अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 4/ मन्त्र 14
सूक्त - गरुत्मान्
देवता - तक्षकः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सर्पविषदूरीकरण सूक्त
कै॑राति॒का कु॑मारि॒का स॒का खन॑ति भेष॒जम्। हि॑र॒ण्ययी॑भि॒रभ्रि॑भिर्गिरी॒णामुप॒ सानु॑षु ॥
स्वर सहित पद पाठकै॒रा॒ति॒का । कु॒मा॒रि॒का । स॒का । ख॒न॒ति॒ । भे॒ष॒जम् । हि॒र॒ण्ययी॑भि: । अभ्रि॑ऽभि: । गि॒री॒णाम् । उप॑ । सानु॑षु ॥४.१४॥
स्वर रहित मन्त्र
कैरातिका कुमारिका सका खनति भेषजम्। हिरण्ययीभिरभ्रिभिर्गिरीणामुप सानुषु ॥
स्वर रहित पद पाठकैरातिका । कुमारिका । सका । खनति । भेषजम् । हिरण्ययीभि: । अभ्रिऽभि: । गिरीणाम् । उप । सानुषु ॥४.१४॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 4; मन्त्र » 14
विषय - सर्प विज्ञान और चिकित्सा।
भावार्थ -
(सका) वह (कैरातिका) किरात=गिरिवासी वर्ग की (कुमारिका) कुमारी (हिरण्ययीभिः) लोह की बनी (अभ्रिभिः) कुदालियों से या खुरपियों से (गिरीणाम्) पर्वतों के (सानुषु) शिखरों पर (भेषजम्) ओषधि रूपसे (खनति) खोदती है। अथवा—वह ‘किरात’ वर्ग की (कुमारिका) कुमारी=बन्ध्यकर्कोटकी नामक जड़ी पर्वतों के शिखरों पर लोहे की बनी कुदालियों से (खनति) खोदी जाती है।
‘कुमारिका’—बन्ध्यकर्कोटकी देवी मनोज्ञा च कुमारिका।
विज्ञेया नागदमनी सर्व भूतप्रमार्दिनी॥
स्थावरादि विषद्म्नी च शस्यते सारसापने। [रा०नि०]
किराताः—गिरिषु अतन्ति इति किराताः। छान्दसं गत्वं पररूपं दीर्घएकादेशश्चेति॥
अर्थात्—वनवासी, गिरि पर्वतों के वासिनी कन्याएं लोहे की कुदालियों से पर्वतों पर से औषधि खन कर लाया करें। अथवा ‘किरात-वर्ग’ की कुमारी या वन्ध्यकर्कोट की नामक ओषधि खोद कर लानी चाहिये।
टिप्पणी -
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - अथर्वा ऋषिः। गरुत्मान् तक्षको देवता। २ त्रिपदा यवमध्या गायत्री, ३, ४ पथ्या बृहत्यौ, ८ उष्णिग्गर्भा परा त्रिष्टुप्, १२ भुरिक् गायत्री, १६ त्रिपदा प्रतिष्ठा गायत्री, २१ ककुम्मती, २३ त्रिष्टुप्, २६ बृहती गर्भा ककुम्मती भुरिक् त्रिष्टुप्, १, ५-७, ९, ११, १३-१५, १७-२०, २२, २४, २५ अनुष्टुभः। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥
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