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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 87 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 87/ मन्त्र 5
    ऋषिः - पायुः देवता - अग्नी रक्षोहा छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अग्ने॒ त्वचं॑ यातु॒धान॑स्य भिन्धि हिं॒स्राशनि॒र्हर॑सा हन्त्वेनम् । प्र पर्वा॑णि जातवेदः शृणीहि क्र॒व्यात्क्र॑वि॒ष्णुर्वि चि॑नोतु वृ॒क्णम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अग्ने॑ । त्वच॑म् । या॒तु॒ऽधान॑स्य । भि॒न्धि॒ । हिं॒स्रा । अ॒शनिः॑ । हर॑सा । ह॒न्तु॒ । ए॒न॒म् । प्र । पर्वा॑णि । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । शृ॒णी॒हि॒ । क्र॒व्यात् । क्र॒वि॒ष्णुः । वि । चि॒नो॒तु॒ । वृ॒क्णम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्ने त्वचं यातुधानस्य भिन्धि हिंस्राशनिर्हरसा हन्त्वेनम् । प्र पर्वाणि जातवेदः शृणीहि क्रव्यात्क्रविष्णुर्वि चिनोतु वृक्णम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्ने । त्वचम् । यातुऽधानस्य । भिन्धि । हिंस्रा । अशनिः । हरसा । हन्तु । एनम् । प्र । पर्वाणि । जातऽवेदः । शृणीहि । क्रव्यात् । क्रविष्णुः । वि । चिनोतु । वृक्णम् ॥ १०.८७.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 87; मन्त्र » 5
    अष्टक » 8; अध्याय » 4; वर्ग » 5; मन्त्र » 5
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (जातवेदः-अग्ने) हे प्राप्त अवसर को जाननेवाले अग्रणी सेनानायक !  तू (यातुधानस्य-त्वचं भिन्धि) यातना देनेवाले की त्वचा को उखेड़ दे (हिंस्रा-अशनिः-हरसा-एनं हन्तु) नाशकारिणी विद्युत् अपने तेज से उनको मारे (पर्वाणि प्र शृणीहि) जोड़ों-अङ्गों को तोड़ दे (वृक्णं क्रविष्णुः क्रव्यात्-विचिनोतु) कटे हुए शरीर को मांस इच्छुक मांसभक्षक पशु-पक्षी नोच-नोच कर खावें ॥५॥

    भावार्थ

    सेनानायक शस्त्रास्त्रों एवं विद्युत्शक्ति के प्रहारों से शत्रुओं के अङ्गों को तोड़-फोड़ दे, त्वचा को छिन्न-भिन्न कर दे, वे भागने के योग्य भी न रहें, उन्हें मांसभक्षक पशु-पक्षी नोच-नोच कर खा डालें ॥५॥

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    विषय

    दुष्टों के अंग-छेदनादि दण्ड करने का आदेश।

    भावार्थ

    (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्विन् ! हे दुष्टों को सन्तापित, पीड़ित और दग्ध करने वाले ! तू (यातु-धानस्य) कुटिल चाल चलने वाले वा प्रजा को पीड़ा देने वाले दुष्ट पुरुष के (त्वचं भिन्धि) त्वचा वा देह को छिन्न भिन्न कर, उसको कठोर शारीरिक अंगच्छेदन आदि दण्ड दे। वा उसके (त्वचं) आवरणकारी, छुपने के स्थान को (भिन्धि) नाश कर। (हिंस्रा) हिंसा वा प्राण नाश करने वाली (अशनिः) विद्युत् अस्त्र (हरसा) प्राणहारक ज्वाला से (एनं हन्तु) इसको मारे। (पर्वाणि) उसके पोरुओं को वा उसके पालन करने वा उसके मनोरथों को पूर्ण करने वाले साधनों, अंगों वा सहयोगियों को (शृणीहि) नाश कर (विष्णुः) व्यापक शक्तिशाली पुरुष (क्रव्यात्) मांसाहारी पशु के तुल्य (वृष्णम्) दुष्ट व्यक्ति के छिन्न भिन्न अंगों को (वि चिनोतु) चुन २ कर हड़प करलें। अर्थात् जिस प्रकार किसी कटे छिन्न भिन्न देह के अंगों को गीध, कुत्ता सियार आदि खाजाते हैं उसी प्रकार दुष्ट प्रजा-पीड़क व्यक्ति के छिन्न भिन्न देहवत् राष्ट्र के अंगों को उससे अधिक शक्ति वाले राष्ट्र छीन झपट लें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः पायुः। देवता–अग्नी रक्षोहा॥ छन्दः— १, ८, १२, १७ त्रिष्टुप्। २, ३, २० विराट् त्रिष्टुप्। ४—७, ९–११, १८, १९ निचृत् त्रिष्टुप्। १३—१६ भुरिक् त्रिष्टुप्। २१ पादनिचृत् त्रिष्टुप्। २२, २३ अनुष्टुप्। २४, २५ निचृदनुष्टुप्॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    यातुधान का परिवर्तन

