ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 32/ मन्त्र 13
यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒मसीन्द्र॒ साधा॑रण॒स्त्वम्। तं त्वा॑ व॒यं ह॑वामहे ॥१३॥
स्वर सहित पद पाठयत् । चि॒त् । हि । शश्व॑ताम् । असि॑ । इन्द्र॑ । साधा॑रणः । त्वम् । तम् । त्वा॒ । व॒यम् । हा॒वा॒म॒हे॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
यच्चिद्धि शश्वतामसीन्द्र साधारणस्त्वम्। तं त्वा वयं हवामहे ॥१३॥
स्वर रहित पद पाठयत्। चित्। हि। शश्वताम्। असि। इन्द्र। साधारणः। त्वम्। तम्। त्वा। वयम्। हवामहे ॥१३॥
ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 32; मन्त्र » 13
अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 29; मन्त्र » 3
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अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 29; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे इन्द्र जगदीश्वर ! यद्यस्त्वं शश्वतां प्रकृत्यादीनां मध्ये साधारणोऽसि तं चित् वा हि वयं हवामहे ॥१३॥
पदार्थः
(यत्) यः (चित्) अपि (हि) खलु (शश्वताम्) अनादिभूतानां मध्ये (असि) (इन्द्र) परमैश्वर्य्ययुक्त परमेश्वर (साधारणः) सामान्येन व्याप्तः (त्वम्) (तम्) (त्वा) त्वाम् (वयम्) (हवामहे) स्तूमह आश्रयेम ॥१३॥
भावार्थः
हे मनुष्या ! यः परमेश्वरः सनातनानां स्वामी धर्ता स कार्यनिर्माता व्यवस्थापकोऽन्तर्यामी वर्त्तते तमेव सदोपासीरन् ॥१३॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त जगदीश्वर ! (यत्) जो (त्वम्) आप (शश्वताम्) अनादि काल से हुए प्रकृति आदि पदार्थों के मध्य में (साधारणः) सामान्य से व्याप्त (असि) होते हो (तम्, चित्) उन्हीं (त्वा) आपकी (हि) निश्चय (वयम्) हम लोग (हवामहे) स्तुति करते वा आपका आश्रय करते हैं ॥१३॥
भावार्थ
हे मनुष्यो ! जो परमेश्वर अनादि काल से सिद्ध प्रकृति आदि पदार्थों का स्वामी, उनका धारण करनेवाला, वह कार्य्य का निर्माणकर्ता और कार्य्यों की व्यवस्था करनेवाला अन्तर्यामी है, उसी की सदा उपासना करो ॥१३॥
विषय
प्रभु का प्रिय बनना
पदार्थ
[१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यत् चित् हि) = यद्यपि (त्वम्) = आप (शश्वताम्) = [शश्वत् बहुनाम नि० ३।१] अनन्त संख्यावाली प्रजाओं के (साधारणः असि) = निष्पक्षपात रूप से वर्तनेवाले हैं, तो भी (तं त्वा) = उन आपको (वयम्) = हम (हवामहे) = पुकारते हैं। [२] प्रभु किसी के प्रति रागद्वेषवाले नहीं हैं- सब के प्रति समरूप से वर्तनेवाले हैं। तो भी हम 'ज्ञानप्राप्ति, स्तवन व यज्ञादि कर्मों' के द्वारा प्रभु को प्रीणित करनेवाले होते हैं। प्रभुभक्तों में भी प्रभु के ज्ञानीभक्त बनकर हम प्रभु के आत्मतुल्य प्रिय बनने का प्रयत्न करते हैं।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु सबके प्रति समवर्ती हैं। तो भी हम 'ज्ञान, स्तवन व यज्ञादि कर्मों' से प्रभु का प्रिय बनने का प्रयत्न करते हैं ।
विषय
राजा सेनापति के प्रति प्रजा की नाना प्रार्थनाएं और और आकाक्षाएं । और राजा के कर्त्तव्य । पक्षान्तर में आचार्य के कर्त्तव्य । राजा से रक्षा, धन, ज्ञान, न्याय आदि की प्रार्थना ।
भावार्थ
हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! राजन् ! प्रभो ! (यः) जो (त्वं) तू (शश्वतां चित्) अनादि सनातन से चले आये सत् तत्वों में परमेश्वर के तुल्य पहले से चली आई बहुत सी प्रजाओं के बीच (साधारणः असि) सबको समान रूप से निष्पक्षपात होकर धारण करने हारा है (तं त्वा) उस तुझको (वयं) हम (हवामहे) पुकारते स्तुति करते और राजा रूप से स्वीकार करते हैं ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः ॥ १—२२ इन्द्रः । २३, २४ इन्द्राश्वौ देवते ॥ १, ८,९, १०, १४, १६, १८, २२, २३ गायत्री । २, ४, ७ विराङ्गायत्री । ३, ५, ६, १२, १३, १५, १६, २०, २१ निचृद्गायत्री । ११ पिपीलिकामध्या गायत्री । १७ पादनिचृद्गायत्री । २४ स्वराडार्ची गायत्री ॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
हे माणसांनो! जो परमेश्वर अनादि काळापासून स्वामी, प्रकृती इत्यादीचा धारणकर्ता, कार्यनिर्माता, व्यवस्थापक असून अन्तर्यामी आहे, त्याचीच सदैव उपासना करा. ॥ १३ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Indra, lord of love and justice, fatherly omnipresence for all, since you are general and universal power of all the eternal presences, equal and universal for all, we invoke and pray to you as the one father figure for our good.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
Further attributes and duties of the teachers and preachers are stated.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O people! God is great and full of prosperity. He is absorbed in all the comprehended substances by the nature which is eternal. We worship and abide in Him in the positive terms.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O men! God is Master of all the substances created by nature since eternal time. He holds and sets them in their making, regulates all the functions of nature and is comprehending. Worship and ever say prayer to Him.
Foot Notes
(शश्वताम् ) अनादिभूतानां मध्ये । = Amidst the substances which are eternal. (साधारण) सामान्येन व्याप्तः = Comprehended. (हवामहे) स्तुमहे, आश्रयेम = Worship or say prayer.
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