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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 14
    ऋषिः - चातनः देवता - अग्निः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    56

    परा॒द्य दे॒वा वृ॑जि॒नं शृ॑णन्तु प्र॒त्यगे॑नं श॒पथा॑ यन्तु सृ॒ष्टाः। वा॒चास्ते॑नं॒ शर॑व ऋच्छन्तु॒ मर्म॒न्विश्व॑स्यैतु॒ प्रसि॑तिं यातु॒धानः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    परा॑ । अ॒द्य । दे॒वा: । वृ॒जि॒नम् । शृ॒ण॒न्तु॒ । प्र॒त्यक् । ए॒न॒म् । श॒पथा॑: । य॒न्तु॒ । सृ॒ष्टा: । वा॒चाऽस्ते॑नम् । शर॑व: । ऋ॒च्छ॒न्तु॒ । मर्म॑न् । विश्व॑स्य । ए॒तु॒ । प्रऽस‍ि॑तिम् । या॒तु॒ऽधान॑: ॥३.१४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पराद्य देवा वृजिनं शृणन्तु प्रत्यगेनं शपथा यन्तु सृष्टाः। वाचास्तेनं शरव ऋच्छन्तु मर्मन्विश्वस्यैतु प्रसितिं यातुधानः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परा । अद्य । देवा: । वृजिनम् । शृणन्तु । प्रत्यक् । एनम् । शपथा: । यन्तु । सृष्टा: । वाचाऽस्तेनम् । शरव: । ऋच्छन्तु । मर्मन् । विश्वस्य । एतु । प्रऽस‍ितिम् । यातुऽधान: ॥३.१४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 3; मन्त्र » 14
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (देवाः) विजय चाहनेवाले शूर (अद्य) आज (वृजिनम्) पापी को (परा शृणन्तु) कुचल डालें, (सृष्टाः) [उसके] छोड़े हुए [कहे हुए] (शपथाः) कुवचन (एनम्) उसको (प्रत्यक्) प्रतिकूल गति से (यन्तु) पहुँचें। (शरवः) [हमारे] तीर (वाचास्तेनम्) बतचोर [छली] पुरुष को (मर्मन्) मर्मस्थान मे (ऋच्छन्तु) प्राप्त होवें, (विश्वस्य) सब में प्रवेश करनेवाले राजा की (प्रसितिम्) बेड़ी को (यातुधानः) दुःखदायी (एतु) पावे ॥१४॥

    भावार्थ

    वीर राजा मिथ्यावादी, चोर, डाकुओं को दण्ड देकर नाश कर दे ॥१४॥

    टिप्पणी

    १४−(अद्य) अस्मिन् दिने (देवाः) विजिगीषवः शूराः (वृजिनम्) अ० १।१०।३। पापिनम्। वक्रस्वभावम् (पराशृणन्तु) दुरे नाशयन्तु (प्रत्यक्) प्रतिकूलगत्या (एनम्) वृजिनम् (शपथाः) कुवचनानि (यन्तु) प्राप्नुवन्तु (सृष्टाः) त्यक्ताः। उच्चारिताः (वाचास्तेनम्) मृषावचनेन हर्तारम् (शरवः) बाणाः (ऋच्छन्तु) ऋच्छ गतीन्द्रियप्रलयमूर्तिभावेषु। प्राप्नुवन्तु (मर्मन्) अ० ५।८।९। जीवमरणस्थाने (विश्वस्य) अशूप्रुषिलटि०। उ० १।१५१। विश प्रवेशने-क्वन्। सर्वत्र प्रवेशकस्य राज्ञः (एतु) गच्छतु (प्रसितिम्) म० ११। निगडम्। शृङ्खलाम् (यातुधानः) दुःखदायकः ॥

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    विषय

    हम 'वाचास्तेन' न बनें

    पदार्थ

    १. (अद्य) = आज (देवा:) = ज्ञान का प्रसार करनेवाले विद्वान् (वृजिनम्) = पाप को (पराशृणन्तु) = दूर शीर्ण कर दें। ज्ञान-प्रसार से पापवृत्ति दूर हो। राष्ट्र में राजा ज्ञान-प्रसार का पूर्ण ध्यान करे। (तृष्टा:) = उत्पन्न किये हुए कर्कश (शपथा:) = अभिशाप (एनम्) = इस शाप देनेवाले को (प्रत्यक यन्तु) = लौटकर आभिमुख्येन प्राप्त हों। समझदार मनुष्य गालियों का उत्तर गालियों में नहीं देता और इसप्रकार अपशब्द बोलनेवाले के पास ही उसके अपशब्द लौट जाते हैं। २. (वाचास्तेनम्) = वाणी की चोरी करनेवाले, अर्थात् अनृत व कटु शब्द बोलनेवाले इस व्यक्ति को इसके वचन ही (शरवः मर्मन् ऋच्छन्तु) = शरतुल्य होकर मर्मस्थलों में प्राप्त हों। इस वाचास्तेन को जहाँ अपने शब्द ही पीड़ाकर हों, वहाँ यह (यातुधाना:) = औरों को पीड़ित करनेवाला व्यक्ति (विश्वस्य) = उस सर्वव्यापक प्रभु के [विशति सर्वत्र] (प्रसितिं एतु) = बन्धन को प्राप्त हो। यह वाचास्तेन पशु-पक्षियों की योनियो में भटकता है। अपने जीवनकाल में भी अपने वचनों से स्वयं कष्ट प्राप्त करता है।

