons) have not conquered you in fights. Please burn up the flesh-eaters together with their female pairs (daivyayah). Let them not be freed from your heavenly missile (heti). (Also Av. V.29.11)

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    Translation

    O King! you always kill the mischief-monger, never have trouble-creating persons overcome you in fight, burn up the flesh-eaters with their person and let no one of them escape your mighty wonderful weapon.

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    Translation

    O King, from days of old thou slayest demons: never have they over¬ come thee in battles. Burn up the flesh-devourers, along with their foolish companions: let none of them escape thy wonderful instrument!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १८−(सहमूरान्) मूलेन कारणेन सहितान्। यद्वा मूढमनुष्यैः सहितान्। अन्यद् व्याख्यातम्-अ० ५।२९।११ ॥

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