ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 87/ मन्त्र 24
प्रत्य॑ग्ने मिथु॒ना द॑ह यातु॒धाना॑ किमी॒दिना॑ । सं त्वा॑ शिशामि जागृ॒ह्यद॑ब्धं विप्र॒ मन्म॑भिः ॥
स्वर सहित पद पाठप्रति॑ । अ॒ग्ने॒ । मि॒थु॒ना । द॒ह॒ । या॒तु॒ऽधाना॑ । कि॒मी॒दिना॑ । सम् । त्वा॒ । शि॒शा॒मि॒ । जा॒गृ॒हि । अद॑ब्धम् । वि॒प्र॒ । मन्म॑ऽभिः ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रत्यग्ने मिथुना दह यातुधाना किमीदिना । सं त्वा शिशामि जागृह्यदब्धं विप्र मन्मभिः ॥
स्वर रहित पद पाठप्रति । अग्ने । मिथुना । दह । यातुऽधाना । किमीदिना । सम् । त्वा । शिशामि । जागृहि । अदब्धम् । विप्र । मन्मऽभिः ॥ १०.८७.२४
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 87; मन्त्र » 24
अष्टक » 8; अध्याय » 4; वर्ग » 9; मन्त्र » 4
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अष्टक » 8; अध्याय » 4; वर्ग » 9; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(अग्ने) हे तेजस्वी नायक ! (यातुधाना किमीदिना मिथुना) यातनाधारक क्या अब हरना चाहिए, ऐसे युगल स्त्रीपुरुषों को (प्रतिदह) प्रतिदग्ध कर (त्वा मन्मभिः सं शिशामि) तुझे निज मान्य करनेवाले वचनों से तीक्ष्ण करता हूँ, प्रोत्साहित करता हूँ (विप्र जागृहि) हे मेधावी ! तू सावधान हो ॥२४॥
भावार्थ
राष्ट्र के अन्दर जो पीड़ा देनेवाले तथा जो क्या-क्या हरें, लूटें सोचनेवाले स्त्रीपुरुषों को जला देना चाहिए, प्रजाजन भी शासक को उत्तेजित प्रोत्साहित करते रहें ॥२४॥
विषय
अन्यों को तुच्छ समझ कर कष्ट देने वालों को दण्ड देने और राजा को सावधान रहने का उपदेश।
भावार्थ
(अग्ने) अग्ने ! तेजस्विन् ! तू (मिथुना) जोड़े २ (यातु-धाना) अन्यों को पीड़ा देने वाले (किमीदिना) समय और दूसरे के किये कार्य वा पदार्थ और जीवन को कुछ न समझने वाले, गर्वीले स्त्री पुरुषों को (प्रति दह) खूब पीड़ित कर। (अदब्धं) अहिंसक (त्वा) तुझको हे (विप्र) मेधाविन् ! (मन्मभिः) उत्तम २ विचारों से (सं शिशामि) अच्छी प्रकार शासन करूं जिससे तू (जागृहि) सदा जाग, सावधान रहे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः पायुः। देवता–अग्नी रक्षोहा॥ छन्दः— १, ८, १२, १७ त्रिष्टुप्। २, ३, २० विराट् त्रिष्टुप्। ४—७, ९–११, १८, १९ निचृत् त्रिष्टुप्। १३—१६ भुरिक् त्रिष्टुप्। २१ पादनिचृत् त्रिष्टुप्। २२, २३ अनुष्टुप्। २४, २५ निचृदनुष्टुप्॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम्॥
विषय
तीव्र बुद्धि व नाम-स्मरण
पदार्थ
[१] हमारे जीवनों में 'काम-क्रोध' प्रायः साथ-साथ चलते हैं, 'कामात् क्रोधोऽभिजायते', क्रोध तो पैदा ही काम से होता है। इसी प्रकार 'लोभ मोह' का द्वन्द्व है। जिस भी वस्तु का लोभ होता है, उसी के प्रति मोह उत्पन्न हो जाता है। 'मद मत्सर' भी द्वन्द्वात्मक हैं, जब मद होता है तभी मत्सर भी आता है। हे (अग्ने) = प्रकाशमय प्रभो ! इन (मिथुना) = द्वन्द्वभूत (किमीदिना) ='किम् इदानीम् अद्मः अब क्या खायें और अब क्या खायें' इस वृत्तिवाले (यातुधाना) = औरों को पीड़ित करनेवाले राक्षसी भावों को (प्रतिदह) = भस्म कर दीजिये । [२] जीव की इस प्रार्थना को सुनकर प्रभु कहते हैं कि मैं (त्वा) = तुझे संशिशामि तीव्र बुद्धिवाला करता हूँ, जागृहि तू जाग और इन वासनाओं को आक्रमण का अवसर ही न दे। उनके आक्रमण होने पर भी इस तीव्र बुद्धि से उनको भस्म करनेवाला बन । हे (विप्र) = अपना पूरण करनेवाले जीव ! मैं तुझे (मन्यभिः) = ज्ञानपूर्वक किये गये इन स्तवनों के द्वारा (अदब्धम्) = अहिंसित बनाता हूँ। जो भी प्रभु का नामस्मरण करता है, उसके अर्थ का चिन्तन करता है, वह वासनाओं से आक्रान्त नहीं होता ।
भावार्थ
भावार्थ - तीव्र बुद्धि से, सदा सावधान रहने से तथा समझ के साथ प्रभु नामस्मरण से हम वासनाओं का विनाश करें।
संस्कृत (1)
पदार्थः
(अग्ने) हे तेजस्विन् नायक ! (यातुधाना किमीदिना मिथुना) यातनाधारकौ किमिदानीं हरावहि चरन्तौ मिथुनभूतौ स्त्रीपुरुषौ (प्रतिदह) प्रतिदग्धीकुरु (त्वां मन्मभिः संशिशामि) त्वां निजमान्यकरणवचनैस्तीक्ष्णीकरोमि-प्रोत्साहयामि (विप्र जागृहि) हे मेधाविन् ! त्वं सावधानो भव ॥२४॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Agni, burn up the oppressive and destructive alliances and combinations of the negativities of life and nature on the prowl looking for where to strike. O power all intelligent and wise, with holy thoughts and prayers, I invoke and exhort you. Arise, O power indomitable, and strike against the killers.
मराठी (1)
भावार्थ
राष्ट्राला त्रस्त करणाऱ्या व लुटणाऱ्या स्त्री-पुरुषांना जाळून टाकले पाहिजे. प्रजाजनांनीही शासकाला उत्तेजित, प्रोत्साहित करावे. ॥२४॥
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