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  • अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 4/ मन्त्र 15
    सूक्त - गरुत्मान् देवता - तक्षकः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सर्पविषदूरीकरण सूक्त

    आयम॑ग॒न्युवा॑ भि॒षक्पृ॑श्नि॒हाप॑राजितः। स वै स्व॒जस्य॒ जम्भ॑न उ॒भयो॒र्वृश्चि॑कस्य च ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । अ॒यम् । अ॒ग॒न् । युवा॑ । भि॒षक् । पृ॒श्नि॒ऽहा । अप॑राऽजित: । स: । वै । स्व॒जस्य॑ । जम्भ॑न: । उ॒भयो॑: । वृश्चि॑कस्य । च॒ ॥४.१५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आयमगन्युवा भिषक्पृश्निहापराजितः। स वै स्वजस्य जम्भन उभयोर्वृश्चिकस्य च ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । अयम् । अगन् । युवा । भिषक् । पृश्निऽहा । अपराऽजित: । स: । वै । स्वजस्य । जम्भन: । उभयो: । वृश्चिकस्य । च ॥४.१५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 4; मन्त्र » 15

    भावार्थ -
    (अयम्) यह (युवा) बलवान् (अपराजितः) अपराजित नामक औषध (पृश्नि-हा) पृश्नि, चितकबरे कौड़िया सांप का नाशक और (भिषक्) विष रोग को दूर करने हारा है। (सः च) वह (स्वजस्य) स्वज नामक सर्प (वृश्चिकस्य च) और वृश्चिक, बिच्छू (उभयोः) दोनों का (जम्भनः) नाशक है। ‘अपराजिता’ शब्द से निघण्टु में अश्वक्षुरक, बलामोटा, विष्णुक्रान्ता, और शुक्लांगी या शेफ़ालिका या शंखपुष्पी नामक ओषधि ली जाती हैं। इनमें—अश्वक्षुरक=गिरिकर्णिका, कटभी, श्वेत आदि नाम से कहाती है। वह चक्षुष्य, विष-दोषध्न है। शेफालिका, गिरिसिन्दुक या श्वेत सुरसा कहाती है वह भी विषघ्न है।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - अथर्वा ऋषिः। गरुत्मान् तक्षको देवता। २ त्रिपदा यवमध्या गायत्री, ३, ४ पथ्या बृहत्यौ, ८ उष्णिग्गर्भा परा त्रिष्टुप्, १२ भुरिक् गायत्री, १६ त्रिपदा प्रतिष्ठा गायत्री, २१ ककुम्मती, २३ त्रिष्टुप्, २६ बृहती गर्भा ककुम्मती भुरिक् त्रिष्टुप्, १, ५-७, ९, ११, १३-१५, १७-२०, २२, २४, २५ अनुष्टुभः। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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