    भावार्थ

    ज्ञान से पाप दूर होता है। ज्ञानी अपशब्दों को न लेकर बोलनेवाले को ही लौटा देता है।

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    भाषार्थ

    (अद्य) आज अर्थात् प्रतिदिन (देवाः) हमारे विजिगीषु सैनिक तथा सेनाधिपति (वृजिनम) पापी तथा कुटिल को (पराशृणन्तु) नष्ट करें, (सृष्टाः) इस पापी द्वारा दिये (शपथाः) शाप, (प्रत्यक्) उल्टे (एनम्) इसको (यन्तु) प्राप्त हों। (वाचास्तेनम्) वाणी द्वारा धोखा देकर चोरी करने वाले को, (मर्मन) उसके मर्मस्थान में, (शरवः) घातक शस्त्र-अस्त्र (ऋच्छन्तु) प्राप्त हों, (यातुधानः) इस प्रकार की यातनाएं देने वाला (विश्वस्य) सबके (प्रसितिम्) बन्धन को (एतु) प्राप्त हो।

    टिप्पणी

    [पापी तथा कुटिल, शपथदाता, तथा वाणी द्वारा धोखा देकर चोरी करने वाला, ये सब यातुधान है। कोई भी प्रजाजन इन्हें रस्सियों आदि द्वारा बान्ध सकता है। शरवः= शर और शरु में भेद प्रतीत होता है]।

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    विषय

    प्रजा पीडकों का दमन।

    भावार्थ

    (अद्य) आज सदा ही (देवाः) विद्वान् अधिकारीगण या राजा लोग (वृजिनम्) पाप और पापी प्राणघातक और सत्कार्य-विनाशक राक्षस को (परा शृणन्तु) अच्छी प्रकार मारें। और (सृष्टाः) किये गये (शपथाः) निन्दावचन (एनम्) उस दुष्ट से (प्रत्यग) पर ही (यन्तु) जाएँ। और (वाचा स्तेनं) वाणी द्वारा छल कर चोरी करनेवाले को (शरवः) हिंसक बाण (मर्मन्) उस के मर्मस्थानों में (ऋच्छन्तु) लगें। और (यातुधानः) प्रजापीड़क आदमी (विश्वस्य) सबके (प्रसितिम्) बन्धन को (एतु) प्राप्त हो अर्थात् ऐसे पुरुष को सब कोई बांध लें।

    टिप्पणी

    ‘वृष्टाः’ इति सायणाभिमतः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चातन ऋषिः। अग्निर्देवता, रक्षोहणम् सूक्तम्। १, ६, ८, १३, १५, १६, १८, २०, २४ जगत्यः। ७, १४, १७, २१, १२ भुरिक्। २५ बृहतीगर्भा जगती। २२,२३ अनुष्टुभो। २६ गायत्री। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destruction of the Evil

    Meaning

    Let the brilliant wise eliminate the crooked, let the abuse and execration shot out by the evil revert to the evil, let the darts of lies cut the liar to the quick at heart, and let the evil destroyer suffer the enslavement and snares of the world.

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    Translation

    May the enlightened ones today exterminate the sinful. May the abuses hurled by him revert to him. May the arrows of the enlightened-ones smite him in the vitals, who strikes with speech. May the tormentor come within the reach (of the weapons) of all.

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    Translation

    O King! let you destroy today the evil-doers let the uttered Curses return again and strike him, let the fatal arrows pierce the lier in his vital Parts and let the anti-social elements go to the binding fetters of all the subject.

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    Translation

    May the learned ever destroy the evil-doer: may uttered curses turn back and attack him. Let arrows pierce the liar in his vitals, and the tetters of the ail-controlling king fasten the criminal.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १४−(अद्य) अस्मिन् दिने (देवाः) विजिगीषवः शूराः (वृजिनम्) अ० १।१०।३। पापिनम्। वक्रस्वभावम् (पराशृणन्तु) दुरे नाशयन्तु (प्रत्यक्) प्रतिकूलगत्या (एनम्) वृजिनम् (शपथाः) कुवचनानि (यन्तु) प्राप्नुवन्तु (सृष्टाः) त्यक्ताः। उच्चारिताः (वाचास्तेनम्) मृषावचनेन हर्तारम् (शरवः) बाणाः (ऋच्छन्तु) ऋच्छ गतीन्द्रियप्रलयमूर्तिभावेषु। प्राप्नुवन्तु (मर्मन्) अ० ५।८।९। जीवमरणस्थाने (विश्वस्य) अशूप्रुषिलटि०। उ० १।१५१। विश प्रवेशने-क्वन्। सर्वत्र प्रवेशकस्य राज्ञः (एतु) गच्छतु (प्रसितिम्) म० ११। निगडम्। शृङ्खलाम् (यातुधानः) दुःखदायकः ॥

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