अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 2/ मन्त्र 19
सूक्त - नारायणः
देवता - ब्रह्मप्रकाशनम्, पुरुषः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - ब्रह्मप्रकाशन सूक्त
केन॑ प॒र्जन्य॒मन्वे॑ति॒ केन॒ सोमं॑ विचक्ष॒णम्। केन॑ य॒ज्ञं च॑ श्र॒द्धां च॒ केना॑स्मि॒न्निहि॑तं॒ मनः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठकेन॑ ।प॒र्जन्य॑म् । अनु॑ । ए॒ति॒ । केन॑ । सोम॑म् । वि॒ऽच॒क्ष॒णम् । केन॑ । य॒ज्ञम् । च॒ । अ॒ध्दाम् । च॒ । केन॑ । अ॒स्मि॒न् । निऽहि॑तम् । मन॑: ॥२.१९॥
स्वर रहित मन्त्र
केन पर्जन्यमन्वेति केन सोमं विचक्षणम्। केन यज्ञं च श्रद्धां च केनास्मिन्निहितं मनः ॥
स्वर रहित पद पाठकेन ।पर्जन्यम् । अनु । एति । केन । सोमम् । विऽचक्षणम् । केन । यज्ञम् । च । अध्दाम् । च । केन । अस्मिन् । निऽहितम् । मन: ॥२.१९॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 2; मन्त्र » 19
भाषार्थ -
(केन) किस महिमा द्वारा (पर्जन्यम्) मेघ में (अन्विति) वह अन्वित है, (केन) किस महिमा द्वारा (विचक्षणम् सोमम्) वह द्रष्टा-चन्द्रमा में अन्वित है। (केन) किस महिमा द्वारा (यज्ञम् च श्रद्धाम् च) उपासक के ध्यान-यज्ञ और श्रद्धा में वह अन्वित होता है, (केन) किस महिमा द्वारा उसने (अस्मिन्) इस पुरुष में (मनः) मन (निहितम्) रखा है, स्थापित किया है।
टिप्पणी -
[पर्जन्य में वह अन्वित है ताकि वर्षा द्वारा पेयजल प्रदान करे, और कृषिकार्य हो सके। चन्द्रमा में वह इसलिये अन्वित है ताकि उसे भासित कर सके, रात्रिकाल को प्रकाशित करने के लिये। उपासना यज्ञ तथा उपासक की श्रद्धा में अन्वित है, उसके आध्यात्मिक जीवन में सहायता दे सके। जैसे कि कहा है कि— “प्रणिधानात् भक्तिविशेषात् आवर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णाति अभिध्यानमात्रेण, तदभिध्यानादपि योगिन आसन्नतमः समाधिलाभः फलं च भवति” (ये० १।२३)। प्रणिधान नामक भक्तिविशेष द्वारा अभिमुखी किया गया ईश्वर उपासक पर अनुग्रह करता है, केवल स्वीय इच्छामात्र से ही। इस इच्छा से भी योगी को शीघ्र समाधिलाभ तथा उसका फल प्राप्त हो जाता है। पुरुष में मन इस लिये स्थापित किया है कि वह निज कार्य मनन पूर्वक करे, पशुवत् विना सोचे-विचारे काम न करे, तथा श्रवण मनन, निदिध्यासन द्वारा परमेश्वरोपासना कर मोक्ष प्राप्त कर सके]।