अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 4/ मन्त्र 4
सूक्त - गरुत्मान्
देवता - तक्षकः
छन्दः - पथ्याबृहती
सूक्तम् - सर्पविषदूरीकरण सूक्त
अ॑रंघु॒षो नि॒मज्यो॒न्मज॒ पुन॑रब्रवीत्। उ॑दप्लु॒तमि॑व॒ दार्वही॑नामर॒सं वि॒षं वारु॒ग्रम् ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒र॒म्ऽघु॒ष: । नि॒ऽमज्य॑ । उ॒त्ऽमज्य॑ । पुन॑: । अ॒ब्र॒वी॒त् । उ॒द॒प्लु॒तम्ऽइ॑व । दारु॑ । अही॑नाम् । अ॒र॒सम् । वि॒षम् । वा: । उ॒ग्रम् ॥४.४॥
स्वर रहित मन्त्र
अरंघुषो निमज्योन्मज पुनरब्रवीत्। उदप्लुतमिव दार्वहीनामरसं विषं वारुग्रम् ॥
स्वर रहित पद पाठअरम्ऽघुष: । निऽमज्य । उत्ऽमज्य । पुन: । अब्रवीत् । उदप्लुतम्ऽइव । दारु । अहीनाम् । अरसम् । विषम् । वा: । उग्रम् ॥४.४॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 4; मन्त्र » 4
विषय - सर्प विज्ञान और चिकित्सा।
भावार्थ -
(अरं-घुषः) तूम्बा, (निमज्य) जल में बूड़ कर (पुनः उन्मज्य) फिर ऊपर उठकर (अब्रवीत्) बतलाता है कि मेरे प्रभाव से (उदप्लुतं दारु) पानी में डूबे हुए लकड़ी के टुकड़े को (वाः इव) जिस प्रकार जल (अरसम्) निर्बल कर देता है उसी प्रकार (अहीनाम्) सांपों का (उग्रम्) उग्र, भयानक, तीव्र (विषम्) विष भी (अरसम्) रसहीन, निर्बल हो जाता है। कटु तुम्बी=‘कटुकालाम्बुनी’ कहाती हैं। वह वमनकारिणी विषघ्नी है। उसका एक नाम ‘इक्ष्वाकु’ भी है। वेद में उसे ‘अरं-घुषा’ प्रति शब्द करने वाली ‘वीणा की तुम्बी’ कहा है।
टिप्पणी -
(प्र०) ‘उदन्धोज्योन्मज्य पुनः’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - अथर्वा ऋषिः। गरुत्मान् तक्षको देवता। २ त्रिपदा यवमध्या गायत्री, ३, ४ पथ्या बृहत्यौ, ८ उष्णिग्गर्भा परा त्रिष्टुप्, १२ भुरिक् गायत्री, १६ त्रिपदा प्रतिष्ठा गायत्री, २१ ककुम्मती, २३ त्रिष्टुप्, २६ बृहती गर्भा ककुम्मती भुरिक् त्रिष्टुप्, १, ५-७, ९, ११, १३-१५, १७-२०, २२, २४, २५ अनुष्टुभः। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥
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