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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 32/ मन्त्र 23
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - इन्द्राश्वौ छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    क॒नी॒न॒केव॑ विद्र॒धे नवे॑ द्रुप॒दे अ॑र्भ॒के। ब॒भ्रू यामे॑षु शोभेते ॥२३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क॒नी॒न॒काऽइ॑व । वि॒द्र॒धे । नवे॑ । द्रु॒ऽप॒दे । अ॒र्भ॒के । ब॒भ्रू इति॑ । यामे॑षु । शो॒भे॒ते॒ इति॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कनीनकेव विद्रधे नवे द्रुपदे अर्भके। बभ्रू यामेषु शोभेते ॥२३॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कनीनकाऽइव। विद्रधे। नवे। द्रुऽपदे। अर्भके। बभ्रू इति। यामेषु। शोभेते इति ॥२३॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 32; मन्त्र » 23
    अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 30; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे विद्वांसौ ! भवन्तौ यौ बभ्रू यामेषु कनीनकेव नवे विद्रधे द्रुपदे अर्भके शोभेते ताविव जगदुपकारकौ भवितुमर्हतः ॥२३॥

    पदार्थः

    (कनीनकेव) कमनीयेव (विद्रधे) विशेषेण दृढे (नवे) नवीने (द्रुपदे) सद्यः प्रापणीये वृक्षादिद्रव्यपदे वा (अर्भके) अल्पे (बभ्रू) अध्यापकोपदेशकौ (यामेषु) प्रहरेषु (शोभेते) ॥२३॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः । ये विद्वांसोऽधिकेऽल्पे विज्ञाने कर्मणि वा सुशोभिताः स्युस्ते जगति कल्याणकाराः स्युः ॥२३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे विद्वानो ! आप जो (बभ्रू) अध्यापक और उपदेशक (यामेषु) प्रहरों में (कनीनकेव) सुन्दर के तुल्य (नवे) नवीन (विद्रधे) विशेष दृढ़ (द्रुपदे) शीघ्र प्राप्त होने योग्य पदार्थ वा वृक्ष आदि द्रव्यों के स्थान और (अर्भके) छोटे बालक के निमित्त (शोभेते) शोभित होते हैं, उनके सदृश संसार के उपकार करनेवाले होने को योग्य हों ॥२३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो विद्वान् अधिक वा न्यून विज्ञान में वा काम में सुशोभित हों, वे जगत् के बीच कल्याण करनेवाले हों ॥२३॥

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    विषय

    इन्द्रियाश्व ?

    पदार्थ

    [१] हे (इन्द्रियाश्व यामेषु) = जीवनयात्रा के मार्गों में गति करते हुए (शोभेते) = अत्यन्त ही शोभावाले होते हैं। ये (कनीनका इव) = [कन दीप्तौ] अत्यन्त ही दीप्तिवाले से हैं- चमकते (विद्रधे) = अत्यन्त दृढ़ हैं। (नवे) = [नु स्तुतौ] प्रशंसनीय हैं। (द्रुपदे) = गतिमय पाँवोंवाले हैं-अत्यन्त क्रियाशील हैं। (अर्भके) = ये [like, similar] सर्वत्र समान हैं। पशुओं में व मनुष्यों में इन इन्द्रियों का अन्तर नहीं हैं। मन व बुद्धि के कारण ही सारा अन्तर पड़ता है। (बभ्रू) = ये हमारा भरण करनेवाले हैं। कर्मेन्द्रियाँ सब कर्मों को तथा ज्ञानेन्द्रियाँ सब ज्ञानों को सिद्ध करती हुई हमारा भरण करती हैं । [२] इन्द्रियाश्व दीप्त तो हैं ही अपने-अपने कार्य को करने में अद्भुत इनकी क्षमता है। ये दृढ़ हैं - थोड़े से विरोध से विकृत होनेवाले नहीं । अत्यन्त प्रशंसनीय हैं, सदा गतिशील हैं। सब प्राणियों में समानरूप से हैं। हमारा भरण इन्हीं के द्वारा होता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु ने इन्द्रियाश्वों की रचना अद्भुत ही की है।

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    विषय

    दो आंखों के तुल्य सस्नेह रहने का राजा प्रजा वर्गों को उपदेश ।

    भावार्थ

    (यामेषु) गमन करने योग्य मार्गों में जिस प्रकार (बभ्रू) लाल रंग के दो घोड़े (अर्भके द्रुपदे विद्रधे शोभते) छोटे से दृढ़ खूंटे में बंधे शोभा पाते हैं उसी प्रकार (यामेषु) यम नियम के पालन के कार्यों में (बभ्रू) तेजस्वी स्त्री पुरुष वर्ग, शिष्य और आचार्य दोनों (अर्भके) छोटे (विद्रधे) दृढ़ (नवे) नये, अतिस्तुत्य (द्रुपदे) खूंटे के तुल्य स्थिर व्रत में (शोभेते) शोभा पाते हैं और वे दोनों (कनीनका-इव) आँखों की दो पुतलियों के समान परस्पर प्रेम अनुराग से युक्त भी हों (२) इसी प्रकार (यामेषु) राष्ट्र संयमन आदि कार्यों में राजा प्रजा भी परस्पर मिली आँखों की पुतलियों के तुल्य इस नये, दृढ़, बालवत पोषणीय, राज्य कार्य में एक दूसरे के पोषक हो । (३) गृह में स्त्री पुरुष अनुरक्त पुतलियों के सदृश एक छोटे से धर्म या बालक रूप खूंटे से बन्धे रहकर भी आठों पहरों (बभ्रू) एक दूसरे के पोषक और रक्त वर्ण, सुप्रसन्न चित्त बने रहकर शोभा देते हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः ॥ १—२२ इन्द्रः । २३, २४ इन्द्राश्वौ देवते ॥ १, ८,९, १०, १४, १६, १८, २२, २३ गायत्री । २, ४, ७ विराङ्गायत्री । ३, ५, ६, १२, १३, १५, १६, २०, २१ निचृद्गायत्री । ११ पिपीलिकामध्या गायत्री । १७ पादनिचृद्गायत्री । २४ स्वराडार्ची गायत्री ॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे विद्वान अधिक किंवा न्यून विज्ञानाने किंवा कार्य करण्यामुळे सुशोभित होतात ते जगाचे कल्याणकर्ते ठरतात. ॥ २३ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Like the two pupils of the eyes, overly strong and lasting, ever new, ever cherished and subtle divine harbingers of the truth, goodness and beauty of existence, let nature’s complementaries ever shine blissfully in the hours of human yajna.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The theme of teacher and preacher is further developed in the mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O teacher and preacher! all the time you shine like new and handsome substances like in the plants and babes. Both of these look fresh and exceptionally strong. Let us become benefactor like them.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Here is simile. The learned persons who distinguish in knowledge, let them become benefactor of the entire world.

    Foot Notes

    (कनीन केव) कमनीयेव । = Handsome. (विद्रधे) विशेषेण दृढ़े । = In exceptionally strong. (नवे ) नवीने । = Fresh. (द्रुपदे) सद्य: प्रापणीये वृक्षा- दिद्रव्यपदे वा = Plantsete. (अर्भक ) अल्पे । = Babes. (वभ्रू ) अध्यापकोपदेशको =Teacher and preacher. (यामेषु) प्रहरेषु। = All the times.

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