    पदार्थ

    [१] हे (अग्रे) = राष्ट्र को उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले राजन् ! (यातुधानस्य) = इस प्रजापीड़क के (त्वचम्) = सम्पर्क को (भिन्धि) = तोड़ दे। इसे अपने साथियों से अलग कर दे। अलग होने पर यह अपने जीवन के मार्ग के विषय में ठीक सोच सकता है। [२] (हिंस्राशनिः) - [हिंस्रः चासौ अशनि :-master] अज्ञान को नष्ट करनेवाला अध्यापक (हरसा) = वासनाओं को विनष्ट करने की शक्ति से (एनं हन्तु) = इस यातुधान को प्राप्त हो [ हन् गतौ ] । वह ज्ञान देकर इसे अधर्म मार्ग से हटानेवाला हो। [३] हे (जातवेदः) = ज्ञानी पुरुष ! तू (पर्वाणि) = [ knots] इसकी वासना ग्रन्थियों को प्रशृणीहि प्रकर्षेण नष्ट करनेवाला बन । ज्ञान के द्वारा तू इसे वासनामय जगत् से ऊपर उठा । तू उसे इस प्रकार का ज्ञान दे कि यह (क्रविष्णुः) = औरों के मांस की इच्छावाला (क्रव्यात्) = मांस- भक्षक पुरुष औरों के नाश में लगा हुआ पुरुष (वृक्णम्) = छेदों व दोषों को विचिनोतु अपने से पृथक् करनेवाला हो। यह औरों के विनाश पर अपने आमोद के भवन को न खड़ा करे ।

    भावार्थ

    भावार्थ- यातुधान को राजा उसके साथियों से अलग करे। ज्ञानी उसे ज्ञान देने के लिये प्राप्त हो और ज्ञान देकर उसकी वासना-ग्रन्थियों को विनष्ट करे ।

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (जातवेदः-अग्ने) हे प्राप्तावसरस्य वेदितः ! अग्रणीः ! सेनानायक ! त्वं (यातुधानस्य त्वचं भिन्धि) यातनाधारकस्य त्वचं छिन्नां कुरु (हिंस्रा-अशनिः-हरसा-एनं हन्तु) नाशकारिणी विद्युत् स्वतेजसा खल्वेतं मारयतु (पर्वाणि प्र शृणीहि) परूंषि अङ्गानि त्वं त्रोटय (वृक्णं क्रविष्णुः क्रव्यात्-विचिनोतु) छिन्नं शरीरं मांसेच्छुको मांसभक्षकः पशुः पक्षी वा पृथक् कृत्वा भक्षयतु ॥५॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Agni, Jataveda, present everywhere, break through the cover, camouflage, secret shelters and hideouts of the elements of evil, violence and sabotage with fatal light and penetrative power, split up every section and every unit of it to bits, disperse and destroy them all, and let the fire which consumes the dead collect and consume the remains and reduce them to ash.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    सेनानायकाने शस्त्रास्त्रे व विद्युत शक्तीच्या प्रहारांनी शत्रूचे अंग विच्छेदित करावे. त्वचा छिन्नभिन्न करावी. शरीर पळण्यायोग्यही राहता कामा नये. त्यांना मांसभक्षक पशू व पक्षी यांनी टोचून-टोचून खावे. ॥५॥

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