अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 2/ मन्त्र 29
सूक्त - नारायणः
देवता - ब्रह्मप्रकाशनम्, पुरुषः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - ब्रह्मप्रकाशन सूक्त
यो वै तां ब्रह्म॑णो॒ वेदा॒मृते॒नावृ॑तां॒ पुर॑म्। तस्मै॒ ब्रह्म॑ च ब्रा॒ह्माश्च॒ चक्षुः॑ प्रा॒णं प्र॒जां द॑दुः ॥
स्वर सहित पद पाठय: । वै । ताम् । ब्रह्म॑ण: । वेद॑ । अ॒मृते॑न । आऽवृ॑ताम् । पुर॑म् । तस्मै॑ । ब्रह्म॑ । च॒ । ब्रा॒ह्मा: । च॒ । चक्षु॑: । प्रा॒णम् । प्र॒ऽजाम् । द॒दु॒: ॥२.२९॥
स्वर रहित मन्त्र
यो वै तां ब्रह्मणो वेदामृतेनावृतां पुरम्। तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश्च चक्षुः प्राणं प्रजां ददुः ॥
स्वर रहित पद पाठय: । वै । ताम् । ब्रह्मण: । वेद । अमृतेन । आऽवृताम् । पुरम् । तस्मै । ब्रह्म । च । ब्राह्मा: । च । चक्षु: । प्राणम् । प्रऽजाम् । ददु: ॥२.२९॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 2; मन्त्र » 29
भाषार्थ -
(अमृतेन) अमृत द्वारा (आवृताम्) आवृत हुई, घिरी हुई, (ब्रह्मणः) ब्रह्म की (ताम्, पुरम्) उस पूरी को (यः) जो (वेद) जानता है, (तस्मै) उस के लिये (ब्रह्म च ब्राह्माः च) ब्रह्म और ब्रह्मोत्पादित शक्तियां, (चक्षुः) चक्षु आदि इन्द्रियां (प्राणम्) प्राण आदि पांच वायु, (प्रजाम्) तथा उत्तम जन्म (ददुः) देती हैं।
टिप्पणी -
[मन्त्र में शरीर को ब्रह्मपुरी कहा है। यह अमृत ब्रह्म द्वारा आवृत है, सर्वव्यापक अमृत-ब्रह्म द्वारा सब ओर घिरी हुई है। "ब्राह्म" हैं ब्रह्मोत्पादित शारीरिक अङ्ग-प्रत्यङ्ग और शारीरिक विविध शक्तियां। जो व्यक्ति अपने आप को अन्दर बाहिर अमृत ब्रह्म द्वारा आवृत हुआ जान लेता है वह पापकर्म में प्रवृत्त नहीं होता और स्वयं भी अमृत होने की ओर पग बढ़ाता है। परिणाम में उस की इन्द्रियां, अन्तर्मुखी होकर उस की प्राण शक्तियों को बढ़ातीं, और उसे नई प्रजाति प्रदान करती हैं, द्विजन्मा रूप में उसे नया आध्यात्मिक जीवन प्रदान करती हैं]।