अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 2/ मन्त्र 11
सूक्त - नारायणः
देवता - ब्रह्मप्रकाशनम्, पुरुषः
छन्दः - जगती
सूक्तम् - ब्रह्मप्रकाशन सूक्त
को अ॑स्मि॒न्नापो॒ व्यदधात्विषू॒वृतः॑ पुरू॒वृतः॑ सिन्धु॒सृत्या॑य जा॒ताः। ती॒व्रा अ॑रु॒णा लोहि॑नीस्ताम्रधू॒म्रा ऊ॒र्ध्वा अवा॑चीः॒ पुरु॑षे ति॒रश्चीः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठक: । अ॒स्मि॒न् । आप॑: । वि । अ॒द॒धा॒त् । वि॒षु॒ऽवृत॑: । पु॒रु॒:ऽवृत॑: । सि॒न्धु॒ऽसृत्या॑य । जा॒ता: । ती॒व्रा: । अ॒रु॒णा: । लोहि॑नी: । ता॒म्र॒ऽधू॒म्ना: । ऊ॒र्ध्वा: । अवा॑ची: । पुरु॑षे । ति॒रश्ची॑: ॥२.११॥
स्वर रहित मन्त्र
को अस्मिन्नापो व्यदधात्विषूवृतः पुरूवृतः सिन्धुसृत्याय जाताः। तीव्रा अरुणा लोहिनीस्ताम्रधूम्रा ऊर्ध्वा अवाचीः पुरुषे तिरश्चीः ॥
स्वर रहित पद पाठक: । अस्मिन् । आप: । वि । अदधात् । विषुऽवृत: । पुरु:ऽवृत: । सिन्धुऽसृत्याय । जाता: । तीव्रा: । अरुणा: । लोहिनी: । ताम्रऽधूम्ना: । ऊर्ध्वा: । अवाची: । पुरुषे । तिरश्ची: ॥२.११॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 2; मन्त्र » 11
भाषार्थ -
(कः) किस ने (अस्मिन् पुरुषे) इस पुरुष में (आपः) जल या द्रव तत्त्व (व्यदधात्) विधि पूर्वक स्थापित किये हैं, जो कि (विषूवृतः पुरूवृतः) शरीर में व्याप्त है, तथा परिमाण में बहुत हैं, जो (सिन्धुसृत्याय) हृदयरूपी समुद्र से तथा उस में सरण करने के लिये (जाताः) उत्पन्न हुए हैं। जो (तीव्राः) स्वाद में तीव्र, (अरुणाः) फीके लाल अर्थात् अल्पलाल, (लोहिनीः) लाल, (ताम्रधूम्राः) ताम्बे के धूम अर्थात् वाष्पसदृश नीले हैं, (ऊर्ध्वाः) जो ऊर्ध्व की ओर गति करते, (अवाचीः) नीचे की ओर गति करते, (तिरश्चीः) पार्श्वों की ओर गति करते हैं।
टिप्पणी -
[आपः =रक्तरूपी जल जो शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग में व्याप्त है, आप्लृ व्याप्तौ। विषूवृतः = विष्लृ व्याप्तौ + वृतु वर्तने। सिन्धु सृत्याय = सिन्धु का अभिप्राय है हृदय-समुद्र, जिस से रक्त स्यन्दन करता है, तथा जिस की ओर रक्त स्यन्दन करता है। मलिन रक्त हृदय के वाम कोष्ठ में स्यन्दन करता है, और शुद्ध रक्त हृदय से शरीर की ओर स्यन्दन करता है। अरुणाः= अनीमिक अवस्था में रक्त कम लाल होता है, कम आभा वाला होता है, अरुणाः= आरोचनाः (निरुक्त ५।४।२१)। लोहिनीः= अधिक लाल जिस में कि लोहे की मात्रा पर्याप्त होती है। ताम्रधूम्राः = ताम्बा लाल होता हैं, परन्तु आग पर रखने से इससे जो धूम्र निकलता है वह नीला होता है। Veins अर्थात् सिराओं का खून नीला होता है, और Arteries अर्थात् धमनियों का खून लाला होता है। रक्त “ऊर्ध्व” अर्थात् सिर की ओर “अवाचीः” नीचे शरीर की ओर, तथा “तिरश्चीः” पार्श्वो की ओर गति करता है। कः= प्रश्नार्थक तथा प्रजापत्यर्थक। प्रश्न – “कः” किस ने आपः स्थापित किये हैं, उत्तर- “कः” प्रजापति ने स्थापित किये हैं]।